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पानी में अन्नदाता की मेहनत-City
Updated Fri, 13 Oct 2017 09:15 PM IST
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अन्नदाता की मेहनत पर फिरा पानी
- जरूरत पर नहीं मिला और अब खेत लबालब
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
जब पानी की जरूरत थी, तब मिला नहीं। किसी तरह कुएं, तालाब या बोरिंग से फसलों को सींचकर खड़ा किया। जब कटाई करने का समय आया, तब अन्नदाता की मेहनत पानी में चली गई है। ‘अमर उजाला’ से किसानों ने अपनी पीड़ा साझा की।
किसान मंगल सिंह ने बताया कि जून में चार एकड़ में धान की फसल की बुवाई की थी। डूब क्षेत्र की सीमा पार करके आए पानी ने ढाई एकड़ फसल का नुकसान कर दिया है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। पानी से करारी, परवई, दातारनगर, पलींदा, ढीमरपुरा, डेली, पाली, लहार, खोड़न, नया गांव आदि गांवों की फसल नष्ट हो गई है। किसान चंदन सिंह ने बताया कि उन्होंने सवा चार एकड़ में उर्द व तिल की बुवाई की थी, जोकि पूरी डूब गई है। उनकी पुश्तैनी जमीन पर वह सालों से खेती कर रहे हैं। पहले कभी एक इंच जमीन पर पानी नहीं आया। किसान राजेश ने बताया कि उनकी ढाई एकड़ भूमि पर बोई गई उर्द की फसल डूब गई है। कुछ ही दिन में फसल की कटाई होनी थी। जयप्रकाश का कहना है कि चालीस हजार रुपये लोन लेकर दो एकड़ जमीन पर फसल बोई थी। पानी भरने से अब पूरी बर्बाद हो गई है।
किसान राजेंद्र का कहना है कि अंग्रेजों के समय हुआ अनुबंध था कि रबी की फसल की बुवाई के समय बांध का पानी कम कर दिया जाएगा। मगर बुवाई का वक्त करीब होने के बावजूद बांध लबालब है। डूब क्षेत्र से ज्यादा आगे आ गया है। यदि इसे जल्द खाली नहीं कराते हैं, तो कई किसान रबी की फसल की बुवाई नहीं कर पाएंगे। पानी भरा रहने से जमीन पोली हो जाती है और ट्रैक्टर नहीं जा पाने से जुताई नहीं हो पाती। डेढ़ महीने जमीन सूखने के लिए चाहिए। यदि अभी निकालते हैं, तो दिसंबर के अंतिम सप्ताह तक गेहूं की बुवाई कर पाएंगे। हालांकि, बेतवा नहर प्रखंड के अधिकारी फसल डूबने का जिम्मेदार किसानों को ही बता रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने डूब क्षेत्र में ही बुवाई की गई है।
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नए गेट बनने के बाद नहीं हुआ सर्वे
किसानों का आरोप है कि पहूज बांध के नए गेट बनने के बाद डूब क्षेत्र का सर्वे नहीं किया गया। पुराने गेट नीचे होने के कारण पानी ओवरफ्लो होकर निकल जाता था। अब एक दीवार बन जाने से नदी में पानी नहीं जा पाता है।
बॉक्स..
कई किसानों ने लिया बैंक से कर्ज
फसल डूबने से किसानों को दोहरी मार पड़ी है। मेहनत पर तो पानी फिरा ही है, साथ ही बैंक से कर्ज लिए पैसे का भी नुकसान हो गया है। दातारनगर और परवाई निवासी किसान मानसिंह, बद्री सिंह, श्रीकुंवर, रामसखी, पिस्ता, निहाल, सुशीला, ममता, रामकुमार, राजकुमारी, बबलू, जय नारायण, हनुमत सिंह, जयप्रकाश, अनिल कुमार, मंगल सिंह, अनारकला गोटीराम, प्रमोद, अभिमन्यु, सुभाष, सुरेंद्र, अरविंद, धवल राजपूत, मखनी राजपूत, दंगल राजपूत, उत्तम, सुनील, गुलाब रानी, पिंटू आदि ने बैंक से कर्ज लेकर फसल बोई थी।
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अन्नदाता की मेहनत पर फिरा पानी
- जरूरत पर नहीं मिला और अब खेत लबालब
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
जब पानी की जरूरत थी, तब मिला नहीं। किसी तरह कुएं, तालाब या बोरिंग से फसलों को सींचकर खड़ा किया। जब कटाई करने का समय आया, तब अन्नदाता की मेहनत पानी में चली गई है। ‘अमर उजाला’ से किसानों ने अपनी पीड़ा साझा की।
किसान मंगल सिंह ने बताया कि जून में चार एकड़ में धान की फसल की बुवाई की थी। डूब क्षेत्र की सीमा पार करके आए पानी ने ढाई एकड़ फसल का नुकसान कर दिया है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। पानी से करारी, परवई, दातारनगर, पलींदा, ढीमरपुरा, डेली, पाली, लहार, खोड़न, नया गांव आदि गांवों की फसल नष्ट हो गई है। किसान चंदन सिंह ने बताया कि उन्होंने सवा चार एकड़ में उर्द व तिल की बुवाई की थी, जोकि पूरी डूब गई है। उनकी पुश्तैनी जमीन पर वह सालों से खेती कर रहे हैं। पहले कभी एक इंच जमीन पर पानी नहीं आया। किसान राजेश ने बताया कि उनकी ढाई एकड़ भूमि पर बोई गई उर्द की फसल डूब गई है। कुछ ही दिन में फसल की कटाई होनी थी। जयप्रकाश का कहना है कि चालीस हजार रुपये लोन लेकर दो एकड़ जमीन पर फसल बोई थी। पानी भरने से अब पूरी बर्बाद हो गई है।
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किसान राजेंद्र का कहना है कि अंग्रेजों के समय हुआ अनुबंध था कि रबी की फसल की बुवाई के समय बांध का पानी कम कर दिया जाएगा। मगर बुवाई का वक्त करीब होने के बावजूद बांध लबालब है। डूब क्षेत्र से ज्यादा आगे आ गया है। यदि इसे जल्द खाली नहीं कराते हैं, तो कई किसान रबी की फसल की बुवाई नहीं कर पाएंगे। पानी भरा रहने से जमीन पोली हो जाती है और ट्रैक्टर नहीं जा पाने से जुताई नहीं हो पाती। डेढ़ महीने जमीन सूखने के लिए चाहिए। यदि अभी निकालते हैं, तो दिसंबर के अंतिम सप्ताह तक गेहूं की बुवाई कर पाएंगे। हालांकि, बेतवा नहर प्रखंड के अधिकारी फसल डूबने का जिम्मेदार किसानों को ही बता रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने डूब क्षेत्र में ही बुवाई की गई है।
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नए गेट बनने के बाद नहीं हुआ सर्वे
किसानों का आरोप है कि पहूज बांध के नए गेट बनने के बाद डूब क्षेत्र का सर्वे नहीं किया गया। पुराने गेट नीचे होने के कारण पानी ओवरफ्लो होकर निकल जाता था। अब एक दीवार बन जाने से नदी में पानी नहीं जा पाता है।
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कई किसानों ने लिया बैंक से कर्ज
फसल डूबने से किसानों को दोहरी मार पड़ी है। मेहनत पर तो पानी फिरा ही है, साथ ही बैंक से कर्ज लिए पैसे का भी नुकसान हो गया है। दातारनगर और परवाई निवासी किसान मानसिंह, बद्री सिंह, श्रीकुंवर, रामसखी, पिस्ता, निहाल, सुशीला, ममता, रामकुमार, राजकुमारी, बबलू, जय नारायण, हनुमत सिंह, जयप्रकाश, अनिल कुमार, मंगल सिंह, अनारकला गोटीराम, प्रमोद, अभिमन्यु, सुभाष, सुरेंद्र, अरविंद, धवल राजपूत, मखनी राजपूत, दंगल राजपूत, उत्तम, सुनील, गुलाब रानी, पिंटू आदि ने बैंक से कर्ज लेकर फसल बोई थी।