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झोपड़ी से राजभवन तक पहुंचे, फिर भी सादगी नहीं छोड़ी

Wed, 20 Jan 2021 11:44 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 20 Jan 2021 11:44 PM IST
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From the hut to the Raj Bhavan, still did not leave simplicity
त्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव के साथ पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद की फाईल फोटो। - फोटो : JAUNPUR
जौनपुर। मछलीशहर के एक गरीब परिवार में जन्मे माता प्रसाद का बचपन बेहद अभावों और संघर्षों में बीता। पिता चमड़े का पुश्तैनी कारोबार करते थे तो मां भी मजदूर थीं। कई बार गोबर से अन्न का दाना निकालकर परिवार को भोजन की व्यवस्था करनी पड़ती थी। अनुसूचित जाति के परिवार से जुड़े होने के कारण सामाजिक व्यवस्था में उन्हें कई बार ताने भी झेलने पड़े, लेकिन इन तमाम दुश्वारियों के बाद भी माता प्रसाद कभी विचलित नहीं हुए। झोपड़ी से राजभवन तक का सफर तय करने के बाद भी उनका जीवन सादगी से भरा रहा। राज्यपाल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह लंबे समय तक शहर के हुसैनाबाद स्थित आवास पर रहे। इस दौरान अक्सर लोग उन्हें पैदल या रिक्शे से घूमते देखते थे। भ्रमण के दौरान कोई परिचित मिल जाए तो उसका कुशलक्षेम पूछने के साथ ही भरपूर प्यार भी दिखाते थे।
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माता प्रसाद के करीबियों में रहे टीडी कॉलेज में फिजिक्स के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. एसपी सिंह उनके साथ बिताए पलों को याद कर भावुक हो गए। इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद भी माता प्रसाद में कभी अहंकार नहीं रहा। उनका रहन-सहन और पहनावा देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह राज्यपाल और मंत्री रह चुके हैं। उनकी सादगी के कारण ही सभी दल के लोग उनका सम्मान करते थे। अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में जब वह मिलने पहुंचे तो उनके पहनावे को देख मुख्यमंत्री कार्यालय के कर्मचारियों ने सामान्य नेता समझते हुए किनारे बैठा दिया। बाद में जब पर्ची पर उनका नाम देखा गया तो तत्काल सीएम तक पहुंचाया गया। वह तार्किक व्यक्ति थे, लेकिन सत्कर्म पर भरोसा रखते थे। उनका मानना था कि अच्छा काम करो, नेक बनो। उनके संपर्क में आने से मेरा जीवन संवर गया।
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हम त गरीब हई भइया मुसहरवा...
जौनपुर। स्व. माता प्रसाद की अंतिम पुस्तक जौनपुर और उसकी विभूतियां के संपादक मंडल में रहे वरिष्ठ कवि, साहित्यकार डॉ. सभाजीत द्विवेदी प्रखर उन्हें जिले के सबसे अधिक उम्र और सबसे बड़े पद पर रहने वाला अंतिम नेता मानते हैं। उनका कहना है कि माता प्रसाद का जीवन सादगी से भरा था। वह मानवता के सच्चे पुजारी थे। उन्होंने दलित विमर्श से जुड़ी तमाम पुस्तकें लिखीं। उनके उत्थान के लिए वह फिक्रमंद रहते थे, लेकिन उनका व्यक्ति जाति-धर्म के बंधनों से मुक्त था। उन्होंने जौनपुर दोहावली लिखी। मुसहर समाज के जीवन पर लिखी अपनी कविता वह अक्सर गुनगुनाते थे। जब मस्ती में होते तो हम त गरीब हई भइया मुसहरवा... कविता को झूमते हुए गाते। यह बेहद रोचक लगता था। हिंदी साहित्य और भोजपुरी के लिए उन्होंने खूब काम किया। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भोजपुरी की पैरवी की।
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गर्वनर रहते हुए भी रोजा में आते थे जौनपुर
जौनपुर। मछलीशहर से जौनपुर आने के बाद माता प्रसाद का प्रारंभिक ठिकाना रुहट्टा में थी। कांग्रेस नेता साजिद हमीद बताते हैं कि कांग्रेस को तब एक एससी नेता की तलाश थी। तब रऊफ जाफरी साहब ही माता प्रसाद को मछलीशहर से जौनपुर लाए थे। लंबे समय तक वह रुहट्टा में किराए के मकान में रहे। तब से ही उनका हमारे परिवार से गहरा नाता हो गया था। गर्वनर रहने के बाद भी रोजा में जौनपुर जरूर आते थे। प्रारंभिक जीवन बेहद मुश्किलों में रहा। वह अक्सर चर्चा करते थे कि विवाह में भी नंगे पांव बरात लेकर गए थे। उनकी पत्नी लखराजी देवी भी लगभग उनकी हमउम्र ही थीं। बचपन से ही लोकगीत लिखना और गाना उनका शौक था।
बड़े पदों पर रहे हैं पुत्र
माता प्रसाद की पांच संतानों में तीन पुत्र और दो बेटियां हैं। सबसे बड़े पुत्र केशव प्रसाद आयकर आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। उनसेर छोटी शांति देवी शिक्षिका थीं। तीसरे नंबर पर एससी भास्कर डिप्टी सीएमओ रहे। चौथे नंबर पर पुत्री लालती देवी भी शिक्षिका रही हैं। सबसे छोटे कर्मवीर भारती दीवानी न्यायालय के अधिवक्ता हैं। माता प्रसाद के दो पौत्र भी डॉक्टर हैं।
नार्थ ईस्ट काउंसिल के चेयरमैन रहे
माता प्रसाद अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल होने के दौरान वह नार्थ ईस्ट काउंसिल के चेयरमैन भी रहे। इस काउंसिल में असम, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा, मणिपुर, अरुणाचल के राज्यपाल व मुख्यमंत्री सदस्य होते हैं। माता प्रसाद चेयरमैन के तौर पर पूर्वोत्तर के राज्यों में केंद्र सरकार की योजनाओं की समीक्षा भी करते थे।
अंतिम पुस्तक में अमर उजाला का जताया था आभार
जौनपुर। पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद ने 40 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। उनकी अंतिम पुस्तक शीराज-ए-हिंद: जौनपुर और उसकी विभूतियां में उन्होंने जिले का समग्र इतिहास दर्शाया है। इसमें राजनीतिक, सामाजिक, प्रशासनिक सहित देश-विदेश में उच्च पदों पर रहने वालों का भी जिक्र है। इस पुस्तक में उन्होंने तमाम सामग्री अमर उजाला से भी ली हैं। इसका जिक्र करते हुए उन्होंने इसके लिए अमर उजाला का आभार भी जताया है।

विभिन्न संगठनों ने जताया शोक, दी श्रद्धांजलि
जौनपुर। पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद के निधन की खबर से जिले में शोक छा गया। कांग्रेस ने पार्टी कार्यालय पर शोक सभा कर दो मिनट का मौन रखा। इसमें पूर्व विधायक नदीम जावेद, जिलाध्यक्ष फ़ैसल हसन तबरेज, आरिफ खान,धर्मेंद्र निषाद, कलेंडर बिंद, सद्दाम, शमशाद, पप्पू पंडित, अनिल अस्थाना, शाहनवाज, इक़बाल हुसैन, मुकेश पांडेय आदि मौजूद रहे।संचालन सत्यवीर सिंह ने किया। वहीं अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के पदाधिकारियों ने जिला संगठन सचिव विश्व प्रकाश श्रीवास्तव दीपक के रुहट्टा आवास पर शोकसभा की। इसमें जिलाध्यक्ष नीलमणि श्रीवास्तव, प्रांतीय उपाध्यक्ष प्रदीप अस्थाना, राकेश श्रीवास्तव साधु, श्रीकांत श्रीवास्तव, राजकपूर श्रीवास्तव, अखिलेश श्रीवास्तव, राजेश श्रीवास्तव आदि मौजूद रहे। मोहम्मद हसन पीजी कॉलेज में हुई शोकसभा में प्राचार्य डॉ अब्दुल कादिर खान ने कहा कि पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद का मोहम्मद हसन कॉलेज से ही नहीं, बल्कि मोहम्मद हसन साहब से गहरा संबंध रहा। -पीजी कॉलेज की मान्यता दिलाने में 1994 में महाविद्यालय के उस समय के प्रबंधक डॉ अबू मोहम्मद साहब के साथ अथक प्रयास किया था। अनुसूचित साहित्य के मर्मज्ञ माता प्रसाद का व्यक्तित्व कृतित्व अनुकरणीय रहा है। शोकसभा में इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य मो. नासिर खान, डॉ शहनवाज खान, डॉ कमरूद्दीन शेख, डॉ शाहिद अलीम, डॉ अरशद कमाल, डॉ केके सिंह, डॉ प्रवीण यादव, जीवन लाल यादव, अहमद अब्बास खान आदि मौजूद रहे।

तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन के साथ पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद की फाईल फोटो।

तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन के साथ पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद की फाईल फोटो।- फोटो : JAUNPUR

पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद को अरूणांचल प्रदेश के राज्यपाल पद की शपथ दिलाते अरूणांचल के तत्कालीन

पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद को अरूणांचल प्रदेश के राज्यपाल पद की शपथ दिलाते अरूणांचल के तत्कालीन- फोटो : JAUNPUR

बौद्ध धर्म गुरू के साथ पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद की फाईल फोटो।

बौद्ध धर्म गुरू के साथ पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद की फाईल फोटो।- फोटो : JAUNPUR

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