जलालपुर। क्षेत्र के रामलीला मैदान में आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा में शनिवार को प्रयागराज से पधारे मानस मर्मज्ञ अंशपूर्णानंद महाराज ने कथा के चौथे दिन राम वनवास और केवट प्रसंग का मार्मिक वर्णन किया। कथा के दौरान पंडाल में मौजूद श्रद्धालुओं की आंखें उस वक्त नम हो गईं, जब भगवान राम माता-पिता की आज्ञा मानकर राजपाट त्याग कर वन की ओर प्रस्थान करते हैं। कथावाचक ने कहा कि भगवान राम का वनगमन केवल एक घटना नहीं, बल्कि कर्तव्य और त्याग की पराकाष्ठा है। उन्होंने बताया कि कैसे रानी कैकेयी ने दासी मंथरा की बातों में आकर राजा दशरथ से दो वरदान मांगे। इसके परिणामस्वरूप राम को 14 वर्ष का वनवास और भरत को राजतिलक मिला। महाराज दशरथ के पुत्र मोह और धर्म संकट के बीच श्री राम ने सहर्ष वन जाना स्वीकार किया ताकि उनके पिता के वचनों की लाज बनी रहे। कथा की प्रासंगिकता बताते हुए कहा कि आज के समय में जहां संपत्ति के लिए भाई-भाई में विवाद होता है, वहीं रामकथा हमें अपनों के लिए त्याग करना सिखाती है। माता-पिता की सेवा और उनके वचनों का पालन ही सबसे बड़ी पूजा है। कथा समापन के पश्चात श्रद्धालुओं के द्वारा भगवान की आरती और स्तुति की गई। इस मौके पर पप्पू जायसवाल, उमेश गुप्ता, प्रदीप अग्रहरि, रमाकांत, डॉ. परशुराम, छाया गुप्ता, जूही अग्रहरि, चंद्रकला, सावित्री देवी, मंजू समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।