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बीयू: नहीं लौटाई जा रही सिक्योरिटी मनी
ब्यूरो
Updated Wed, 18 Nov 2015 01:03 AM IST
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झांसी। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में कई महीने से एक फर्म संचालक की धरोहर राशि लटकी हुई है। संचालक दो बार इस संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिख चुका है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो सका है।
गौरतलब है कि बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में बास्केटबॉल के कोर्ट, एल्युमिनियम फिटिंग समेत विभिन्न कार्यों के लिए पंद्रह सितंबर 2014 को भूपेंद्र कुमार ने अपनी फर्म के नाम से टेंडर डाला था। इसके लिए उन्होंने 24 हजार रुपये सिक्योरिटी मनी जमा की थी। परचेज कमेटी के समक्ष खुले टेंडर में उनकी फर्म की दरें अन्य के मुकाबले सबसे कम निकली थीं। कंप्रेटिव लेटर में भी उनकी फर्म का नाम दर्ज किया गया था।
कमेटी ने उनके टेंडर को प्रथम प्रोजेक्ट के रूप में चुनते हुए दो-तीन दिन में वर्क ऑर्डर ले जाने की बात कही। कई दिनों तक चक्कर लगाने के बावजूद भूपेंद्र की फर्म को टेंडर न देते हुए किसी अन्य फर्म को वर्क ऑर्डर दे दिया गया। इसकी शिकायत फर्म संचालक ने तत्कालीन कुलसचिव से की थी। इस पर उन्होंने जांच कमेटी का गठन कर दिया था। जांच में परचेज कमेटी ने पक्ष रखते हुए बताया कि फर्म ने निर्धारित समय के बाद फॉर्म खरीदकर आवेदन किया था, इसलिए उसे खारिज कर दिया गया।
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इस पर फर्म संचालक ने तर्क दिया कि इसमें उसकी गलती क्या है। बाद में बीयू प्रशासन ने कैश काउंटर पर बैठने वाले कर्मचारी का ट्रांसफर कर दिया। इसके बाद फर्म संचालक ने अपनी सिक्योरिटी मनी लौटाने के लिए विश्वविद्यालय अधिकारियों से कई बार पत्राचार किए, लेकिन अभी तक उसकी राशि नहीं लौटाई गई है।
भूपेंद्र का कहना है कि कुलपति को दो बार शिकायती पत्र दे चुके हैं और उन्होंने वित्त विभाग को पैसा लौटाने के लिए निर्देशित भी कर दिया है लेकिन संबंधित विभाग आदेशों की अवलेहना कर रहा है।
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गौरतलब है कि बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में बास्केटबॉल के कोर्ट, एल्युमिनियम फिटिंग समेत विभिन्न कार्यों के लिए पंद्रह सितंबर 2014 को भूपेंद्र कुमार ने अपनी फर्म के नाम से टेंडर डाला था। इसके लिए उन्होंने 24 हजार रुपये सिक्योरिटी मनी जमा की थी। परचेज कमेटी के समक्ष खुले टेंडर में उनकी फर्म की दरें अन्य के मुकाबले सबसे कम निकली थीं। कंप्रेटिव लेटर में भी उनकी फर्म का नाम दर्ज किया गया था।
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कमेटी ने उनके टेंडर को प्रथम प्रोजेक्ट के रूप में चुनते हुए दो-तीन दिन में वर्क ऑर्डर ले जाने की बात कही। कई दिनों तक चक्कर लगाने के बावजूद भूपेंद्र की फर्म को टेंडर न देते हुए किसी अन्य फर्म को वर्क ऑर्डर दे दिया गया। इसकी शिकायत फर्म संचालक ने तत्कालीन कुलसचिव से की थी। इस पर उन्होंने जांच कमेटी का गठन कर दिया था। जांच में परचेज कमेटी ने पक्ष रखते हुए बताया कि फर्म ने निर्धारित समय के बाद फॉर्म खरीदकर आवेदन किया था, इसलिए उसे खारिज कर दिया गया।
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इस पर फर्म संचालक ने तर्क दिया कि इसमें उसकी गलती क्या है। बाद में बीयू प्रशासन ने कैश काउंटर पर बैठने वाले कर्मचारी का ट्रांसफर कर दिया। इसके बाद फर्म संचालक ने अपनी सिक्योरिटी मनी लौटाने के लिए विश्वविद्यालय अधिकारियों से कई बार पत्राचार किए, लेकिन अभी तक उसकी राशि नहीं लौटाई गई है।
भूपेंद्र का कहना है कि कुलपति को दो बार शिकायती पत्र दे चुके हैं और उन्होंने वित्त विभाग को पैसा लौटाने के लिए निर्देशित भी कर दिया है लेकिन संबंधित विभाग आदेशों की अवलेहना कर रहा है।