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Jhansi News: राज्यसभा में नुमाइंदगी करने वाले बुंदेलखंड के पहले नेता थे डा. रिछारिया

Fri, 29 Mar 2024 02:41 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 29 Mar 2024 02:41 AM IST
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Dr. Richhariya was the first leader of Bundelkhand to represent in Rajya Sabha.
- लंबे समय तक खादी कमीशन बोर्ड के रहे उपाध्यक्ष
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। लोकसभा के पांचवे चुनाव में झांसी-ललितपुर संसदीय सीट से जीत हासिल करने वाले डा. गोविंददास रिछारिया बुंदेलखंड के पहले ऐसे नेता था, जिन्हें संसद के उच्च सदन राज्यसभा में भी नुमाइंदगी का मौका मिला था। लंबे अरसे तक वह जिला परिषद के अध्यक्ष और खादी कमीशन बोर्ड के उपाध्यक्ष रहे। लोकसभा चुनाव में उन्होंने लगातार तीन बार की सांसद डा. सुशीला नैय्यर को मात दी थी। समयाभाव के चलते जनता से दूरी बन जाने की वजह से एक बार उन्होंने खादी कमीशन बोर्ड से इस्तीफा दे दिया था, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अस्वीकार कर दिया था।
बुंदेलखंड में डा. रिछारिया की पहचान गांधीवादी नेता के रूप में थी। देश की आजादी के आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भूमिका अदा की थी। सन 1971 में हुए लोकसभा के आम चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें झांसी-ललितपुर संसदीय सीट से प्रत्याशी बनाया था और उन्होंने अपने पहले चुनाव में तीन बार सांसद रह चुकीं डा. सुशीला नैय्यर को हराया था। लोकसभा का उनका एक ही कार्यकाल रहा। अपने राजनीति सफर में वह लगातार 19 साल तक जिला परिषद के अध्यक्ष रहे थे। जबकि, छह सालों तक वह खादी कमीशन बोर्ड के उपाध्यक्ष भी रहे। राष्ट्रीय स्तर की संस्था के उपाध्यक्ष होने के नाते उन्हें देश भर का भ्रमण करना पड़ता था। इससे उनकी स्थानीय लोगों से दूरी बढ़ती जा रही थी। लोगों की ओर से इसकी शिकायत आने पर उन्होंने बोर्ड की अध्यक्ष और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपना इस्तीफा सौंप दिया था, जिसे उन्होंने नामंजूर कर दिया था। तीन महीने बाद उनके इस्तीफे को मंजूर किया गया था और इसके बाद उन्हें 1984 में राज्यसभा सदस्य बना दिया गया था। उन्हें राष्ट्रपति ने राज्यसभा के लिए नामित किया था। वह बुंदेलखंड के पहले ऐसे नेता थे, जिन्हें राज्यसभा में जाने का मौका मिला था। राज्यसभा का कार्यकाल पूरा करने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी।
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वादा पूरा करने के लिए बेटे का कटवा दिया था टिकट
अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के उपाध्यक्ष हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि डा. रिछारिया बुंदेलखंड के पहले ऐसे नेता थे, जिन्हें संसद के दोनों सदनों में नुमाइंदगी का मौका मिला था। वे जुबान के बहुत पक्के थे। सन 1980 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने झांसी सदर सीट से चौधरी मुकीम को टिकट दिलाने का वादा किया था, जबकि कांग्रेस ने टिकट उनके बेटे ओमप्रकाश रिछारिया का घोषित कर दिया था। लेकिन, डा. रिछारिया ने अपने बेटे का टिकट कटवाकर चौधरी मुकीम को प्रत्याशी घोषित कराया था। हालांकि, इस चुनाव में कांग्रेस ने उनके बेटे को ललितपुर से टिकट दिया था और वे वहां से जीतने में कामयाब हो गए थे। उन्हें प्रदेश सरकार में मंत्री भी बनाया गया था।
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