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नहाय खाय के साथ शुरू हुआ छठ महापर्व
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जौनपुर। नहाय-खाय के साथ गुरुवार छठ महापर्व की शुरू हो गया। पहले दिन सुबह से ही नदी के किनारे घाटों पर व्रतियों की भीड़ लगी रही। स्नान के बाद व्रती महिलाओं ने एक-दूसरे की मांग में सिंदूर लगाया। व्रती पवित्र स्नान के बाद कद्दू की सब्जी, अरवा चावल का भात, चने की दाल, आंवले की चटनी, लौकी का बजका आदि प्रसाद ग्रहण किया। शुक्रवार एक नवंबर को खरना होगा। दो नवंबर को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य और तीन नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही लोक आस्था का यह महान पर्व संपन्न हो जाएगा। महिलाओं ने वेदी बना कर पूजा के लिए अपना स्थान सुरक्षित किया। शुक्रवार को खरना होगा।
आचार्य रजनीकांत द्विवेदी का कहना है कि इस बार छठ महापर्व पर ग्रह-गोचरों का शुभ संयोग बन रहा है। छठ व्रत करने की परंपरा ऋग्वैदिक काल से ही चली आ रही है। शनिवार दो नवंबर को सायंकालीन अर्घ्य पर त्रिपुष्कर योग का संयोग बन रहा है। जबकि तीन नवंबर रविवार को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य के दौरान सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ-साथ त्रिपुष्कर योग का शुभ संयोग बन रहा है। सूर्य षष्ठी का व्रत आरोग्यता, सौभाग्य व संतान के लिए किया जाता है। स्कंद पुराण के मुताबिक राजा प्रियव्रत ने भी यह व्रत रखा था। उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। भगवान भास्कर से इस रोग की मुक्ति के लिए उन्होंने छठ व्रत किया था। स्कंद पुराण में प्रतिहार षष्ठी के तौर पर इस व्रत की चर्चा है। प्रत्यक्ष देव भगवान भास्कर को सप्तमी तिथि अत्यंत प्रिय है। विष्णु पुराण के अनुसार तिथियों के बंटवारे के समय सूर्य को सप्तमी तिथि प्रदान की गई। इसलिए उन्हें सप्तमी का स्वामी कहा जाता है। सूर्य भगवान अपने इस प्रिय तिथि पर पूजा से अभिष्ठ फल प्रदान करते हैं। छठ महापर्व के पहले दिन नहाय-खाय में लौकी की सब्जी, अरवा चावल, चने की दाल, आंवला की चटनी के सेवन का खास महत्व है। वैदिक मान्यता है कि इससे पुत्र की प्राप्ति होती है। खरना के प्रसाद में ईख के कच्चे रस, गुड़ के सेवन से त्वचा रोग, आंख की पीड़ा समाप्त हो जाती है।
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आचार्य रजनीकांत द्विवेदी का कहना है कि इस बार छठ महापर्व पर ग्रह-गोचरों का शुभ संयोग बन रहा है। छठ व्रत करने की परंपरा ऋग्वैदिक काल से ही चली आ रही है। शनिवार दो नवंबर को सायंकालीन अर्घ्य पर त्रिपुष्कर योग का संयोग बन रहा है। जबकि तीन नवंबर रविवार को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य के दौरान सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ-साथ त्रिपुष्कर योग का शुभ संयोग बन रहा है। सूर्य षष्ठी का व्रत आरोग्यता, सौभाग्य व संतान के लिए किया जाता है। स्कंद पुराण के मुताबिक राजा प्रियव्रत ने भी यह व्रत रखा था। उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। भगवान भास्कर से इस रोग की मुक्ति के लिए उन्होंने छठ व्रत किया था। स्कंद पुराण में प्रतिहार षष्ठी के तौर पर इस व्रत की चर्चा है। प्रत्यक्ष देव भगवान भास्कर को सप्तमी तिथि अत्यंत प्रिय है। विष्णु पुराण के अनुसार तिथियों के बंटवारे के समय सूर्य को सप्तमी तिथि प्रदान की गई। इसलिए उन्हें सप्तमी का स्वामी कहा जाता है। सूर्य भगवान अपने इस प्रिय तिथि पर पूजा से अभिष्ठ फल प्रदान करते हैं। छठ महापर्व के पहले दिन नहाय-खाय में लौकी की सब्जी, अरवा चावल, चने की दाल, आंवला की चटनी के सेवन का खास महत्व है। वैदिक मान्यता है कि इससे पुत्र की प्राप्ति होती है। खरना के प्रसाद में ईख के कच्चे रस, गुड़ के सेवन से त्वचा रोग, आंख की पीड़ा समाप्त हो जाती है।
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