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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Jhansi News ›   Bundela King Madhukarshah's contribution in the development of Vrindavan's Rasik Bihari Temple

Jhansi News: वृंदावन के रसिकबिहारी मंदिर के विकास में रहा बुंदेला राजा मधुकरशाह का योगदान

Sat, 14 Jan 2023 06:30 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sat, 14 Jan 2023 06:30 AM IST
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Bundela King Madhukarshah's contribution in the development of Vrindavan's Rasik Bihari Temple
झांसी। वृंदावन के ठाकुर रसिक बिहारी महाराज और ओरछा रियासत का गहरा नाता रहा है। 16 वीं सदी की शुरूआत में ओरछा के इतिहास में उल्लेख मिलता है कि महाराजा मधुकरशाह ठाकुर रसिक बिहारी के परम भक्त थे। प्रतिवर्ष वह वृंदावन जाकर इसी मंदिर में कृष्ण आराधना करते थे। इस मंदिर की गद्दी पर आसीन संत हरिदास के शिष्य रसिक देव महाराज की जन्मभूमि भी बुंदेलखंड में ही थी, इस कारण इस मंदिर की देखरेख व विकास में मधुकरशाह का विशेष योगदान रहा। एक धार्मिक कथा आज भी प्रचलित है कि ओरछा के राजा ने जब रसिक बिहारी भगवान को ओरछा में याद किया तो वे खीर का भोग लगाने वृंदावन से ओरछा चले आए थे, इसके बाद से आज तक वृंदावन में दोपहर के समय रसिक बिहारी महाराज को खीर का ही भोग लगता है।
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दोपहर में खीर के भोग की परंपरा ओरछा की ही देन: महंत
वृंदावन के रसिक बिहारी मंदिर के महंत वृंदावन शरण देवाचार्य जी महाराज बताते हैं कि ओरछा के महाराजा मधुकर शाह परम कृष्ण भक्त थे। वृंदावन के रसिक बिहारी मंदिर पर हर वर्ष उनका प्रवास होता था तथा यहां रहकर भगवान की भक्ति करते थे। भक्तमाल ग्रंथ में एक कथा आती है कि एक बार महाराजा मधुकरशाह अपनी रियासत ओरछा में ही भगवान रसिक बिहारी की आराधना कर रहे थे, उन्होंने दोपहर के समय जैसे ही ध्यान करके खीर का भोग लगाया तो ठाकुर जी वहां प्रकट हो गए। यहां वृंदावन में पुजारी जी दोपहर का भोग लगाने के लिए अंदर गए तो ठाकुर जी नहीं थे। महंत जी बताते हैं कि यह देखकर कुछ देर के लिए सभी लोग आश्चर्य में पड़ गए , यह बात उस समय के महंत रसिक देव जी महाराज को बताई गई, उन्होंने ध्यान करके कहा कि कुछ देर में आ जाएंगे। कुछ देर बाद देखा तो ठाकुर रसिक बिहारी सिंहासन पर विराजमान थे तथा उनके हाथ खीर से सने थे, इसके बाद से मंदिर में यह नियम बना दिया गया है कि दोपहर का भोग खीर का ही लगाया जाता है, यह परंपरा ओरछा की ही देन है।
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औड़छौ वृंदावन सो गांव..
पं. देवशरण शास्त्री वृंदावन बताते हैं कि ओरछा के राजा मधुकर शाह का अपनी महारानी से इसी बात पर विवाद हुआ था कि राजा वृंदावन जाना चाहते थे और महारानी अयोध्या। इसके बाद महारानी कुंअर गणेश अयोध्या से रामजी को ओरछा लाईं, पर मधुकरशाह वृंदावन में किस मंदिर में जाकर आराधना करते थे, यह बहुत कम लोग जानते हैं। वृंदावन में महाराजा की आराधना स्थली था रसिक बिहारी जी का प्राचीन मंदिर। वह इतने परम भक्त थे कि उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं में भी ओरछा की वृंदावन से ही तुलना की है, उन्होंने लिखा है, औड़छौ वृंदावन सौ गांव, जहां चरत सुख सील पहरिया सुंदर श्यामा गाय।
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