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काकोरी के 100 साल : झांसी के रास्ते भागा था सजा सुनाने वाला जज हैमिल्टन

Sat, 09 Aug 2025 01:19 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sat, 09 Aug 2025 01:19 AM IST
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100 years of Kakori: Judge Hamilton who pronounced the sentence fled via Jhansi

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अमर उजाला ब्यूरो



झांसी।
आजादी की लड़ाई में अहम योगदान निभाने वाले काकोरी एक्शन के 9 अगस्त को एक सौ साल हो जाएंगे। आज के ही दिन आजादी के दीवानों ने अंग्रेजों को चुनौती देते हुए आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैंसेजर से सरकारी खजाने को लूट लिया। इससे ब्रिटिश सरकार बुरी तरह बौखला उठी। इस ऐतिहासिक कांड के तार झांसी से भी जुड़े हैं। काकोरी एक्शन के बाद अंग्रेजों को झांसा देकर चंद्रशेखर आजाद ने झांसी को ही अपना ठिकाना बनाया। आखिर तक वह अंग्रेजों के हाथ नहीं आ सके, इस वजह से उन पर ट्रायल नहीं चल सका।

वहीं, 18 महीने लखनऊ कोर्ट में चले ट्रायल के बाद फैसला सुनाने वाला स्पेशल सेशन जज ए हैमिल्टन भारत में ठहरने का साहस नहीं जुटा सका। फैसला सुनाने के चंद घंटे बाद ही ब्रिटिश सरकार ने उसे गुपचुप तरीके से झांसी भेज दिया। झांसी में हैमिल्टन ब्रिटिश सेना की तगड़ी सुरक्षा के बीच दो दिन रहा। यहां से मुंबई के रास्ते वह लंदन चला गया। इसके बाद वह कभी भारत नहीं लौटा।
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इतिहासविद आलोक शर्मा ने बताया कि काकोरी षडयंत्र केस की कोर्ट प्रोसिडिंग फाइल समेत इस कांड में छह साल की सजा पाने वाले रामदुलारे त्रिवेदी ने काकोरी कांड के दिलजले में विस्तार से इनका जिक्र किया है। यह दस्तावेज बतातेे हैं कि 9 अगस्त 1925 को अशफाक उल्ला खां, ठाकुर रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद, मन्मथनाथ गुप्ता समेत डेढ़ दर्जन क्रांतिकारियों ने खजाने को लूटा था। इसके बाद से ब्रिटिश सरकार इनके पीछे पड़ गई। जगह-जगह पोस्टर चिपका दिए गए। चंद्रशेखर आजाद के भी पोस्टर लगाए गए। चंद्रशेखर पहले बनारस गए। उसके बाद वहां से सीधे झांसी आ गए। यहां कोतवाली के पास रहने वाले मास्टर रुद्र नारायण के यहां कुछ माह बिताए। सदर बाजार स्थित कार के गैराज बुंदेलखंड मोटर्स वर्क्स में भी उन्होंने काम किया। झांसी में करीब डेढ़ साल रहे, लेकिन ब्रिटिश सरकार उनको आखिर तक पकड़ नहीं सकी। इस वजह से आजाद के खिलाफ ट्रायल शुरू नहीं हुआ।
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चार हजार की लूट के लिए सरकार ने खर्च कर दिए दस लाख



सरकार काकोरी एक्शन से इस कदर बौखला उठी थी कि किसी कीमत पर वह क्रांतिकारियों को खत्म करना चाहती थी। इसके लिए उसने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। मन्मथनाथ गुप्त की किताब द लिव्ड डेंजेरसली, काकोरी कांड के दिलजले सहित कई ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है कि इस पूरे मामले में ब्रिटिश सरकार ने दस लाख रुपये खर्च किए। सरकार की पैरवी पं. जगतनारायण ने की। उनको रोजाना के हिसाब से पांच सौ रुपये का भुगतान होता था, जबकि क्रांतिकारियों की ओर से गोविंद बल्लभ पंत एवं चंद्रभान गुप्ता आदि ने केस लड़ा। सरकार ने क्रांतिकारियों पर पांच हजार रुपये का इनाम घोषित किया था जबकि ट्रेन के खजाने से कुल 4553 रुपये 3 आना एवं छह पाई लूट गया था। इस मामले की जांच के लिए स्कॉटलैंड यार्ड के स्पेशल सीआईडी अधिकारी को खास तौर से यहां बुलाया गया था।
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