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ई टिकट: सॉफ्टवेयर में सेंधमारी करने वालों तक नहीं पहुंच पा रही आरपीएफ
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झांसी। बुंदेलखंड के ई टिकट कारोबारियों के तार मुंबई और सूरत में बैठे माफियाओं से जुड़े होने का पता लगने के बाद भी आरपीएफ उन्हें पकड़ने में सफलता हासिल नहीं कर सकी है। शुरुआत में माफियाओं को पकड़ने के लिए रेलवे बोर्ड तक हल्ला मचा, रणनीति भी बनी, लेकिन हुआ कुछ नहीं।
आरपीएफ की क्राइम ब्रांच की टीम ने आठ नवंबर को बांदा के नरैनी निवासी संदीप वर्मा को प्रतिबंधित सॉफ्टवेयर का उपयोग कर अवैध रूप से ई टिकट बनाते पकड़ा था। उसके कंप्यूटर में पिछले एक महीने का रिकार्ड बरामद हुआ था। जिसमें पूर्व यात्रा के 58 टिकटों व आगामी नौ टिकट का लेखाजोखा पाया गया। जांच में जब परतें खुलीं तो क्राइम ब्रांच के होश उड़ गए। जांच में पता लगा कि उक्त अवैध कारोबारी के तार मुंबई महानगर में बैठे हैकरों से जुड़े हैं। इस हैकर गिरोह ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार कर रखा है जिसने आईआरसीटीसी के ई टिकट के तत्काल टिकट प्रोग्राम को हैक कर रखा है। ये गिरोह तत्काल टिकट का समय शुरू होने से आधे घंटे पहले संबंधित अवैध कारोबारी के पास एक लिंक भेजता है।
लिंक मिलते ही कारोबारी पहले से ही दो या तीन तत्काल टिकटों के फार्म ऑनलाइन भरकर तैयार रखता है। एक फार्म पर चार यात्रियों के टिकट बनते हैं। तत्काल टिकट खुलते ही लिंक की मदद से 20 सेकेंड के अंदर ही उक्त यात्रियों के कंफर्म टिकट बन जाते हैं। उक्त कारोबारी पिछले दो साल से यह काम कर रहा था। कुछ दिन बाद ही फतेहपुर में एक और ई टिकट कारोबारी को पकड़ा गया, उसके भी उक्त गैंग की तरह सूरत से तार जुड़े थे। इन मामलों के पकड़े जाने के बाद रेलवे बोर्ड तक हल्ला मचा। मुंबई और सूरत की खुफिया एजेंसियों को अलर्ट कर दिया गया, लेकिन आज तक ई टिकट माफिया हाथ नहीं आ सके हैं।
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सॉफ्टवेयर को हैक करने में माहिर
रेलवे के सभी सॉफ्टवेयर प्रोग्राम सेंटर फॉर रेलवे इंफोरमेशन सिस्टम (क्रिस) तैयार करता है। रेलवे की ई टिकट की व्यवस्था आईआरसीटीसी के हाथों में है। आईआरसीटीसी से लाइसेंस लेकर ही लोग ई टिकट बनाने का धंधा कर सकते हैं। चूंकि, जब यात्री को कंफर्म टिकट नहीं मिलता है तो उसके पास तत्काल के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता है। संबंधित स्टेशन से ट्रेन खुलने के एक दिन पहले तत्काल टिकट बनते हैं। एसी कोच में सुबह दस बजे और स्लीपर के लिए सुबह 11 बजे से तत्काल टिकट बनते हैं। जालसाज उक्त सॉफ्टवेयर को हैक करके तत्काल सीटों पर कब्जा कर लेते हैं। उनके गिरोह से जुड़े लोग चंद सेकेंडों में तत्काल सीटों पर कब्जा कर लेते हैं। इधर, खिड़कियों पर आरक्षण कराने वाले यात्रियों को मायूस होकर लौटना पड़ता है।
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आरपीएफ की क्राइम ब्रांच की टीम ने आठ नवंबर को बांदा के नरैनी निवासी संदीप वर्मा को प्रतिबंधित सॉफ्टवेयर का उपयोग कर अवैध रूप से ई टिकट बनाते पकड़ा था। उसके कंप्यूटर में पिछले एक महीने का रिकार्ड बरामद हुआ था। जिसमें पूर्व यात्रा के 58 टिकटों व आगामी नौ टिकट का लेखाजोखा पाया गया। जांच में जब परतें खुलीं तो क्राइम ब्रांच के होश उड़ गए। जांच में पता लगा कि उक्त अवैध कारोबारी के तार मुंबई महानगर में बैठे हैकरों से जुड़े हैं। इस हैकर गिरोह ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार कर रखा है जिसने आईआरसीटीसी के ई टिकट के तत्काल टिकट प्रोग्राम को हैक कर रखा है। ये गिरोह तत्काल टिकट का समय शुरू होने से आधे घंटे पहले संबंधित अवैध कारोबारी के पास एक लिंक भेजता है।
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लिंक मिलते ही कारोबारी पहले से ही दो या तीन तत्काल टिकटों के फार्म ऑनलाइन भरकर तैयार रखता है। एक फार्म पर चार यात्रियों के टिकट बनते हैं। तत्काल टिकट खुलते ही लिंक की मदद से 20 सेकेंड के अंदर ही उक्त यात्रियों के कंफर्म टिकट बन जाते हैं। उक्त कारोबारी पिछले दो साल से यह काम कर रहा था। कुछ दिन बाद ही फतेहपुर में एक और ई टिकट कारोबारी को पकड़ा गया, उसके भी उक्त गैंग की तरह सूरत से तार जुड़े थे। इन मामलों के पकड़े जाने के बाद रेलवे बोर्ड तक हल्ला मचा। मुंबई और सूरत की खुफिया एजेंसियों को अलर्ट कर दिया गया, लेकिन आज तक ई टिकट माफिया हाथ नहीं आ सके हैं।
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सॉफ्टवेयर को हैक करने में माहिर
रेलवे के सभी सॉफ्टवेयर प्रोग्राम सेंटर फॉर रेलवे इंफोरमेशन सिस्टम (क्रिस) तैयार करता है। रेलवे की ई टिकट की व्यवस्था आईआरसीटीसी के हाथों में है। आईआरसीटीसी से लाइसेंस लेकर ही लोग ई टिकट बनाने का धंधा कर सकते हैं। चूंकि, जब यात्री को कंफर्म टिकट नहीं मिलता है तो उसके पास तत्काल के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता है। संबंधित स्टेशन से ट्रेन खुलने के एक दिन पहले तत्काल टिकट बनते हैं। एसी कोच में सुबह दस बजे और स्लीपर के लिए सुबह 11 बजे से तत्काल टिकट बनते हैं। जालसाज उक्त सॉफ्टवेयर को हैक करके तत्काल सीटों पर कब्जा कर लेते हैं। उनके गिरोह से जुड़े लोग चंद सेकेंडों में तत्काल सीटों पर कब्जा कर लेते हैं। इधर, खिड़कियों पर आरक्षण कराने वाले यात्रियों को मायूस होकर लौटना पड़ता है।