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नहीं मिली नौकरी, लद गया कर्ज का बोझ
ब्यूरो/अमर उजाला, जौनपुर
Updated Wed, 08 Jun 2016 12:35 AM IST
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अपने सपनों को उड़ान देने के लिए आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के मेधावियों ने पढ़ाई के लिए बैंक से कर्ज लेकर डिग्री तो हासिल कर ली पर नौकरी नहीं मिली। अब उन्हें नौकरी से कहीं अधिक बैंक से लिये गए कर्ज को चुकाने की चिंता सता रही है। किसी को छोटी मोटी नौकरी मिल भी गई तो उतना वेतन नहीं है कि वे तनख्वाह से परिवार चलाने के साथ साथ बैंक का कर्ज भी अदा कर सकें। लंबे इंतजार के बाद किसी को नौकरी का अवसर भी मिला तो उनकी उम्र सीमा ही समाप्त हो चुकी थी। हमने ऐसी ही परेशानियों से गुजर रहे डिग्रीधारी बेरोजगारों की मनोदशा को टटोलने की ।
करंजाकला विकास खंड के परसनी गांव निवासी आनंद कुमार मौर्य के पुत्र शिवदत्त मौर्य ने बीफार्मा की पढ़ाई पूरी करने के लिए वर्ष 2007 में यूबीआई खेतासराय से 68 हजार रुपये लोन लिया था। शिवदत्त के पिता किसान हैं। खेती से पढ़ाई का खर्च पूरा नहीं कर पा रहे थे तो उनके नाना स्व. डा. अवधराज मौर्य की प्रेरणा से उन्होंने बैंक से लोन ले लिया। 2008 में उन्होंने बुंदेलखंड से बीफार्मा की पढ़ाई पूरी कर ली। शिवदत्त कहते हैं कि जिस साल उन्होंने पढ़ाई पूरी की उसी साल से यूपी में कोई वैकेंसी ही नहीं निकली। इस साल डीआई के लिए वैकेंसी निकली तो उम्र सीमा ही खत्म हो गई। विवश होकर एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर ली। यहां से जो सैलरी मिलती है उससे बैंक का कर्ज अदा नहीं कर सकता। बैंक से 68 हजार रुपये लोन लिया था करीब 80 हजार जमा करने के बाद भी अभी कर्ज चुकता नहीं हो सका है।
कमोबेश यही हाल जलालपुर की राज अंकिता सिंह का भी है। उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए लोन लिया था। पढ़ाई पूरी हो गई लेकिन दो साल से वह नौकरी मिलने का इंतजार कर रही हैं। बक्शा के राहुल यादव, बदलापुर के अभिषेक और शाहगंज के शाहआलम जैसे तमाम लोग भी बैंक से लोन लेकर पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी न मिलने का दंश झेल रहे हैं।
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करंजाकला विकास खंड के परसनी गांव निवासी आनंद कुमार मौर्य के पुत्र शिवदत्त मौर्य ने बीफार्मा की पढ़ाई पूरी करने के लिए वर्ष 2007 में यूबीआई खेतासराय से 68 हजार रुपये लोन लिया था। शिवदत्त के पिता किसान हैं। खेती से पढ़ाई का खर्च पूरा नहीं कर पा रहे थे तो उनके नाना स्व. डा. अवधराज मौर्य की प्रेरणा से उन्होंने बैंक से लोन ले लिया। 2008 में उन्होंने बुंदेलखंड से बीफार्मा की पढ़ाई पूरी कर ली। शिवदत्त कहते हैं कि जिस साल उन्होंने पढ़ाई पूरी की उसी साल से यूपी में कोई वैकेंसी ही नहीं निकली। इस साल डीआई के लिए वैकेंसी निकली तो उम्र सीमा ही खत्म हो गई। विवश होकर एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर ली। यहां से जो सैलरी मिलती है उससे बैंक का कर्ज अदा नहीं कर सकता। बैंक से 68 हजार रुपये लोन लिया था करीब 80 हजार जमा करने के बाद भी अभी कर्ज चुकता नहीं हो सका है।
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कमोबेश यही हाल जलालपुर की राज अंकिता सिंह का भी है। उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए लोन लिया था। पढ़ाई पूरी हो गई लेकिन दो साल से वह नौकरी मिलने का इंतजार कर रही हैं। बक्शा के राहुल यादव, बदलापुर के अभिषेक और शाहगंज के शाहआलम जैसे तमाम लोग भी बैंक से लोन लेकर पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी न मिलने का दंश झेल रहे हैं।
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