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वेस्टर्न के जमाने में सारंगी जीवित रखना चाहते अंशुल

Thu, 26 Sep 2019 01:57 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 26 Sep 2019 01:57 AM IST
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anshul live sarangi in western culture
anshul live sarangi in western culture - फोटो : DEHAT
वेस्टर्न के जमाने में सारंगी जीवित रखना चाहते अंशुल
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ओमप्रकाश दुबे
झांसी। यूं तो सारंगी की पूरे देश के संगीत जगत में अपनी अलग पहचान रही है पर बुंदेलखंड व राजस्थान के लोकसंगीत में तो यह कभी प्राण बनकर रची बसी थी। वक्त बदला और उसके साथ बदले संगीत के संस्कार, वेस्टर्न म्यूजिक ने सारंगी को पीछे धकेल वायलन को स्थापित कर दिया। बुंदेलखंड की गली-गली में लोक और राग के संगम को साकार करने वाले सारंगी विधा के कलाकार धीरे-धीरे विलुप्त होने लगे हैं, यह अब केवल किसी बस अड्डे या ट्रेन के अंदर लोगों के सामने सारंगी बजाकर उनका मनोरंजन करते दिखाई देते हैं। इस दौर में भी झांसी निवासी दिनेश कुमार एक ऐसे शख्स हैं जो अपने बेटे अंशुल टुकवार को बाकायदा संगीत अकादमी में भेजकर सारंगी का प्रशिक्षण दिलवा रहे हैं, इन्हें देखकर लगता है गुन न हिरानो गुन गाहक हिरानो है।
झांसी के मोहल्ला पुलिया नंबर नौ निवासी दिनेश कुमार स्वयं भी संगीत में खासी रुचि रखते हैं। इनका कहना है इन्होंने अपने बेटे अंशुल टुकवार को पांच वर्ष की आयु से ही सारंगी का प्रशिक्षण दिलवाना प्रारंभ कर दिया था। अब अंशुल सत्रह वर्ष के हो चुके हैं वे सांरगी पर राग मालकोष,भैरवी , दीपचंदी जैसे रागों पर भी बड़े ही सफाई के साथ सारंगी के तारों पर सरगम से खेलते हैं। सारंगी में लोक संगीत के साथ शास्त्रीय ज्ञान भी मिल सके इसके लिए अंशुल गुरुकुल म्यूजिक अकादमी झांसी में ही गायन व वादन सीख चुके हैं। इन दिनों वह मुंबई में में उस्ताद फारूख लतीफ खान से सारंगी के गुर सीख रहे हैं। अंशुल वेस्टर्न म्यूजिक के दौर में सारंगी बजाकर उन लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत हो सकते हैं जो अपनी संस्कृति और संगीत से दूर हो रहे हैं।
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टुकवार का कहना है कि वह बड़े होकर न केवल सारंगी विधा में पारंगत होना चाहते हैं, बल्कि वह एक बार फिर अपने से हुनर से बुंदेलखंड की धरती पर यहां के लोक संगीत ढोला मारु, ढिमरयाई लोक गायन के माध्यम से सारंगी के सुरों को जीवित करना चाहते हैं।
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