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‘अपकी बार सोच समझकर दियो वोट..’ अब सुनाई नहीं देता यह चुनावी शोर

Wed, 17 Apr 2019 08:23 PM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Wed, 17 Apr 2019 08:23 PM IST
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‘अपकी बार सोच समझकर दियो वोट..’ अब सुनाई नहीं देता यह चुनावी शोर
‘अपकी बार सोच समझकर दियो वोट..’ अब सुनाई नहीं देता यह चुनावी शोर
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झांसी। चुनाव आयोग के शिकंजे ने चुनाव प्रचार के तौर तरीकों में काफी बदलाव कर दिया है। जीप, ट्रैक्टर ट्राली और ऑटो में सवार होकर ‘अपकी बार सोच समझकर दियो वोट...’ का शोर भी कम ही सुनाई देता है। चुनावी शोर अब गली मुहल्लों और गांव में सुनाई नहीं देता है। दीवारों पर न तो प्रचार दिखता है और न ही बिल्लों के लिए होड़ मचती हैं।

चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने चुनावी प्रक्रिया में कई बदलाव किए थे। वोटर आईडी बनाने जैसे बड़े परिवर्तन करने के साथ ही प्रत्याशियों को अनियंत्रित और चुनावी खर्चे पर लगाम कसते हुए इसका ब्योरा पेश करने के आदेश भी जारी किए। 1996 में भले ही टीएन शेषन सेवानिवृत्त हो गए, लेकिन चुनाव आयोग के कामकाज की शैली वैसी ही रही। नियम और सख्त होते गए।
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चुनाव आयोग की सख्ती के कारण प्रत्याशी समर्थक ध्वनि विस्तारक यंत्रों (लाउड स्पीकर व अन्य साधन) से प्रचार बंद कर दिया। इतना ही नहीं दीवार लेखन भी बंद हो गया। इनका स्थान बड़े-बड़े फ्लैक्स व होर्डिंग्स ने ले लिए। हालांकि, इन पर खर्च होने वाली राशि प्रत्याशी के चुनावी खर्चे में जोड़े जाने से इनकी भरमार पर भी लगाम लग गई। आयोग की सख्ती लोकसभा प्रत्याशी का चुनाव खर्चा और प्रचार के लिए वाहनों की संख्या निर्धारित करने का असर भी दिख रहा है। अब न तो किसी प्रत्याशी की दर्जनों गाड़ियां घूम रहीं हैं और न ही कोई प्रत्याशी प्रत्यक्ष तौर पर अनाप-शनाप पैसा खर्च कर रहा है।
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80 वर्षीय सिविल लाइन निवासी आरपी गुप्ता ने बताया कि पहले के चुनावों में प्रचार गाड़ियों पर ढोलक और मजीरे लेकर लोक गायक चलते थे। प्रत्याशी के पक्ष में लोक संगीत गाए जाते थे लेकिन चुनाव आयोग की सख्ती के कारण अब लोकगीत सुनाई नहीं देते हैं। 76 वर्षीय बबीना निवासी आरएस साहू ने बताया कि जीप और ट्रैक्टर ट्राली पर खड़े होकर जोकर और नचइया प्रचार करते थे। गली-गली में प्रचार वाहनों से फेंके जाने वाले परचे और बिल्ले भी कम दिखते हैं। दीवार लेखन से जहां पेंटर मायूस हुए हैं। वहीं, लोक कलाकारों को चुनाव में होने वाली आमदनी खत्म हो गई है। अब तो सोशल मीडिया का दौर है।
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