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हिंदी तो है वरदान, हर जरूरत पूरी कर बढ़ाती है मान, आइए इस पर गर्व करें

Thu, 06 Aug 2020 12:43 PM IST
झांसी ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी Published by: झांसी ब्यूरो Updated Thu, 06 Aug 2020 12:43 PM IST
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amarujala hindi hai hum jhansi youth artists share their views on Hindi language
युवाओं ने साझा किए अपने विचार - फोटो : अमर उजाला

हिंदी जोड़ती है, परिवेश से, समाज से अलग-अलग क्षेत्रों में उनके पूरकों से। अभिनेता को अभिनय से, संवाद को भाव से, विक्रेता को खरीदार से, वकील को मुवक्किल से और डॉक्टर को मरीज से। 

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हिंदी की बदौलत सफलता और यश की सीढ़ियां चढ़ रहे युवाओं और हिंदी प्रेमियों ने अमर उजाला से हिंदी के बारे में अनुभव साझा किए। साथ ही, व्यवहारिक कारण भी बताए। 
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सभी ने माना कि हिंदी मात्र भाषा भर नहीं, हर वर्ग की जरूरत और ख्वाहिशों को पूरा करने का माध्यम है। तकनीक, कॉरपोरेट, उद्योग, कला, संस्कृति, रंगमंच, शिक्षा सब इसकी शरण लेते हैं। इसलिए इस पर गर्व करना और सम्मान देना सभी का फर्ज है।
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हिंदी मुख से निर्मल बहती है, अंग्रेजी बहुत अटकाती है: डॉ. हिमांशु द्विवेदी
बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र के संस्थापक रंगकर्मी डॉ. हिमांशु द्विवेदी का कहना है कि बच्चा जब जन्म लेता है तो वह अपने परिवेश के कारण मातृभाषा में ही सीखने की शुरुआत करता है। 

उसका बौद्धिक विकास होता है। इस दौरान वह जिस भाषा को ग्रहण करता है वह उसके लिए जीवन भर सहज रहती है। हम लोगों की मातृभाषा चूंकि हिंदी है इसलिए हमारी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम यही है। 

आज हो यह रहा है कि बच्चा पलता, बढ़ता तो हिंदी के पिरवेश में है, लेकिन उस पर अंग्रेजी माध्यम थोप दिया जाता है। आपने देखा होगा अंग्रेजी बोलते वक्त लोग अधिकतर अटकते हैं... आई थिंक...आई थिंक, यू नो.., यू नो.. दरअसल यह भाषा में असहजता की वजह से होता है। 

क्योंकि कुछ बोलने से पहले सोचना पड़ता है। हिंदी में यह बहुत सहज भाव से होता है। लेकिन अंग्रेजी बोलते वक्त मूल रूप से व्यक्ति हिंदी भाषी पहले सोचता है फिर दिमाग में उसका अंग्रेजी में अनुवाद करता है और इसके बाद अभिव्यक्त करता है। 

इस प्रक्रिया में समय लगता है इसी वजह से संकोच, हिचकिचाहट या अड़चन होती है। इसके विपरीत हिंदी में बोलते वक्त सहजता, आत्मविश्वास झलकता है। यही हम रंगकर्मियों की ताकत है कि संवाद और भाव अंदर से आते हैं।

 

हिंदी नहीं आती तो अच्छे अभिनेता बन ही नहीं सकते: सिमरन कौर
मूल रूप से झांसी निवासी अभिनेत्री सिमरन कौर का कहना है कि मैं एक पंजाबी परिवार से हूं। घर में अधिकतर पंजाबी बोली जाती है। कुछ समझदार हुई तो हिंदी से पहचान हुई। हिंदी अच्छी सरल और सहज लगी। 

आज स्थिति यह है कि मैं पंजाबी से ज्यादा हिंदी में सहजता महसूस करती हूं। मिस बुंदेलखंड 2017 प्रतियोगिता में भाग लिया तो उस वक्त सुना था कि अंग्रेजी में बोलना बेहतर रहता है। लेकिन जब मेरा मौका आया तो मैंने अपना परिचय व प्रश्नों के उत्तर सब हिंदी में दिया। 

इससे मेरा आत्मविश्वास और हिंदी में आस्था दोनों बढ़ीं। फिर मुंबई आई तो यहां भी शुरूआत में अंग्रेजी का दबदबा दिखा। मैंने साफ कहा कि मैं हिंदी पृष्ठभूमि से हूं। इसलिए हिंदी में ही बातचीत करूंगी। 

फिर लोग खुद मुझे हिंदी में ही जवाब देने लगे। मुझे एक साल में ही अच्छी पहचान मिली और की काम मिले। हिंदी फिल्म श्रीदेवी बंग्लो में न्यूज एंकर बनी। मेरे पास अंग्रेजी, हिंदी, पंजाबी और मराठी चार भाषाओं में एक चुनने का विकल्प था। 

मैंने हिंदी न्यूज एंकर बनना पसंद किया। सीरियल क्राइम पेट्रोल, मुस्कान और क्राइम अलर्ट में लीड भूमिका निभाई। एक बात दावे के साथ कह सकती हूं कि आपको कितनी ही अच्छी अंग्रेजी आती हो, लेकिन अगर हिंदी नहीं आती तो अच्छे अभिनेता बन ही नहीं सकते।

मेरे अभिनय के क्षेत्र में आगे बढ़ने में हिंदी का मुख्य योगदान: अजीम शेख
मूल रूप से खाती बाबा निवासी अभिनेता अजीम शेख के अनुसार हिंदी की ताकत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि हिंदी सिनेमा पूरी दुनिया में बहुत पसंद किया जाता है। 

 

अकेले हिंदी भाषा की फिल्में सबसे बड़ा 43 प्रतिशत बॉक्स ऑफिस राजस्व का योगदान करती हैं। हिंदी जानने, समझने और बोलने वालों की बढ़ती संख्या के चलते अब विश्व भर की वेबसाइट हिंदी को भी महत्व दे रही हैं। 

ईमेल, ई-कॉमर्स, ई-बुक, इंटरनेट, एसएमएस और वेब जगत में हिंदी को बड़ी सहजता से पाया जा सकता है। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल जैसी कंपनियां व्यापक बाजार और भारी लाभ को देखते हुए हिंदी प्रयोग को बढ़ावा दे रही हैं। 

मैं भी सोशल मीडिया पर शुभचिंतकों से जुड़ने के लिए हमेशा हिंदी भाषा का ही प्रयोग करता हूं। मेरी खुशकिस्मती है कि मैं हिंदी भाषी हूं और मेरे अभिनय के क्षेत्र में आगे बढ़ने में हिंदी का मुख्य योगदान है। 

हिंदी के बिना मैं अपने अभिनय जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकता। हिंदी की अच्छी समझ होने कि वजह से पिछले 11 वर्षों से मुझे लगातार हिंदी फिल्मों वेब सीरीज और लघु फिल्मों में काम करने का मौका मिलता रहा है। 

जल्द ही मेरी एक हिंदी फिल्म ‘शैडो ऑफ डॉ. अंबेडकर’ आ रही है जिसमें मैं बाबा साहेब के भतीजे मुकुंद की भूमिका में हूं। इसके अलावा दो अन्य फिल्में ‘मंडी’ और ‘साक्षी’ भी अगले वर्ष आएंगी। 

फिलहाल मुझे सोनी टीवी के शो क्राइम पेट्रोल में नियमित रूप से विभिन्न भूमिकाओं में देखा जा सकता है। मेरी जो भी पहचान है हिंदी भाषा से ही है।

 

वकील साहब मुवक्किल से भी अंग्रेजी ही बोलते रहेंगे, तो क्या वह लौट कर आएगा: डॉ. एलसी साहू
बुंदेलखंड महाविद्यालय (बीकेडी) में विधि संकाय में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. एलसी साहू के अनुसार हिंदी हमारा आधार है। हमारा परिवेश हमें हिंदी सिखाता है, अंग्रेजी हमें प्रयत्न कर सीखनी पड़ती है। सहजता तो हिंदी में ही रहेगी। 

इसलिए बच्चे और यहां तक की बड़े भी जितनी जल्दी हिंदी में बातों को समझ लेते हैं उतनी सहजता से अंग्रेजी में संभव नहीं होता। आप देखिए योग, आयुर्वेद सभी में पर्याप्त मात्रा में शोध भी हिंदी में हैं। 

हमारे पर्व, त्योहार, संस्कृति का जितना अच्छा वर्णन हिंदी में है उतना और किसी भाषा में करना और समझना संभव ही नहीं है। अपने परिवेश और समाज को समझने के लिए हिंदी बहुत जरूरी है। 

कोई भी पेशा या व्यापार हो उसके अधिकतर ग्राहक और उपभोक्ता भी हिंदी से ही होते हैं। मिसाल के तौर पर आप अंग्रेजी पढ़ लेते हैं, बोल लेते हैं अच्छे वकील भी बन गए पर आपका मुवक्किल तो हिंदी वाला ही होगा अब आप उससे अंग्रेजी में बात करेंगे तो न वो समझ पाएगा और न लौट कर आएगा। हिंदी जनजन की भाषा है। इसका महत्व समझना होगा और सम्मान करना होगा।

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