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आयुर्वेद की रामबाण औषधियों के लिए सोना है बुंदेलखंड की माटी
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झांसी। असाध्य रोगों के कारगर इलाज में समर्थ आयुर्वेद की कई श्रेष्ठ जड़ी- बूटियों के लिए बुंदेलखंड की माटी मुफीद है। ललितपुर-झांसी के जंगलों में कई ऐसी जड़ी- बूटियां हैं, जिनमें गिलोय या अमृता, तुलसी, एलोवेरा, सफेद मूसली, बबूल, नीम, आंवला, मदार समेत कई अन्य औषधि प्राकृतिक रूप से उत्तम गुण धारण किए हुए हैं। यहां दवाओं के रूप में देश-विदेश तक की चिकित्सा जरूरतों को पूरा करने के संसाधन हैं। औषधि निर्माण के लिए बड़ी औद्योगिक इकाई स्थापित हो सकती हैं। इससे क्षेत्र में रोजगार और समृद्धि के भी अवसर हैं।
बृहस्पतिवार और शुक्रवार को देशभर में धनतेरस का पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा। इस दिन ही आयुर्वेद चिकित्सा के जनक कहे जाने वाले भगवान धनवंतरि की जयंती भी है। घर- परिवार में आरोग्य का वरदान रहे तो खुशियां बढ़ जाती हैं। बुंदेलखंड की माटी में ऐसी तमाम औषधियां पनपती हैं, जिन्हें आयुर्वेद में रामबाण माना जाता है। इनमें अश्वगंधा, सफेद मूसली, पुनर्नवा, पलाश, जटामासी, महुआ, खैर, गिलोय, बेल, आंवला, हरिद्रा, मुस्तक, नागकेसर, गुग्गुल, भ्रंगराज, अपामार्ग, गुंजा, तुलसी, बाबुची, बचा, गंभारी, सहजन, कंठकारी, सहजन, कुटज, बबूल, नीम, मदार आदि प्रमुख हैं।
हृदय रोग, अस्थमा हो या मुंह का अलसर कारगर हैं यहां की औषधि: प्रो.केदारनाथ यादव
बुंदेलखंड के ललितपुर, झांसी, शिवपुरी, ओरछा के जंगलों में मिलने वाली जड़ी- बूटियां विशेष हैं। बुंदेलखंड राजकीय आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर केदारनाथ यादव के अनुसार यहां पाई जाने वाली अड़ोसा कफ, अस्थमा, पीठ दर्द के इलाज में रामबाण औषधि साबित होती है। इसी तरह कामराज से मुंह के अलसर व डायरिया में और अर्जुन हृदय रोग के इलाज में बहुत कारगर है। खैर का उपयोग त्वचा संबंधी रोगों की औषधि बनाने में और गुग्गुल का गठिया या जोड़ों के दर्द के इलाज में किया जाता है।
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बबूल भी है खास
बुंदेलखंड क्षेत्र में पैदा होने वाला बबूल बहुत खास है। इसका उपयोग तमाम रोगों के इलाज में किया जाता है। बबूल आयुर्वेद की दवाओं के निर्माण में बेजोड़ बाइंडिंग एजेंट (दवाओं को बांधने वाला) होता है। यहां की जलवायु बबूल के लिए अनुकूल है। इसी तरह यहां की तुलसी, नीम भी खास हैं।
गिलोय और तुलसी हैं कमाल के
डेंगू और कोरोना से बचाव के लिए इम्युनिटी बढ़ाने में गिलोय और तुलसी बहुत उपयोगी हैं। बुंदेलखंड क्षेत्र में नीम भी अच्छी गुणवत्ता वाले होते हैं। इस कारण यहां नीम के पेड़ पर बढ़ने वाली गिलोय भी अति उत्तम रहती है। यही हाल यहां होने वाली तुलसी का है। कोरोना काल में यहां पैदा हुई इन दोनों औषधियों ने लोगों को बहुत राहत दी।
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बृहस्पतिवार और शुक्रवार को देशभर में धनतेरस का पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा। इस दिन ही आयुर्वेद चिकित्सा के जनक कहे जाने वाले भगवान धनवंतरि की जयंती भी है। घर- परिवार में आरोग्य का वरदान रहे तो खुशियां बढ़ जाती हैं। बुंदेलखंड की माटी में ऐसी तमाम औषधियां पनपती हैं, जिन्हें आयुर्वेद में रामबाण माना जाता है। इनमें अश्वगंधा, सफेद मूसली, पुनर्नवा, पलाश, जटामासी, महुआ, खैर, गिलोय, बेल, आंवला, हरिद्रा, मुस्तक, नागकेसर, गुग्गुल, भ्रंगराज, अपामार्ग, गुंजा, तुलसी, बाबुची, बचा, गंभारी, सहजन, कंठकारी, सहजन, कुटज, बबूल, नीम, मदार आदि प्रमुख हैं।
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हृदय रोग, अस्थमा हो या मुंह का अलसर कारगर हैं यहां की औषधि: प्रो.केदारनाथ यादव
बुंदेलखंड के ललितपुर, झांसी, शिवपुरी, ओरछा के जंगलों में मिलने वाली जड़ी- बूटियां विशेष हैं। बुंदेलखंड राजकीय आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर केदारनाथ यादव के अनुसार यहां पाई जाने वाली अड़ोसा कफ, अस्थमा, पीठ दर्द के इलाज में रामबाण औषधि साबित होती है। इसी तरह कामराज से मुंह के अलसर व डायरिया में और अर्जुन हृदय रोग के इलाज में बहुत कारगर है। खैर का उपयोग त्वचा संबंधी रोगों की औषधि बनाने में और गुग्गुल का गठिया या जोड़ों के दर्द के इलाज में किया जाता है।
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बबूल भी है खास
बुंदेलखंड क्षेत्र में पैदा होने वाला बबूल बहुत खास है। इसका उपयोग तमाम रोगों के इलाज में किया जाता है। बबूल आयुर्वेद की दवाओं के निर्माण में बेजोड़ बाइंडिंग एजेंट (दवाओं को बांधने वाला) होता है। यहां की जलवायु बबूल के लिए अनुकूल है। इसी तरह यहां की तुलसी, नीम भी खास हैं।
गिलोय और तुलसी हैं कमाल के
डेंगू और कोरोना से बचाव के लिए इम्युनिटी बढ़ाने में गिलोय और तुलसी बहुत उपयोगी हैं। बुंदेलखंड क्षेत्र में नीम भी अच्छी गुणवत्ता वाले होते हैं। इस कारण यहां नीम के पेड़ पर बढ़ने वाली गिलोय भी अति उत्तम रहती है। यही हाल यहां होने वाली तुलसी का है। कोरोना काल में यहां पैदा हुई इन दोनों औषधियों ने लोगों को बहुत राहत दी।