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Jhansi News: आजाद की स्मृति बचाने के लिए 3 लोगों ने दी थी शहादत

Fri, 28 Feb 2025 02:31 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 28 Feb 2025 02:31 AM IST
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3 people gave martyrdom to save the memory of Azad
अमरनाथ
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झांसी। क्रांतिधरा झांसी से अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद का गहरा नाता रहा है। बुंदेलखंड में छह साल बिताकर उन्होंने अपनी क्रांतिकारी विचारधारा को बुलंदी पर पहुंचाया था। अज्ञातवास के दौरान झांसी में मास्टर रुद्र नारायण सिंह के यहां उनका आना-जाना रहा। यहां उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम का ताना-बाना बुना था।

बहुत कम लोग जानते हैं कि झांसी के बड़ा बाजार में चंद्रशेखर आजाद की स्मृति में बनाई गई प्याऊ को कायम रखने के लिए 8 अप्रैल 1951 को जनता और पुलिस के बीच भीषण संघर्ष हुआ था, जिसमें तीन लोग शहीद हो गए थे, जिसे प्याऊ कांड के नाम से जाना जाता है। शहीद चंद्रशेखर आजाद की बृहस्पतिवार को 94वीं पुण्यतिथि है, लेकिन उनकी स्मृति को सहेजा नहीं जा सका है।
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अमर उजाला में 11 अप्रैल 1951 को ‘शहीद चंद्रशेखर की स्मृति कायम रखने का प्रयत्न करते 3 और शहीद’ शीर्षक से खबर प्रकाशित हुई थी। खबर में जिक्र है कि झांसी की जनता अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की स्मृति में बड़ा बाजार में बनाई गई प्याऊ को कायम रखना चाहती थी, जबकि नगरपालिका उसे तोड़ना चाहती थी। जब लोगों की भीड़ प्याऊ पर शहीद आजाद के चित्र के उद्घाटन समारोह में भाग लेने जुलूस के रूप में जा रही थी तो पहले पुलिस ने उनपर लाठीचार्ज किया। इससे खफा जनता ने पुलिस पर पत्थर फेंके। जनता जब लाठीचार्ज से नहीं रुकी तो पुलिस ने उनपर चार बार गोलियां चलाईं। इनसे तीन प्रदर्शनकारी शहीद हो गए और कई लोग घायल हो गए थे।
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हालात बिगड़ने पर अधिकारियों को कर्फ्यू लगाना पड़ा था। तब सांसद कृष्णचंद शर्मा ने इसकी निंदा करते हुए यूपी सरकार से जांच और कार्रवाई की मांग की थी। इतिहासकार मुकुंद मेहरोत्रा बताते हैं कि प्याऊ तोड़ने के बाद यह मुद्दा राजनीतिक रूप से काफी गरमा गया था। लखपत राम शर्मा इसी आंदोलन के चलते एक कद्दावर नेता को हराकर विधायक बने थे।

वरिष्ठ पत्रकार मोहन सिंह नेपाली बताते हैं कि उस दौरान प्याऊ कांड काफी चर्चित हुआ था। उस आंदोलन में साहू, कुशवाहा और पंजाबी समुदाय से एक-एक व्यक्ति शहीद हुआ था, लेकिन इसमें किसी का नाम सामने नहीं आया था। उनका कहना है कि बड़ा बाजार में चंद्रशेखर आजाद

मां की प्रतिमा लगाने के लिए आंदोलन खड़ा हुआ था, चूंकि उनकी मां का निधन आंदोलन से कुछ दिन पहले ही हुआ था।

आजाद की मां ने झांसी में ली थीं अंतिम सांसें

क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की मां जगरानी देवी ने झांसी में 22 मार्च 1951 को अंतिम सांसें ली थीं। क्रांतिकारी सदाशिव राव मलकापुरकर ने पुत्र की भांति उनका अंतिम संस्कार किया था। बड़ागांव गेट बाहर माता जगरानी देवी का समाधि स्थल बना हुआ है, जिस पर उनकी पुण्यतिथि पर सैकड़ों लोग श्रद्धासुमन अर्पित करने पहुंचते हैं।

सातार में डेढ़ साल रहे, किया गुरिल्ला युद्ध का अभ्यास

आजाद ने वर्ष 1924 में झांसी से 14 किमी दूर सातार में अपना ठिकाना बनाया था। यहां बने आजाद के मंदिर में लगे सूचनापट्ट के अनुसार वह यहां करीब डेढ़ वर्ष अज्ञातवास में रहे थे। उनके करीबी मास्टर रुद्र नारायण ने आजाद को हरीशंकर के नाम से लोगों से मिलवाया। उन्हें ब्रह्मचारी संन्यासी के ताैर पर पहचान मिली। 250 दंड, 500 बैठकें, भारी मुगदरों को घुमाना उनकी आवश्यक दिनचर्या थी। सातार के जंगल में उन्होंने गुरिल्ला युद्ध का अभ्यास किया और साथियों को भी कराया। शिकार के बहाने राइफल से निशानेबाजी का अभ्यास भी किया। उनकी कुटिया में उनकी निशानियां अब भी रखी हैं।


n अमर उजाला में 22 मार्च 1976 को प्रकाशित एक लेख में यह भी जिक्र है कि चंद्रशेखर आजाद का रहन-सहन इतना सादा था कि कोई उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्व को भांप नहीं सकता था।



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