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झांसी: मन्नतों के बाद मिले बेटों ने घर से निकाला तो बेटियों ने माता-पिता को संभाला

Wed, 09 Dec 2020 09:24 AM IST
झांसी ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी Published by: झांसी ब्यूरो Updated Wed, 09 Dec 2020 09:24 AM IST
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jhansi son throw his old age parents from house daughters took care
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

एक बेटे की चाहत में लोग सात-सात बेटियां पैदा कर लेते हैं लेकिन जिनके सात बेटे हैं, उनसे मां-बाप संभल नहीं रहे हैं। झांसी, ललितपुर में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां बेटों ने मां-बाप को बुढ़ापे में घर से बाहर निकाल दिया। बेटों के उत्पीड़न का शिकार मां-बाप डिप्रेशन में चले गए हैं। इसके बाद बेटियां ही बुढ़ापे की लाठी बनकर माता-पिता की सेवा कर रही हैं।

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कई लोग आज भी बेटा और बेटी में भेद करते हैं। पिछले कुछ दिनों में झांसी में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां बेटी पैदा होने पर उसे मरने के लिए सड़क पर फेंक दिया गया। किसी नवजात बच्ची को कुत्तों ने नोंचकर मरणासन्न कर दिया तो किसी की सांसें अस्पताल पहुंचने तक थम गईं। मगर समाज में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां बेटों से ज्यादा बेटियां मां-बाप की सेवा कर रही हैं।
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परिजनों ने बड़े लाड़ प्यार से पाल पोसकर बेटों को बड़ा किया मगर बुजुर्ग होने पर जब बेटों ने मां-बाप को घर से बाहर निकाल दिया तो वह डिप्रेशन का शिकार हो गए। उनका इलाज मनोचिकित्सकों के पास चल रहा है। वह अपनी पीड़ा बताते-बताते डॉक्टर के सामने फफककर रोने लगते हैं। कई परिजनों को बेटों ने घर से बाहर निकाल दिया है तो कोई मांग-मांग कर खाना खाने को मजबूर है। वहीं, बेटियां मां-बाप के इलाज से लेकर आर्थिक सहायता तक कर रही हैं।
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पिछले पांच सालों में बुजुर्गों में 30 फीसदी डिप्रेशन बढ़ा
जिला अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. शिकाफा जाफरीन ने बताया कि पिछले पांच सालों में झांसी में बुजुर्गों में डिप्रेशन के मामलों में 25 से 30 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। कई मामलों में माता-पिता बेटों के सताए हुए आते हैं। किसी ने प्रॉपर्टी अपने नाम लिखवाकर परिजनों को घर से निकाल दिया, तो कोई रोजाना मारपीट का शिकार हो रहे हैं। कई मामलों में तो बुजुर्ग मां-बाप बेटों की अनदेखी से डिप्रेशन का शिकार हो गए। डॉ. शिकाफा का कहना है कि मॉर्डन लाइफ स्टाइल और सोशल मीडिया के दौर में बच्चे माता-पिता को नजरअंदाज कर रहे हैं। ज्यादातर समय घर के बाहर गुजरता है। फिर जो समय घर में परिजनों के साथ बातचीत करने को होता है, उसमें बच्चे मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं। इससे बुजुर्ग अकेलापन महसूस करने लगते हैं और धीरे-धीरे डिप्रेशन में चले जाते हैं।

रिश्तों की त्रासदी बताने वाले ये हैं मामले...

परेशान मां ने लिया था आत्महत्या का फैसला
अलीगोल खिड़की निवासी वृद्ध महिला के तीन बेटे हैं। सभी ने प्रॉपर्टी का बंटवारा करा लिया। इसके बाद बहू से विवाद शुरू हुआ तो घर से बाहर निकाल दिया। इससे वृद्धा डिप्रेशन में आ गई। उन्होंने आत्महत्या तक करने का फैसला कर दिया। तभी एक रिश्तेदार उन्हें मनोचिकित्सक के पास लाया और इलाज शुरू हुआ। अब सेहत तो ठीक है लेकिन बेटों के सितम की बात याद आने पर आंसू निकल पड़ते हैं।

मांगकर खाना खाने को मजबूर
सीपरी बाजार की रहने वाले बुजुर्ग को दो बेटे होने के बावजूद किसी ने अपने पास नहीं रखा। इस घटना का उनके दिमाग पर इतना असर पड़ा कि वह विक्षिप्त से हो गए। हालांकि, अभी उनका मनोचिकित्सक के पास इलाज चल रहा है। बताया गया कि बहुत मुरादों के बाद उनके घर पर बेटे हुए थे। बहुत लाड़ प्यार से उन्होंने बेटों को पालकर बड़ा किया। अब उन्हें लोगों से मांगकर खाना खाना पड़ रहा है।

सात बेटों हैं फिर भी वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर
ललितपुर के रहने वाले दंपती के सात बेटे हैं मगर कोई भी बुढ़ापे की लाठी नहीं बना। ढलती उम्र के साथ मां-बाप को कोई न कोई शारीरिक समस्याएं होनी शुरू हुईं तो एक-एक कर सभी बेटों ने उनसे दूरी बनानी शुरू कर दी। मां-बाप को अपमानित करना शुरू कर दिया। न उनका इलाज कराया और न ही साथ रखा। अब वह वृद्ध आश्रम में रहने को मजबूर हैं। किसी तरह अपना इलाज करा रहे हैं।

चोट लगने पर तड़पती रही मां, बेटों ने नहीं दिया ध्यान
मऊरानीपुर की रहने वाली वृद्ध महिला के पति की मौत हो चुकी है। घर पर चार बेटे और एक बेटी के साथ वह रह रही हैं। सभी बेटे नौकरी पेशा हैं। एक दिन सिर पर भारी वस्तु गिरने के कारण बुजुर्ग महिला का सिर फट गया। वह तड़पती रही लेकिन कोई भी बेटा इलाज कराने के लिए अस्पताल लेकर नहीं आया। सभी ऑफिस जाने की बात कहते हुए चले गए। तब नवीं में पढ़ने वाली बेटी उन्हें अस्पताल लाई।

बेटियां स्ट्रेचर पर लेकर जाती हैं लकवाग्रस्त पिता को
शहर के रहने वाले एक वृद्ध लकवाग्रस्त हैं। उनकी दो बेटियां और दो बेटे हैं। एक बेटा नशे का लती है तो दूसरा कामकाज में इतना व्यस्त रहता है कि महीनों घर ही नहीं आता। लकवा होने पर उन्हें इलाज के लिए समय-समय पर अस्पताल लाना पड़ता है। हर बार दोनों बेटियां ही उन्हें अस्पताल लाती हैं। स्ट्रेचर पर चढ़ाने-उतारने का काम दोनों मिलकर करती हैं। बेटियां न होतीं तो पता नहीं कैसे इलाज होता।

बेटे-बहू ने नहीं रखा ख्याल, डिप्रेशन के शिकार
नंदनपुरा के दंपती का एक ही बेटा है और दिल्ली में पत्नी संग रहता है। दोनों नौकरी पेशा हैं। बुजुर्ग मां-बाप बेटे को झांसी आकर रहने या फिर उन्हें ही दिल्ली बुला लेने की बात कहते रहते थे। मगर बेटा टाल देता था। पत्नी की मैटरनिटी लीव खत्म होने के बाद बेटे ने मां-बाप को बच्चे की देखभाल के लिए दिल्ली बुला लिया। जब बच्चा स्कूल जाने लायक हो गया तो फिर झांसी भेज दिया। इससे मां-बाप डिप्रेशन का शिकार हो गए।
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