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ये रानी का शहर है साहब! यहां घर-धर में सदभाव बसता है सद्भाव

Jhansi Bureauझांसी ब्यूरो Updated Mon, 11 Nov 2019 01:36 AM IST
सिंधी तिराहा पर सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस। अमर उजाला
सिंधी तिराहा पर सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस। अमर उजाला
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झांसी। अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले तमाम शंकाएं मंडरा रहीं थीं। लेकिन, इन सब से दूर झांसी के आम बाशिंदे रानी की सद्भाव की विरासत के प्रहरी बने खड़े हुए थे। न्यायालय के फैसले का सभी वर्ग के लोगों ने खुले दिल से स्वागत किया। दशकों की कानूनी लड़ाई में कौन जीता और किसको मिली हार, ये चर्चा में नहीं रहा। बात तो केवल सद्भाव की हुई और जीता भी सौहार्द।
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अंग्रेजों के विरुद्ध संग्राम का बिगुल झांसी की धरती से फूंका गया था। रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में 1857 में लड़ा गया ये युद्ध विश्व के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। स्वराज्य के इस संग्राम में जहां रानी ने महिला अस्मिता का परचम फहराया था, तो वहीं सद्भाव की भी बड़ी मिसाल पेश की थी। रानी के साथ बड़ी संख्या में मुस्लिमों ने भी युद्ध में हिस्सा लिया था। इनमें प्रमुख नाम रानी के मुख्य तोपची गुलाम गौस खां का आता है, जिन्होंने झांसी की धरती की आन, बान और शान की खातिर हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। इसके अलावा इस युद्ध में बड़ी संख्या में पठान सैनिकों ने हिस्सा लिया था। युद्ध के दौरान रानी के इर्दगिर्द सुरक्षा में पठान सैनिक तैनात रहते थे। पठान सैनिकों की टुकड़ी रानी की आखिरी सांस तक फिरंगी सेना से मुुकाबला करती रही। रानी की महिला टुकड़ी में भी बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं शामिल थीं। रानी की सेना में कौन हिंदू था और कौन मुसलमान, इसका कोई भेद नहीं था। सभी झांसी के बाशिंदे थे और अपनी रानी व धरती की खातिर युद्ध के मैदान में थे।
रानी की सौहार्द की ये विरासत आज भी झांसी की रग-रग में बसी हुई है। यही वजह है कि यहां कभी सांप्रदायिक दंगों के हालात नहीं बने। अयोध्या पर फैसले से पहले तमाम शंकाएं मंडरा रहीं थीं। इसका अंदाजा प्रशासन की तैयारियों से भी लगाया जा सकता है। चप्पे-चप्पे पर पुलिस की तैनाती की गई थी और खुफिया तंत्र भी हर गतिविधि की टोह लेने में जुटा हुआ था। वहीं, दूसरी ओर ‘हम’ (‘ह’ से हिंदू और ‘म’ से मुसलमान) खड़े हुए थे झांसी की सौहार्द की विरासत की ढाल बनकर।
सद्भाव - 1
मुहर्रम में आगे रहती है बढ़ई की मस्जिद
रानी लक्ष्मीबाई ने मुहर्रम पर रानी महल के पास ताजिया सजाने की परंपरा की शुरुआत की थी, जो आज भी कायम है। रानी ने ताजिया बनाने की जिम्मेदारी धर्मदास बढ़ई को सौंपी थी। इस परिवार की पीढ़ी दर पीढ़ी इस जिम्मेदारी का निर्वहन करतीं आ रही हैं। मुहर्रम के जुलूस में अब भी सबसे आगे रानी का ताजिया रहता है, जिसे बढ़ई की मस्जिद के नाम से भी जाना जाता है।
सद्भाव - 2
मुस्लिम कारीगर बनाते हैं दुर्गा प्रतिमा
फूटा चौपड़ा स्थित काली बाड़ी में दुर्गा उत्सव के दौरान सजने वाली मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण मुस्लिम कारीगरों द्वारा किया जाता है। पहले ये प्रतिमा सालों तक मुहम्मद अब्दुल बनाते रहे। उनके गुजरने के बाद इस जिम्मेदारी को उनके पुत्र ने अपने ऊपर ले लिया। अब वे पिछले कई वर्षों से प्रतिमा का निर्माण पूरी शिद्दत से करते आ रहे हैं।
सद्भाव - 3
ईद हो या दिवाली, साथ हैं हम
छनियापुरा निवासी इब्राहिम खान के घर ईद या अन्य कोई पारिवारिक आयोजन रावत परिवार के बगैर शुरू नहीं होता। दोनों परिवारों की ये परंपरा 55 साल पुरानी है। पीढ़ी दर पीढ़ी इसका निर्वहन किया जा रहा है। रावत परिवार के पीयूष रावत अपने बुजुर्गों की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं, रावत परिवार के द्वारा इब्राहिम परिवार की जरूरत पर हर तरह की मदद भी की जाती है।
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