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अयोध्या की खोई चमक लौटाने वाले झांसी के लाल को भूल गई दुनिया
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झांसी। बैदोरा गांव का दो हजार वर्गफुट का खंडहरनुमा मकान अचानक केंद्र में आ गया है। यह वही घर है, जिसमें अयोध्या में राम मंदिर का प्रमाण देने वाले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डा. बीबी लाल (बृजबासी लाल) का जन्म हुआ था। यह मकान डा. लाल के पिता ने गांव के एक व्यक्ति को बेचा था, जो सालों से बंद पड़ा हुआ है। इसके अलावा गांव में हनुमान जी के एक मंदिर का निर्माण भी डा. लाल के परिवार ने कराया था। बबीना ब्लाक के गांव बैदोरा के लोगों को फक्र है कि डा. लाल का जन्म उनके गांव में हुआ था। साथ ही इस बात का मलाल भी है कि झांसी इतनी महान शख्सियत को भूल गया। उनका कहना है कि लोगों ने ब्रिटेन की महारानी के निधन पर तो शोक जताया, परंतु डा. लाल के निधन पर शोक संवेदना तक जाहिर नहीं की।
डा. बीबी लाल का जन्म 02 मई 1921 को झांसी के ग्राम बैदोरा में हुआ था। उनके पिता रामचरण लाल ब्रिटिश सरकार में कानूनगो थे। डा. लाल के जन्म के ढाई साल बाद उनका परिवार झांसी शहर के जुगयाना मुहल्ले में आकर रहने लगा था। इंटरमीडिएट की शिक्षा उनकी जीआईसी में हुई थी और इसके बाद उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए वे प्रयागराज चले गए थे।
101 साल की आयु में उनका 10 सितंबर 2022 को दिल्ली में निधन हुआ। डा. लाल ही वे शख्स थे जिन्होंने अपनी शोधों के जरिये रामायण और महाभारत को काल्पनिक बताने वालों को करारा जवाब दिया था। समुद्र के भीतर समाई श्रीकृष्ण की द्वारिका नगरी पर भी उन्होंने बड़ा शोध किया था। इसके अलावा उनके द्वारा लिखी पुस्तकें ‘इंद्रप्रस्थ: द बेकिंग टाइम ऑफ दिल्ली’ व ‘टाइम्स ऑफ ऋग्वेद एरा पीपल्स’ जो अपने आप में बेजोड़ हैं। हिंदू धर्म को उन्होंने अपनी शोधों के जरिये प्रमाणिकता प्रदान की थी। बावजूद, ऐसी शख्यिसत को झांसी भुला बैठा। उनके निधन पर न तो यहां दुख जताया गया और न ही उनकी उपलब्धियों पर चर्चा करने की किसी ने जहमत उठाई। बस, लेकिन उनके गांव के लोग अपने इस ‘लाल’ जरूर याद कर रहे हैं। निधन पर दुख जता रहे हैं तो उनकी उपलब्धियों पर गौरव जाहिर कर रहे हैं।
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बुजुर्ग बताते थे कि गांव से जाने के बाद भी डा. लाल के पिता यहां आते रहते थे। वे हमेशा लोगों को बच्चों की शिक्षा के प्रति प्रेरित करते थे। हालांकि, यहां से जाने के बाद डा. लाल कभी गांव नहीं आए।
- गयाप्रसाद
पुरानी पीढ़ी के मुंह सुना है कि डा. लाल के परिवार के कई सदस्य अंग्रेजी शासनकाल में राजस्व विभाग में कार्यरत थे। वे उस दौर में बैदोरा गांव के लोगों की खूब मदद भी किया करते थे।
- वीर सिंह
गांव में डा. बीबी लाल की प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए। साथ ही उनसे जुड़े सभी जगहों को संरक्षित किया जाना चाहिए। गांव की दशा भी संवारी जानी चाहिए।
- महेश कुमार पुरोहित
डा. लाल ने बैदोरा के साथ-साथ झांसी का नाम भी रोशन किया है। वे झांसी के सच्चे ‘लाल’ थे। छोटे से गांव में जन्म लेने के बाद उन्हें देश को उसकी पहचान बताई।
- धनीराम सेन
छह हजार की आबादी वाले छोटे से गांव बैदोरा को डा. लाल ने नई पहचान दी है। सरकार को गांव का नाम बदलकर डा. लाल के नाम पर कर देना चाहिए।
- फेरन सिंह राजपूत
झांसी आने पर आई थी गांव की याद
झांसी। अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के उपाध्यक्ष व बुंदेली संस्कृति के जानकार हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि कुछ साल पहले वे राजकीय संग्रहालय में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने झांसी आए थे। यहां उनका सम्मान किया गया था। तब उन्होंने अपनी जन्म स्थली ग्राम बैदोरा को याद किया था। उनका मन गांव जाने का था, परंतु वृद्धावस्था की वजह से वे जा नहीं पाए थे। ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि झांसी ने अपने इस लाल को निधन के बाद भी याद नहीं किया।
प्रमाणिक बातों पर ही विश्वास करते थे लाल
झांसी। बुंदेली इतिहासकार मुकुंद मेहरोत्रा ने बताया कि डा. बीबी लाल से सालों पहले दिल्ली में मिलना हुआ था। मैं झांसी का रहने वाला हूं, इस नाते से उन्होंने मुझे खासी तवज्जो दी थी। उनसे बुंदेलखंड के इतिहास पर चर्चा हुई थी। वे प्रमाणिक बातों पर ही विश्वास करते थे। साथ ही, सुनी हुई बातों की प्रमाणिकता तलाशने के लिए प्रेरित करते थे। रानी झांसी व मेजर ध्यानचंद की तरह ही झांसी में डा. लाल को याद किया जाना चाहिए। राम मंदिर, रामायण, महाभारत के उनके शोधों को लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए।
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डा. बीबी लाल का जन्म 02 मई 1921 को झांसी के ग्राम बैदोरा में हुआ था। उनके पिता रामचरण लाल ब्रिटिश सरकार में कानूनगो थे। डा. लाल के जन्म के ढाई साल बाद उनका परिवार झांसी शहर के जुगयाना मुहल्ले में आकर रहने लगा था। इंटरमीडिएट की शिक्षा उनकी जीआईसी में हुई थी और इसके बाद उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए वे प्रयागराज चले गए थे।
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101 साल की आयु में उनका 10 सितंबर 2022 को दिल्ली में निधन हुआ। डा. लाल ही वे शख्स थे जिन्होंने अपनी शोधों के जरिये रामायण और महाभारत को काल्पनिक बताने वालों को करारा जवाब दिया था। समुद्र के भीतर समाई श्रीकृष्ण की द्वारिका नगरी पर भी उन्होंने बड़ा शोध किया था। इसके अलावा उनके द्वारा लिखी पुस्तकें ‘इंद्रप्रस्थ: द बेकिंग टाइम ऑफ दिल्ली’ व ‘टाइम्स ऑफ ऋग्वेद एरा पीपल्स’ जो अपने आप में बेजोड़ हैं। हिंदू धर्म को उन्होंने अपनी शोधों के जरिये प्रमाणिकता प्रदान की थी। बावजूद, ऐसी शख्यिसत को झांसी भुला बैठा। उनके निधन पर न तो यहां दुख जताया गया और न ही उनकी उपलब्धियों पर चर्चा करने की किसी ने जहमत उठाई। बस, लेकिन उनके गांव के लोग अपने इस ‘लाल’ जरूर याद कर रहे हैं। निधन पर दुख जता रहे हैं तो उनकी उपलब्धियों पर गौरव जाहिर कर रहे हैं।
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बुजुर्ग बताते थे कि गांव से जाने के बाद भी डा. लाल के पिता यहां आते रहते थे। वे हमेशा लोगों को बच्चों की शिक्षा के प्रति प्रेरित करते थे। हालांकि, यहां से जाने के बाद डा. लाल कभी गांव नहीं आए।
- गयाप्रसाद
पुरानी पीढ़ी के मुंह सुना है कि डा. लाल के परिवार के कई सदस्य अंग्रेजी शासनकाल में राजस्व विभाग में कार्यरत थे। वे उस दौर में बैदोरा गांव के लोगों की खूब मदद भी किया करते थे।
- वीर सिंह
गांव में डा. बीबी लाल की प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए। साथ ही उनसे जुड़े सभी जगहों को संरक्षित किया जाना चाहिए। गांव की दशा भी संवारी जानी चाहिए।
- महेश कुमार पुरोहित
डा. लाल ने बैदोरा के साथ-साथ झांसी का नाम भी रोशन किया है। वे झांसी के सच्चे ‘लाल’ थे। छोटे से गांव में जन्म लेने के बाद उन्हें देश को उसकी पहचान बताई।
- धनीराम सेन
छह हजार की आबादी वाले छोटे से गांव बैदोरा को डा. लाल ने नई पहचान दी है। सरकार को गांव का नाम बदलकर डा. लाल के नाम पर कर देना चाहिए।
- फेरन सिंह राजपूत
झांसी आने पर आई थी गांव की याद
झांसी। अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के उपाध्यक्ष व बुंदेली संस्कृति के जानकार हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि कुछ साल पहले वे राजकीय संग्रहालय में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने झांसी आए थे। यहां उनका सम्मान किया गया था। तब उन्होंने अपनी जन्म स्थली ग्राम बैदोरा को याद किया था। उनका मन गांव जाने का था, परंतु वृद्धावस्था की वजह से वे जा नहीं पाए थे। ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि झांसी ने अपने इस लाल को निधन के बाद भी याद नहीं किया।
प्रमाणिक बातों पर ही विश्वास करते थे लाल
झांसी। बुंदेली इतिहासकार मुकुंद मेहरोत्रा ने बताया कि डा. बीबी लाल से सालों पहले दिल्ली में मिलना हुआ था। मैं झांसी का रहने वाला हूं, इस नाते से उन्होंने मुझे खासी तवज्जो दी थी। उनसे बुंदेलखंड के इतिहास पर चर्चा हुई थी। वे प्रमाणिक बातों पर ही विश्वास करते थे। साथ ही, सुनी हुई बातों की प्रमाणिकता तलाशने के लिए प्रेरित करते थे। रानी झांसी व मेजर ध्यानचंद की तरह ही झांसी में डा. लाल को याद किया जाना चाहिए। राम मंदिर, रामायण, महाभारत के उनके शोधों को लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए।