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नहीं चला सत्ता का जोर, सायकिल दौड़ी चारों ओर
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जौनपुर। मल्हनी विधानसभा उपचुनाव के नतीजे से सत्ताधारी दल भाजपा को करारा झटका लगा है। चुनाव जीतने के लिए एड़ी -चोटी का जोर लगाने के बाद भी पार्टी का प्रदर्शन पिछले चुनाव से भी खराब रहा है। पार्टी के लिए राहत की बात यही है कि कम वोट के बावजूद वह एक पायदान ऊपर उठी है। वर्ष 2017 में भाजपा चौथे स्थान पर थी और इस बार उसे तीसरा स्थान मिला है।
मल्हनी का चुनावी रण जीतना हमेशा से भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। वर्ष 1962 में जब यह सीट रारी के नाम से थी तब जनसंघ प्रत्याशी कुंवर श्रीपाल सिंह को जीत मिली थी। इसके बाद से कभी यहां भगवा नहीं लहरा सका। वर्ष 1991, 1993 की रामलहर और 2017 की लहर में भी यहां भाजपा को करारी शिकस्त मिली थी। उपचुनाव को पार्टी ने इस सीट को प्रतिष्ठा का सवाल बना दिया था। पार्टी के नेताओं ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। जनता को विकास के सपने दिखाए गए। चुनाव प्रभारी मंत्री अनिल राजभर डेढ़ महीने तक डेरा डाले रहे। जिले के प्रभारी मंत्री उपेंद्र तिवारी, राज्य मंत्री गिरीश यादव, संतकबीरनगर के सांसद प्रवीण निषाद, मछलीशहर सांसद बीपी सरोज, भदोही सांसद रमेश बिंद, बलिया सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त सहित पार्टी के जिले के पांचों विधायक गांव-गांव और घर-घर घूमते रहे। दो बार मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष ने सभा की। दोनों उप मुख्यमंत्री भी चुनावी सभा करने आए। मगर मल्हनी के मतदाता अपने ही धुन में मगन रहे। उन्होंने भाजपा की एक न सुनी। लड़ाई धनंजय सिंह और लकी यादव के बीच ही सिमट कर रह गई। वर्ष 2017 के आम चुनाव में भाजपा सतीश सिंह को 38966 वोट मिले थे और वे चौथे नंबर पर थे लेकिन इस बार भाजपा को 28 हजार वोटों से ही संतोष करना पड़ा लेकिन वह तीसरे स्थान पर रही।
भाजपा की राह में मुश्किल
* भीतरघात: भाजपा को अपनों ने ही नुकसान पहुंचाया है। पार्टी नेताओं के इलाकों में ही प्रत्याशी को कम वोट मिले। हर मंच पर प्रत्याशी के साथ रहे नेता भी उनको अपने इलाके में वोट नहीं दिलवा सके।
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* बाहरी प्रत्याशी: चुनाव के दौरान बाहरी और स्थानीय का मुद्दा भी जोर-शोर से उछाला गया। बरसठी ब्लाक के रहने वाले भाजपा प्रत्याशी मनोज सिंह को बाहरी करार दिया गया। कहा गया कि मल्हनी का हित स्थानीय नेता ही कर सकेंगे।
* जातीय समीकरण भी नहीं साध सकी: भाजपा ने पिछड़े वर्ग के गैर यादव मतदाताओं और ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश की पर बात नहीं बनी। सभाओं में सीमा द्विवेदी को राज्यसभा में भेजने की बात एकाधिक बार नेताओं ने कही।
* प्रशासन की कार्रवाई का भी उल्टा असर: सपा और निर्दल प्रत्याशी पर पुलिस-प्रशासन ने कई बार कार्रवाई आचार संहिता उल्लंघन की कार्रवाई की। इससे जनता में संदेश गया कि भाजपा की हालत ठीक नहीं है।
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मल्हनी का चुनावी रण जीतना हमेशा से भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। वर्ष 1962 में जब यह सीट रारी के नाम से थी तब जनसंघ प्रत्याशी कुंवर श्रीपाल सिंह को जीत मिली थी। इसके बाद से कभी यहां भगवा नहीं लहरा सका। वर्ष 1991, 1993 की रामलहर और 2017 की लहर में भी यहां भाजपा को करारी शिकस्त मिली थी। उपचुनाव को पार्टी ने इस सीट को प्रतिष्ठा का सवाल बना दिया था। पार्टी के नेताओं ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। जनता को विकास के सपने दिखाए गए। चुनाव प्रभारी मंत्री अनिल राजभर डेढ़ महीने तक डेरा डाले रहे। जिले के प्रभारी मंत्री उपेंद्र तिवारी, राज्य मंत्री गिरीश यादव, संतकबीरनगर के सांसद प्रवीण निषाद, मछलीशहर सांसद बीपी सरोज, भदोही सांसद रमेश बिंद, बलिया सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त सहित पार्टी के जिले के पांचों विधायक गांव-गांव और घर-घर घूमते रहे। दो बार मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष ने सभा की। दोनों उप मुख्यमंत्री भी चुनावी सभा करने आए। मगर मल्हनी के मतदाता अपने ही धुन में मगन रहे। उन्होंने भाजपा की एक न सुनी। लड़ाई धनंजय सिंह और लकी यादव के बीच ही सिमट कर रह गई। वर्ष 2017 के आम चुनाव में भाजपा सतीश सिंह को 38966 वोट मिले थे और वे चौथे नंबर पर थे लेकिन इस बार भाजपा को 28 हजार वोटों से ही संतोष करना पड़ा लेकिन वह तीसरे स्थान पर रही।
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भाजपा की राह में मुश्किल
* भीतरघात: भाजपा को अपनों ने ही नुकसान पहुंचाया है। पार्टी नेताओं के इलाकों में ही प्रत्याशी को कम वोट मिले। हर मंच पर प्रत्याशी के साथ रहे नेता भी उनको अपने इलाके में वोट नहीं दिलवा सके।
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* बाहरी प्रत्याशी: चुनाव के दौरान बाहरी और स्थानीय का मुद्दा भी जोर-शोर से उछाला गया। बरसठी ब्लाक के रहने वाले भाजपा प्रत्याशी मनोज सिंह को बाहरी करार दिया गया। कहा गया कि मल्हनी का हित स्थानीय नेता ही कर सकेंगे।
* जातीय समीकरण भी नहीं साध सकी: भाजपा ने पिछड़े वर्ग के गैर यादव मतदाताओं और ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश की पर बात नहीं बनी। सभाओं में सीमा द्विवेदी को राज्यसभा में भेजने की बात एकाधिक बार नेताओं ने कही।
* प्रशासन की कार्रवाई का भी उल्टा असर: सपा और निर्दल प्रत्याशी पर पुलिस-प्रशासन ने कई बार कार्रवाई आचार संहिता उल्लंघन की कार्रवाई की। इससे जनता में संदेश गया कि भाजपा की हालत ठीक नहीं है।