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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Jhansi News ›   फोटो: करगुवा पहाड़ी-Lalitpur

हरी-भरी करगुवां पहाड़ी को कर दिया खोखला, मिट्टी निकालकर बसा दिए गए मुहल्ले

Sat, 17 Nov 2018 03:07 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झांसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झांसी Updated Sat, 17 Nov 2018 03:07 AM IST
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फोटो: करगुवा पहाड़ी-Lalitpur
हरी-भरी करगुवां पहाड़ी को पिछले डेढ़ दशक के दरम्यान खोद-खोदकर खोखला कर दिया गया है। यहां तीन सैकड़ा से अधिक मकान बन चुके हैं। वो भी झांसी विकास प्राधिकरण की मानचित्र स्वीकृति के बगैर। हालात ये हैं कि बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की ओर से पहाड़ी अब भी प्राकृतिक सुंदरता ओढ़े हुए है, जबकि पीछे की ओर से इसका स्वरूप छिन्न-भिन्न हो चुका है। बावजूद, इसके संरक्षण के प्रशासन की ओर से कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।
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बृहस्पतिवार को खनन के दौरान मिट्टी के नीचे दबने से दो मजदूरों की मौत होने के बाद से एकदम से सभी का ध्यान करगुवां पहाड़ी की ओर गया। शहर के बीच कुदरत की इस धरोहर की शुक्रवार को अमर उजाला की टीम ने पड़ताल की, तो हालात भयावह सामने आए। विश्वविद्यालय की ओर से तो पहाड़ी हरी-भरी दिखाई देती है, लेकिन पीछे की ओर से ये खोखली हो चुकी है। पहाड़ी को काट-काटकर जमीन समतल बना दी गई और बसा दिए गए मुहल्ले। पिछले डेढ़ दशक के दरम्यान पहाड़ी की जमीन पर लगभग तीन सैकड़ा से अधिक मकान बनाए जा चुके हैं। ये निर्माण बगैर झांसी विकास प्राधिकरण की स्वीकृति के किए गए हैं।
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यहां रहने वाले कुछ बुजुर्गों का कहना है कि रानी लक्ष्मीबाई ने करगुवां पहाड़ी की जमीन कुशवाहा समाज के लोगों को भेड़ बकरियां चराने के लिए दी थी। तब यहां गिने- चुने परिवार ही रहते थे। बाद में कुछ प्रभावशाली लोगों ने सस्ते दाम पर पहाड़ी के ठीक नीचे की जमीन को खरीद लिया। इसके बाद धीरे-धीरे कर पहाड़ी को खोदना शुरू कर दिया गया। धीरे-धीरे पहाड़ी को काटकर मैदान बना दिया गया और इस मैदान में मकान खड़े होने लगे। प्रभावशाली लोग पहाड़ी के आगे के कुछ हिस्से की रजिस्ट्री करते हैं और प्लाट के खरीदार को सलाह देते हैं कि पीछे का हिस्सा जेसीबी से काट लेना, सब तुम्हारा है। इसी लालच में प्लाट के खरीदार पहाड़ी काटते चले जा रहे हैं। लेकिन, न तो इस ओर प्रशासन का ध्यान है और न ही किसी जिम्मेदार अफसर का। नतीजा, पहाड़ी की प्राकृतिक सुंदरता नष्ट हो गई है। करगुवां पहाड़ी पर बिना मानचित्र स्वीकृत मकान कैसे बन गए? इस सवाल पर जेडीए सचिव त्रिभुवन विश्वकर्मा ने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।
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‘मैंने शुक्रवार को करगुवां में खुदाई के दौरान दो मजदूरों की मौत व एक के घायल होने के स्थान का भ्रमण किया। स्थानीय ग्रामीणों से पूछताछ की और लेखपाल के अभिलेख देखे। अवैध खनन का मामला नहीं पाया गया। प्रश्नगत भूमि संक्रमणीय (निजी) भूमिधर की है। मंदिर की पहाड़ी नहीं है। पीड़ित परिवारों के पास जाकर सांत्वना दी। लेखपाल से सहायता राशि का फार्म भरवाया। खुदाई कराने वालों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हो गई है।’
- नगेंद्र शर्मा, अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व)

खोखला कर दिया पहाड़
मेरा परिवार पिछले 50 साल से यहां रह रहा है। एक वक्त पहाड़ी पर पूरा जंगल फैला था। मगर, पिछले पंद्रह साल से प्रभावशाली लोग यहां लगातार अवैध खनन कर रहे हैं, इससे पहाड़ खोखला हो गया है। दो मजदूरों की मौत भी अवैध खनन का परिणाम है।
- इमरत सिंह, करगुवां।

25 रुपये फीट मिलती थी जमीन
पहाड़ को खोद- खोद कर जब प्रभावशाली लोगों ने यहां प्लाटिंग शुरू की तो उस वक्त 25 रुपये फीट में जमीन मिल जाती थी। यह रेट आज पांच सौ रुपये पर पहुंच गए हैं। पहाड़ी पर पहले नगर निगम के बोर्ड भी लगे थे, जो अब गायब हो चुके हैं।
- कमलेश, करगुवां।

घूमते थे मोर, गिद्द और खरगोश
मुझे अच्छे से ध्यान है कि जब पहाड़ पर मकान नहीं बने थे, तब यहां के हरे भरे जंगल में मोर नाचते थे। खरगोश घूमते थे और गिद्द पत्थरों पर आकर बैठते थे। पहाड़ की सुंदरता देखते ही बनती थी। शुद्ध हवा और पर्यावरण का आनंद लेने के लिए लोग पहाड़ के ऊपर चढ़ जाते थे।
- राजाराम भार्गव, करगुवां।

कहां जा रही मिट्टी
पहाड़ पर लगातार अवैध खनन हो रहा है। बिना रॉयल्टी जमा किए ये मिट्टी कहां जा रही है? इसकी प्रशासन को कभी चिंता नहीं रही। कभी किसी ने प्रशासन से शिकायत भी की तो कार्रवाई नहीं की गई। बुराई अलग होती है। इस कारण कोई विरोध नहीं करता। सब मिलीभगत से चल रहा है।

- चंदन सिंह, करगुवां।

पीने के पानी की नहीं है व्यवस्था
करगुवां पहाड़ को काट- काटकर मकान जरूर बनते जा रहे हैं, लेकिन पहाड़ पर पानी नहीं है। वैसे भी करगुवां ड्राई क्षेत्र में आता है। इस कारण यहां के लोगों को एक- एक किलोमीटर दूर पानी भरने जाना पड़ता है।
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