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राजनीति में भी हाथ आजमाए थे सरदार ने
झांसी / ब्यूरो
Updated Thu, 16 Jul 2015 12:45 AM IST
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जरायम की दुनिया का कुख्यात चेहरा बन चुके सरदार सिंह गुर्जर ने एक समय राजनीति में भी हाथ आजमाया था। शुरुआती दौर में खासी सफलता भी हासिल हो गई थी। ब्लाक प्रमुख से शुरू हुआ राजनीति का सफर विधानसभा की दावेदारी तक पहुंच गया था। लेकिन, इससे आगे बात न बढ़ पाई और सितारे एक बार फिर अपराध जगत में वापस लौटा लाए।
सरदार सिंह गुर्जर पिछले तीन दशक से अपराध की दुनिया का एक जाना पहचाना चेहरा है। लेकिन, सरदार के जीवन में एक मोड़ वह भी आया था, जब वह अपराध से नाता तोड़ राजनीति में किस्मत आजमाने लगा था। इसकी शुरुआत उसने बड़ागांव ब्लाक प्रमुख के चुनाव से की थी। अपनी दबंग छवि का पूरा इस्तेमाल करते हुए सरदार ने साल 2001 में बड़ागांव ब्लाक प्रमुख का चुनाव जीत भी लिया था और वह राजनीति की मुख्य धारा में शामिल हो गया था। इसके बाद सरदार ने राष्ट्रीय लोकदल का दामन थाम लिया था। उसे राष्ट्रीय लोकदल का जिलाध्यक्ष बना दिया गया था। इस पद के साथ सरदार तेजी से राजनीति में पैर पसारने लगा था। उत्साहित सरदार ने 2007 के विधानसभा चुनाव के लिए जिले की गरौठा विधानसभा से दावेदारी भी ठोक दी थी। गुर्जर समाज की अच्छी खासी संख्या वाली इस विधानसभा सीट पर उसकी दावेदारी को मजबूत माना जाने लगा था। इसी के चलते बहुजन समाज पार्टी ने भी गरौठा से सरदार को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया था। लेकिन, उसका चुनाव लड़ने का मंसूबा पूरा नहीं हो पाया। प्रत्याशी घोषित करने के कुछ समय बाद बसपा ने सरदार से किनारा कर लिया। इसी दरम्यान सरदार के भतीजे चंद्रशेखर गुर्जर की हत्या हो गई। इसी कड़ी में अजय वर्मा हत्याकांड जुड़ गया, जिससे एक बार फिर सरदार का नाम पुलिस के वांटेड अपराधियों की सूची में शामिल हो गया तथा राजनीतिक सफर का अंत हो गया।
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सरदार सिंह गुर्जर पिछले तीन दशक से अपराध की दुनिया का एक जाना पहचाना चेहरा है। लेकिन, सरदार के जीवन में एक मोड़ वह भी आया था, जब वह अपराध से नाता तोड़ राजनीति में किस्मत आजमाने लगा था। इसकी शुरुआत उसने बड़ागांव ब्लाक प्रमुख के चुनाव से की थी। अपनी दबंग छवि का पूरा इस्तेमाल करते हुए सरदार ने साल 2001 में बड़ागांव ब्लाक प्रमुख का चुनाव जीत भी लिया था और वह राजनीति की मुख्य धारा में शामिल हो गया था। इसके बाद सरदार ने राष्ट्रीय लोकदल का दामन थाम लिया था। उसे राष्ट्रीय लोकदल का जिलाध्यक्ष बना दिया गया था। इस पद के साथ सरदार तेजी से राजनीति में पैर पसारने लगा था। उत्साहित सरदार ने 2007 के विधानसभा चुनाव के लिए जिले की गरौठा विधानसभा से दावेदारी भी ठोक दी थी। गुर्जर समाज की अच्छी खासी संख्या वाली इस विधानसभा सीट पर उसकी दावेदारी को मजबूत माना जाने लगा था। इसी के चलते बहुजन समाज पार्टी ने भी गरौठा से सरदार को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया था। लेकिन, उसका चुनाव लड़ने का मंसूबा पूरा नहीं हो पाया। प्रत्याशी घोषित करने के कुछ समय बाद बसपा ने सरदार से किनारा कर लिया। इसी दरम्यान सरदार के भतीजे चंद्रशेखर गुर्जर की हत्या हो गई। इसी कड़ी में अजय वर्मा हत्याकांड जुड़ गया, जिससे एक बार फिर सरदार का नाम पुलिस के वांटेड अपराधियों की सूची में शामिल हो गया तथा राजनीतिक सफर का अंत हो गया।
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