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कई जगह हाथ फैलाए, तब जाकर घर आ पाए

Tue, 26 May 2020 08:42 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 26 May 2020 08:42 PM IST
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problems of migrants reached jaunpur
जौनपुर। लॉक डाउन की सबसे ज्यादा मार गरीब और मजदूर वर्ग पर है। यह महामारी प्रवासी मजदूरों के लिए कई तरह की मुसीबतें लेकर आई है। इससे पैदा हुई बेरोजगारी जानलेवा साबित हो रही है। जिनके पास रोजगार नहीं रह गया था, उनके पास घरों का रुख करने के सिवा कोई विकल्प शेष नहीं था। जेब के साथ पेट भी खाली होने से वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो गए थे। कइयों के सामने हाथ फैलाने के बाद वह किसी तरह घर तक लौटने के लिए कुछ पैसे जमा कर सके। परदेश में जिल्लतें झेलने के बाद वह जैसे-तैसे घर लौटे यह श्रमिक अब दोबारा वहां जाने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि घर में चाहे जैसे रह लेंगे, मगर दूसरे शहर नहीं जाएंगे।
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पैदल चलते-चलते सूज गए पैर, पड़ गए छाले
सिंगरामऊ। मुंबई से अपने गांव बछुआर आए विजय मिश्र बताते हैं कि लॉक डाउन में काम-धंधा बंद होने के बाद उनके पास न खाने के लिए राशन था और न रहने के लिए घर। घर जाने के लिए निकले तो बस नहीं मिली। ट्रक और डीसीएम वाले मनमाना किराया वसूल रहे थे। काफी मिन्नतों के बाद एक ट्रक वाला बैठाकर मध्य प्रदेश तक ले आया। उसके बाद करीब चालीस किमी पैदल चलने के बाद फिर एक ट्रक वाले ने सहारा देकर लखनऊ पहुंचा दिया। लखनऊ से पैदल घर आए। पैरों में सूजन आ गई है और छाले पड़ गए हैं। ये जिंदगी के सबसे कठिन दिन थे। ईश्वर से यही कामना है कि दोबारा ऐसे दिन न दिखाए। संकट के दिनों में बस गांव याद आ रहा था। हर वक्त यही सोचते रहे कि किसी तरह गांव पहुंच जाएं तो कम से कम भूख से तो नहीं मरेंगे न। इसी गांव के नंदलाल प्रजापति सूरत से आए हैं। बताते हैं कि लॉक डाउन के दौरान कुछ दिन तक तो ठीक था, मगर जब पैसे खत्म हो गए तो मुश्किलें बढ़ने लगीं। मकान मालिक से एक हजार रुपये उधार लेकर ट्रेन का टिकट लिया। किसी तरह घर पहुंचा तो बड़ा सुकून मिला। अब गांव में ही अपना मिट्टी का व्यवसाय करूंगा, परदेस नहीं जाना है।
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आरती दीदी मदद न करतीं तो परदेश में ही मर जाते
बदलापुर। रामकोला राजाबाजार निवासी सुरेश कुमार निषाद सूरत में किराए का ऑटो रिक्शा चला कर परिवार का भरण पोषण कर रहे थे। उनके साथ पत्नी राधिका, बिटिया आरती (13) और डेढ़ साल का बेटा आयुष भी साथ थे। लॉक डाउन के बाद जीवन कठिन हो गया। लॉक डाउन के पहले चरण में पास के पैसे खर्च हो गए। उम्मीद थी कि 21 दिन बाद स्थिति सामान्य हो जाएगी। पर दूसरे चरण के लॉक डाउन में टूट गया। पास में फूटी कौड़ी तक नहीं बची थी। परिवार की भूख मिटाने के लिए परदेश में कोई सहारा नहीं था। पास पड़ोस के लोगों की भी वही हालत थी, लिहाज उधर के रुपये भी नहीं मिल रहे थे। ढाई माह तक शहर सूरत में जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर था। सुरेश ने बताया कि घर आने के लिए टिकट की तलाश में काफी झेलना पड़ा। 10-12 जगह फार्म भरा था, लेकिन कहीं से कोई सहयोग नहीं मिला। अंत में वहां की समाजसेवी आरती दीदी की चौखट पर पहुंचा। उनके सहयोग से पूरे परिवार के लिए टिकट का इंतजाम हुआ और हम घर आ सके। पत्नी राधिका का कहना था कि अब घर ही रह कर कुछ कमाया जाएगा। शहर में कदम तक नहीं रखेंगे।
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