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पांव में छाले, खाने के लाले, याद आ रहे बस घर वाले...

Mon, 30 Mar 2020 11:21 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 30 Mar 2020 11:21 PM IST
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Blisters in the feet, food cravings, missing bus houses
21- जेसीज चौराहे पर पुलिसकर्मीयों द्वारा रोके गये भारत गैस के वाहन में आजमगढ़ जाने के लिए चढ़ते यात - फोटो : JAUNPUR
पांव में छाले, खाने के लाले, अब याद आ रहे बस घर वाले
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जौनपुर। सिर पर गठरी, कंधे पर झोला, और दिल में ढेर सारे दर्द लिए मजदूर भारी कदमों के साथ सोमवार को भी बड़ी संख्या में जौनपुर पहुंचे। कोई सैकड़ों किमी की पैदल यात्रा कर पहुंचा है तो कोई हाईवे पर दौड़ते ट्रकों की छतों पर पनाह लेकर यहां आया। जौनपुर पहुंचने के बाद वह आगे के सफर के लिए जगह-जगह खड़े होकर साधन का इंतजार करते रहे। रोडवेज बसों से आए यात्रियों को तो जिला प्रशासन ने तहसील स्तरों पर बने आश्रय स्थलों में पनाह दिला दी है, मगर ट्रक व पैदल चलकर आए मजदूरों का हाल पूछने वाला कोई नहीं था। कुछ स्थानों पर व्यक्तिगत और संगठन के माध्यम से उन्हें भोजन-पानी की व्यवस्था कराई गई, लेकिन कोरोना का खौफ ऐसा है कि कुछ देर बाद उन्हें वहां से भी आगे जाने के लिए कह दिया गया। विपत्ति के मारे मजदूर अपनी दुश्वारियों का रोना रो रहे हैं। कई ऐसे भी हैं, जिनके पास न झोले में कुछ है और न ही जेब में। वह जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहते हैं, ताकि अपनों के बीच पहुंचकर वह इस महामारी के खौफ से बच सकें।
भोपाल से आजमगढ़ की राह पर बढ़ रहे दर्जन भर युवकों के लड़खड़ाते होठ और पैरों की हालात हर किसी की आंखें डबडबाने वाली थीं। हालत इतनी खराब कि वह कुछ बोलने व सुनने की स्थिति में नहीं थे। भूखे-प्यासे इन युवकों की आंखों में बस एक ही आस थी कि चाहे जैसे भी घर तक पहुंच जाएं। दो दिन पहले निकले यह युवक सोमवार को मुंगराबादशाहपुर पहुंचे। पलायन के बारे में पूछने पर बोले कि जब सब्र की इंतहा हो गई तो पैदल ही घर के लिए निकलना पड़ा। हम भी चाहते हैं कि कोरोना से बचें, लेकिन परदेश में भूखों मरने से बेहतर लगा कि घर पहुंच जाएं।
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आजमगढ़ निवासी जितेंद्र, आशीष, राजा, सुशील, विशाल, अंब्रीश, दिनेश, राजकुमार आदि युवक आजमगढ़ के अलग-अलग गांव के रहने वाले हैं। सभी भोपाल में सोलर पैनल बनाने वाली एक फैक्ट्री में काम करते थे। लॉक डाउन हुआ तो फैक्ट्री मालिक ने सभी से हाथ जोड़ लिया। एक बारगी नौकरी जाने के गम ने उन्हें तोड़ दिया। कुछ पैसे लेकर घर के लिए निकले तो तमाम दुश्वारियां सामने खड़ी हो गईं। करीब 65 किमी पैदल चलने के बाद एक ट्रक वाले ने सहारा दिया तो किसी तरह से प्रयागराज पहुंचे। पूरे रास्ते भोजन नसीब नहीं हुआ। कहीं से बिस्किट पानी का इंतेजाम हुआ तो जीने का सहारा मिला। प्रयागराज पहुंचे तो घर जाने के लिए कोई वाहन नहीं मिला। फिर सारे लोग पैदल ही निकल गए। मुंगराबादशाहपुर बार्डर पर पहुंचे तो पुलिस ने भगा दिया। लाचार मजबूर थके हारे युवक पैदल 10 किमी फिर से पीछे गए फिर किसी दूसरे रास्ते से मुंगराबादशाहपुर पहुंचे। यहां सामाजिक जिम्मेदारी निभाने वाले युवकों ने उनके पेट की आग बुझाई, तब कुछ राहत की सांस ली। अपनी पीड़ा सुनाते फफकते युवकों की यही प्रार्थना थी कि ऐसी तकलीफ भगवान किसी को न दें।
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भूखे रहे, फुटपाथ पर सोए, नहीं मिला कोई सहारा
जलालपुर। चार दिन पहले दिल्ली से निकली मजदूरों की टोली सोमवार को जलालपुर पहुंची। भूखे-प्यासे, थके-हारे पहुंचे ट्रक पर बैठे यह मजदूर पूरी तरह टूट चुके थे। मुगलसराय के रितेश मिश्रा, बिहार के पिंटू, हरेंद्र सिंह, सुरेंद्र, चंदन, अनुराग चौहान, हनुमान, चंदौली के अशोक, सुनीता, गाजीपुर के वीरेंद्र, सुशील, बनारस के संतोष, सर्वेश, अशफाक आदि ने बताया कि जब तक हम लोगों के पास खाने पीने का था, तब तक कोशिश की कि कहीं न जाएं। जब जेब खाली हुई तो मकान खाली कर फुटपाथ पर अपना समय गुजारे। कोई विकल्प न मिलने पर पैदल ही सफर को मजबूर होना पड़ा। शुक्रवार की सुबह 10 बजे पैदल आनंद बिहार से निकल कर रोडवेज स्टेशन पहुंचे। वहां से रामपुर बाईपास तक आए। करीब 100 किमी की दूरी के बाद एक पिकअप से मदद लेकर सौ किमी आए। सोमवार की सुबह जौनपुर पहुंचे हैं। पुलिस की मेहरबानी से किसी तरह ट्रक पर बैठकर वाराणसी जा रहे हैं।
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