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30 फीसदी पानी में लहलहाई फलों की फसल, उत्पादन भी अधिक

Tue, 01 Sep 2020 10:57 PM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Tue, 01 Sep 2020 10:57 PM IST
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Drip sinchai good productin fruits
झांसी। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में ड्रिप इरीगेशन (टपक सिंचाई) का मॉडल तैयार किया गया है। फलों की फसल पर इस्तेमाल की गई इस पद्धति के काफी सकारात्मक परिणाम निकलकर सामने आए हैं। इस पद्धति से महज 30 फीसदी पानी में ही फलों की फसल लहलहा उठी है। यही नहीं, उत्पादन भी अधिक मिला है। बुंदेलखंड जैसे कम पानी वाले क्षेत्र के लिए टपक सिंचाई बहुत कारगर साबित हो सकती है।
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ड्रिप इरगिेशन सिंचाई की एक विशेष विधि है, जिसमें पानी और खाद की बचत होती है। इस विधि में पानी थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कम अंतराल पर प्लास्टिक की नालियों द्वारा सीधा पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है। परंपरागत सतही सिंचाई द्वारा जल का उचित उपयोग नहीं हो पाता, क्योंकि अधिकतर पानी, जोकि पौधों को मिलना चाहिए, जमीन में रिसकर या वाष्पीकरण द्वारा व्यर्थ चला जाता है। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में इस पद्धति का फलों की फसल पर उपयोग किया गया है। इसके काफी सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। पहले तो यह फसल औसत से काफी कम पानी में हो गई। इसके अलावा उत्पादन भी अधिक मिला है।
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प्रधानमंत्री भी दे चुके पद्धति के बढ़ावे पर जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ड्रिप, माइक्रो इरिगेशन और स्प्रिंकलर से फसलों की सिंचाई करने पर जोर दे चुके हैं। केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के ऑनलाइन लोकार्पण के दौरान पीएम ने कहा था कि किसानों को इन मॉडल के सकारात्मक परिणाम दिखाने के लिए भी कहा था। उनका मत था किसान आंखों से देखी चीज पर ज्यादा भरोसा करते हैं, कानों से सुनी पर कम।
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ड्रिप इरिगेशन अथवा टपक सिंचाई विधि का मॉडल विश्वविद्यालय में तैयार किया गया है। इसके तहत महज 30 फीसदी पानी में फलों की फसल के अच्छे परिणाम निकलकर सामने आए हैं। कई किसानों को यह मॉडल दिखाकर ड्रिप इरिगेशन पद्धति अपनाने के लिए प्रेरित भी किया गया है। खासकर बुंदेलखंड की परिस्थिति के मद्देनजर यह पद्धति बेहद कारगर है।
- डॉ. अरविंद कुमार, कुलपति, रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय।
ये हैं मुख्य विशेषताएं
- टपक सिंचाई पद्धति से समय, मजदूरी का खर्च भी कम होता है।
- जड़ क्षेत्र में पानी सदैव पर्याप्त मात्रा में रहता है।
- फसल को हर दिन या एक दिन छोड़कर पानी दिया जाता है।
- पानी अत्यंत धीमी गति से दिया जाता है।
- जमीन में वायु व जल की मात्रा उचित क्षमता स्थिति पर बनी रहने से फसल की वृद्धि तेजी से और एक समान रूप से होती है।
ये हैं लाभ
- पेड़ पौधों को प्रतिदिन जरूरी मात्रा में पानी मिलता है। फलस्वरूप बढ़ोतरी व उत्पादन दोनों में वृद्धि होती है।
- टपक सिंचाई से फल, सब्जी और अन्य फसलों के उत्पादन में 20% से 50% तक बढ़ोतरी संभव है।
- टपक सिंचाई से 30 से 60 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है।
- ऊबड़-खाबड़, क्षारयुक्त, बंजर जमीन, शुष्क खेती वाली, पानी के कम रिसाव वाली जमीन और अल्प वर्षा की क्षारयुक्त जमीन और समुद्र तटीय जमीन भी खेती हेतु उपयोग में लाई जा सकती है।
- फर्टिगेशन से पोषकतत्व बराबर मात्रा में सीधे पौधों की जडों में पहुंचाए जाते हैं, जिसकी वजह से पौधे पोषक तत्वों का उपयुक्त इस्तेमाल कर पाते हैं।
- पानी सीधे फसल की जड़ों में दिया जाता है। आसपास की जमीन सूखी रहने से अनावश्यक खरपतवार विकसित नहीं होते। इससे जमीन के सभी पौष्टिक तत्व केवल फसल को मिलते हैं।
- इस पद्धति से पेड़-पौधों का स्वस्थ विकास होता है, जिनमें कीट तथा रोगों से लड़ने की ज्यादा क्षमता होती है। कीटनाशकों पर होने वाले खर्चे में भी कमी होती है।

- जड़ के क्षेत्र को छोड़कर बाकी भाग सूखा रहने से निराई-गुड़ाई, खुदाई, कटाई आदि काम बेहतर ढंग से किए जा सकते हैं। इससे मजदूरी, समय और पैसे तीनों की बचत होती है।
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