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खिलौनों से खेलने की उम्र में धो रहे कप प्लेट
Jhansi
Updated Wed, 12 Jun 2013 05:30 AM IST
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केस- एक: नीलू की उम्र करीब नौ वर्ष के आसपास होगी। आमतौर पर इस उम्र के बच्चे घरों में खिलौनों से खेलते नजर आते है। लेकिन, ढाबे पर काम करते वक्त नीलू की उम्र का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। वह ग्राहकों के आर्डर भी लेता है और जूठी प्लेटों को उठाकर टेबल पर कपड़ा भी मारता है। दिन के ग्यारह बजे से रात दस बजे तक काम करने वाले नीलू को दो वक्त के खाने के अलावा महज 750 रुपये दिए जाते हैं। शोषण का यह दर्द उसकी बातचीत में भी झलकता है। वह कहता है कि शौक तो पढ़ने का था, लेकिन पारिवारिक मजबूरियों ने भविष्य इस तरफ मोड़ दिया।
केस - दो: बर्फ की फैक्ट्री में काम करने वाले अशरफ ने अभी दो माह पहले ही अपने जीवन के दस साल पूरे किए हैं। वह पिछले तीन सालों में ऑटो पार्ट्स, घरेलू नौकर और बसों में पानी के पाउच बेचने का काम कर चुका है। उसकी उम्र भले ही कच्ची है, लेकिन परिस्थितियों ने उसकी देह और हौसलों को मजबूत बना दिया है। फैक्ट्री में वह बर्फ की सिल्लियों को इधर से उधर रखने और खाली रैक में पानी भरने का काम करता है। उसी के बराबर काम करने वाले 30 साल के साथी को इस काम के 1800 रुपये मिलते हैं, लेकिन अशरफ को महज 1200 रुपये देकर ही चलता कर दिया जाता है। वह शोषण के खिलाफ आवाज तो उठाना चाहता है, लेकिन अशिक्षित होने के कारण शिकायत कहां करे, उसे नहीं मालूम।
झांसी। यह मात्र कुछ उदाहरण हैं, जो हमारे आसपास चल रहे बालश्रम की हकीकत को बयां करते हैं। हम दिन में ऐसे ही न जाने कितने ‘नीलू’ और ‘अशरफ’ से रूबरू होते होंगे। लेकिन, उनके शोषण को रोकने के लिए न आम लोगों ने कभी आवाज उठाई और न ही इसके लिए जिम्मेदार श्रम विभाग ने प्रभावी अभियान चलाया। शोषण के शिकार इन बाल श्रमिकों को बाल श्रम उन्मूलन दिवस और उनके अधिकारों के बारे में भी जानकारी नहीं हैं।
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2008 के बाद भूल गए अभियान चलाना
चार वर्ष पहले शासन के निर्देश पर 2008-09 में बाल श्रमिक सर्वे के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में टीम गठित की गई थी, जिसमें नायब तहसीलदार, सहायक बेसिक शिक्षाधिकारी, सहायक विकास अधिकारी, स्वयं सेवी संस्था व श्रम प्रवर्तन अधिकारी शामिल किए गए थे। टीम ने जनपद में बाल श्रमिकों के चिन्हांकन के सर्वे के दौरान 1262 बाल श्रमिक चिह्नित किए थे। इनमें खतरनाक प्रक्रिया में कार्यरत 914 व गैर खतरनाक में 348 बाल श्रमिक पाए गए थे। विभागीय अधिकारियों के अनुसार सभी बच्चों की सूची बनाकर बीएसए के पास भेज दी गई थी। बीएसए कार्यालय से विभाग को यह रिपोर्ट प्राप्त हुई कि सिभी बच्चों का प्रवेश प्राइमरी स्कूल में करा दिया गया। श्रम प्रवर्तन अधिकारी अशोक यादव के अनुसार चिह्नित किए गए बाल श्रमिकों के बारे में जानकारी करने पर पता चला कि उनमें से ज्यादातर बच्चे कचरा बीनने के काम में लगे हुए थे।
चिह्नित होने पर मिलता परिवार को रोजगार
बाल श्रमिक का चिह्नांकन होने के बाद उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए प्रयास किए जाते हैं। श्रम विभाग द्वारा ऐसे बाल श्रमिकों के परिवार को किसी सरकारी योजना से जोड़कर रोजगार उपलब्ध कराया जाता है। इससे समाज की मुख्य धारा से जुड़ने में मदद मिलती है।
नहीं मिले बाल श्रमिक, परियोजना बंद
हमें और आपको सड़कों पर मजदूरी कर रोजी-रोटी की जुगाड़ कर रहे बाल श्रमिक भले ही नजर आ जाएं, लेकिन श्रम विभाग को शायद यह नहीं दिखता। भारत सरकार द्वारा बाल श्रमिकों के हितार्थ 2006 में राष्ट्रीय बाल श्रमिक परियोजना शुरू की गई थी। परियोजना के माध्यम से चालीस श्रमिक विद्यालय बांदा में खोले गए थे। श्रमिक विद्यालय चलाने की जिम्मेदारी स्वयं सेवी संस्थाओं को दी गई थी। तीन वर्ष तक विद्यालय सुचारु रूप से चलने के बाद 2009 में परियोजना बंद कर दी गई। श्रम विभाग के अधिकारियों के अनुसार दोबारा सर्वे कराए जाने पर कोई भी बाल श्रमिक नहीं मिला।
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केस - दो: बर्फ की फैक्ट्री में काम करने वाले अशरफ ने अभी दो माह पहले ही अपने जीवन के दस साल पूरे किए हैं। वह पिछले तीन सालों में ऑटो पार्ट्स, घरेलू नौकर और बसों में पानी के पाउच बेचने का काम कर चुका है। उसकी उम्र भले ही कच्ची है, लेकिन परिस्थितियों ने उसकी देह और हौसलों को मजबूत बना दिया है। फैक्ट्री में वह बर्फ की सिल्लियों को इधर से उधर रखने और खाली रैक में पानी भरने का काम करता है। उसी के बराबर काम करने वाले 30 साल के साथी को इस काम के 1800 रुपये मिलते हैं, लेकिन अशरफ को महज 1200 रुपये देकर ही चलता कर दिया जाता है। वह शोषण के खिलाफ आवाज तो उठाना चाहता है, लेकिन अशिक्षित होने के कारण शिकायत कहां करे, उसे नहीं मालूम।
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झांसी। यह मात्र कुछ उदाहरण हैं, जो हमारे आसपास चल रहे बालश्रम की हकीकत को बयां करते हैं। हम दिन में ऐसे ही न जाने कितने ‘नीलू’ और ‘अशरफ’ से रूबरू होते होंगे। लेकिन, उनके शोषण को रोकने के लिए न आम लोगों ने कभी आवाज उठाई और न ही इसके लिए जिम्मेदार श्रम विभाग ने प्रभावी अभियान चलाया। शोषण के शिकार इन बाल श्रमिकों को बाल श्रम उन्मूलन दिवस और उनके अधिकारों के बारे में भी जानकारी नहीं हैं।
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2008 के बाद भूल गए अभियान चलाना
चार वर्ष पहले शासन के निर्देश पर 2008-09 में बाल श्रमिक सर्वे के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में टीम गठित की गई थी, जिसमें नायब तहसीलदार, सहायक बेसिक शिक्षाधिकारी, सहायक विकास अधिकारी, स्वयं सेवी संस्था व श्रम प्रवर्तन अधिकारी शामिल किए गए थे। टीम ने जनपद में बाल श्रमिकों के चिन्हांकन के सर्वे के दौरान 1262 बाल श्रमिक चिह्नित किए थे। इनमें खतरनाक प्रक्रिया में कार्यरत 914 व गैर खतरनाक में 348 बाल श्रमिक पाए गए थे। विभागीय अधिकारियों के अनुसार सभी बच्चों की सूची बनाकर बीएसए के पास भेज दी गई थी। बीएसए कार्यालय से विभाग को यह रिपोर्ट प्राप्त हुई कि सिभी बच्चों का प्रवेश प्राइमरी स्कूल में करा दिया गया। श्रम प्रवर्तन अधिकारी अशोक यादव के अनुसार चिह्नित किए गए बाल श्रमिकों के बारे में जानकारी करने पर पता चला कि उनमें से ज्यादातर बच्चे कचरा बीनने के काम में लगे हुए थे।
चिह्नित होने पर मिलता परिवार को रोजगार
बाल श्रमिक का चिह्नांकन होने के बाद उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए प्रयास किए जाते हैं। श्रम विभाग द्वारा ऐसे बाल श्रमिकों के परिवार को किसी सरकारी योजना से जोड़कर रोजगार उपलब्ध कराया जाता है। इससे समाज की मुख्य धारा से जुड़ने में मदद मिलती है।
नहीं मिले बाल श्रमिक, परियोजना बंद
हमें और आपको सड़कों पर मजदूरी कर रोजी-रोटी की जुगाड़ कर रहे बाल श्रमिक भले ही नजर आ जाएं, लेकिन श्रम विभाग को शायद यह नहीं दिखता। भारत सरकार द्वारा बाल श्रमिकों के हितार्थ 2006 में राष्ट्रीय बाल श्रमिक परियोजना शुरू की गई थी। परियोजना के माध्यम से चालीस श्रमिक विद्यालय बांदा में खोले गए थे। श्रमिक विद्यालय चलाने की जिम्मेदारी स्वयं सेवी संस्थाओं को दी गई थी। तीन वर्ष तक विद्यालय सुचारु रूप से चलने के बाद 2009 में परियोजना बंद कर दी गई। श्रम विभाग के अधिकारियों के अनुसार दोबारा सर्वे कराए जाने पर कोई भी बाल श्रमिक नहीं मिला।