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Jaunpur News: पितरों के श्राद्ध का पर्व पितृपक्ष 26 से शुरू, 10 अक्तूबर को होगा समापन
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पितृ पक्ष में श्राद्ध एवं पिंडदान करने से पितृदोष का होता है निवारण
संवाद न्यूज एजेंसी मछलीशहर। पितरों के श्राद्ध और पिंडदान का पर्व पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू हो रहा है। पितृपक्ष में श्राद्ध एवं पिंडदान करने से पितृदोष का निवारण होता है। 4 अक्तूबर को मातृनवमी और 10 अक्तूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृपक्ष समाप्त होगा। कर्मकांड के विद्वान पं. मुरारी श्याम पांडेय ने बताया कि वैदिक दर्शन में आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक की तिथियों को पितृ शांति और श्राद्ध दानादि के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। पितृपक्ष में मृत्यु की तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है। अगर किसी मृत व्यक्ति की तिथि ज्ञात न हो तो ऐसी स्थिति में अमावस्या तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। ज्योतिष एवं तंत्र आचार्य डॉ. शैलेश मोदनवाल ने बताया कि श्राद्ध एवं पिंडदान करने से पितृदोष का निवारण होता है। श्राद्ध के माध्यम से जो भी वस्तुएं अर्पित की जाती हैं वह मूल रूप में नारायण को ही प्राप्त होता है। श्राद्ध के लिए श्रद्धा का होना अति आवश्यक है, अर्थात बिना श्रद्धा के किया गया श्राद्ध निष्फल होता है। शास्त्रों के अनुसार साल में कुल 96 दिन ऐसे अवसर प्राप्त होते हैं जिनमें श्राद्ध किए जाते हैं। उन सब अवसरों में पितृपक्ष सर्वोत्तम तिथि मानी गई है।
कब करें श्राद्ध
शास्त्रों में श्राद्ध के लिए समय का विशेष महत्व बताया गया है। कुतप बेला में किया गया श्राद्ध विशेष फलदायी है। कुतप बेला अर्थात दिन का आठवां मुहूर्त कहा गया है जो दिन में 11:36 बजे से 12:24 बजे तक ही रहता है। वैसे तो मातृ श्राद्ध को पूर्वाह्न में, पितृ श्राद्ध को अपराह्न में, एकोदिष्ट श्राद्ध को मध्याह्न में और वृद्धि श्राद्ध को प्रातःकाल में करना चाहिए। जल, तिल सव्यंग, डाभ, फल का गुदा, गोदुग्ध, मधुर रस, खंग, लोह, मधु, कुश, सावां, अगहनी का चावल, जौ, तिन्नी का चावल, मूंग, गन्ना, श्वेत पुष्प और घृत ये पदार्थ पितरों के लिए सर्वदा प्रिय और प्रशस्त कह गए हैं।
पितृ पक्ष में अवश्य करें ये कार्य
ज्योतिष एवं तंत्र आचार्य डॉ. शैलेश मोदनवाल ने बताया कि पितृपक्ष में पशु पक्षियों को भोजन कराना और पितरों के निमित्त नित्य दोनियां रखना चाहिए। पितृ दोष निवारण यंत्र की गंध पुष्प अक्षत से नित्य पूजा करें। शास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि तर्पण का जल सूर्योदय से आधे प्रहर तक अमृत, एक प्रहर तक मधु, डेढ़ प्रहर तक दुग्ध, साढ़े तीन प्रहर तक जल रूप में पितरों को प्राप्त होता है। अंजलि में कुश के साथ तिल मिश्रित जल को अंगूठे की ओर से पृथ्वी पर छोड़ने से पितरों को तृप्ति मिलती है।
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इन तिथियों में पितृपक्ष में होगा श्राद्ध
26 सितंबर दिन शनिवार पूर्णिमा श्राद्ध, 27 को प्रतिपदा श्राद्ध, 28 को द्वितीया श्राद्ध, 29 को तृतीया श्राद्ध, 30 को चतुर्थी श्राद्ध, एक अक्तूबर को पंचमी श्राद्ध, दो अक्तूबर को सप्तमी श्राद्ध, तीन को अष्टमी श्राद्ध, 4 को मातृनवमी, 5 को दशमी श्राद्ध, 6 को एकादशी श्राद्ध, 7 को द्वादशी श्राद्ध, 8 को त्रयोदशी श्राद्ध, 9 को चतुर्दशी श्राद्ध और 10 अक्तूबर को सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध होगा।
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संवाद न्यूज एजेंसी मछलीशहर। पितरों के श्राद्ध और पिंडदान का पर्व पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू हो रहा है। पितृपक्ष में श्राद्ध एवं पिंडदान करने से पितृदोष का निवारण होता है। 4 अक्तूबर को मातृनवमी और 10 अक्तूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृपक्ष समाप्त होगा। कर्मकांड के विद्वान पं. मुरारी श्याम पांडेय ने बताया कि वैदिक दर्शन में आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक की तिथियों को पितृ शांति और श्राद्ध दानादि के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। पितृपक्ष में मृत्यु की तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है। अगर किसी मृत व्यक्ति की तिथि ज्ञात न हो तो ऐसी स्थिति में अमावस्या तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। ज्योतिष एवं तंत्र आचार्य डॉ. शैलेश मोदनवाल ने बताया कि श्राद्ध एवं पिंडदान करने से पितृदोष का निवारण होता है। श्राद्ध के माध्यम से जो भी वस्तुएं अर्पित की जाती हैं वह मूल रूप में नारायण को ही प्राप्त होता है। श्राद्ध के लिए श्रद्धा का होना अति आवश्यक है, अर्थात बिना श्रद्धा के किया गया श्राद्ध निष्फल होता है। शास्त्रों के अनुसार साल में कुल 96 दिन ऐसे अवसर प्राप्त होते हैं जिनमें श्राद्ध किए जाते हैं। उन सब अवसरों में पितृपक्ष सर्वोत्तम तिथि मानी गई है।
कब करें श्राद्ध
शास्त्रों में श्राद्ध के लिए समय का विशेष महत्व बताया गया है। कुतप बेला में किया गया श्राद्ध विशेष फलदायी है। कुतप बेला अर्थात दिन का आठवां मुहूर्त कहा गया है जो दिन में 11:36 बजे से 12:24 बजे तक ही रहता है। वैसे तो मातृ श्राद्ध को पूर्वाह्न में, पितृ श्राद्ध को अपराह्न में, एकोदिष्ट श्राद्ध को मध्याह्न में और वृद्धि श्राद्ध को प्रातःकाल में करना चाहिए। जल, तिल सव्यंग, डाभ, फल का गुदा, गोदुग्ध, मधुर रस, खंग, लोह, मधु, कुश, सावां, अगहनी का चावल, जौ, तिन्नी का चावल, मूंग, गन्ना, श्वेत पुष्प और घृत ये पदार्थ पितरों के लिए सर्वदा प्रिय और प्रशस्त कह गए हैं।
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पितृ पक्ष में अवश्य करें ये कार्य
ज्योतिष एवं तंत्र आचार्य डॉ. शैलेश मोदनवाल ने बताया कि पितृपक्ष में पशु पक्षियों को भोजन कराना और पितरों के निमित्त नित्य दोनियां रखना चाहिए। पितृ दोष निवारण यंत्र की गंध पुष्प अक्षत से नित्य पूजा करें। शास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि तर्पण का जल सूर्योदय से आधे प्रहर तक अमृत, एक प्रहर तक मधु, डेढ़ प्रहर तक दुग्ध, साढ़े तीन प्रहर तक जल रूप में पितरों को प्राप्त होता है। अंजलि में कुश के साथ तिल मिश्रित जल को अंगूठे की ओर से पृथ्वी पर छोड़ने से पितरों को तृप्ति मिलती है।
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इन तिथियों में पितृपक्ष में होगा श्राद्ध
26 सितंबर दिन शनिवार पूर्णिमा श्राद्ध, 27 को प्रतिपदा श्राद्ध, 28 को द्वितीया श्राद्ध, 29 को तृतीया श्राद्ध, 30 को चतुर्थी श्राद्ध, एक अक्तूबर को पंचमी श्राद्ध, दो अक्तूबर को सप्तमी श्राद्ध, तीन को अष्टमी श्राद्ध, 4 को मातृनवमी, 5 को दशमी श्राद्ध, 6 को एकादशी श्राद्ध, 7 को द्वादशी श्राद्ध, 8 को त्रयोदशी श्राद्ध, 9 को चतुर्दशी श्राद्ध और 10 अक्तूबर को सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध होगा।