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आनलाइन पढ़ाई करके आकाश ने यूपीएससी में हासिल की 128वीं रैंक
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जौनपुर। सिकरारा थाना क्षेत्र के ककोहिया गांव निवासी आकाश सिंह ने यूपीएसी परीक्षा में 128वीं रैंक हासिल की है। उन्होंने आनलाइन पढ़ाई कर यह सफलता पाई है।
28 वर्षीय आकाश सिंह के पिता अरविंद कुमार सिंह जल निगम में इंजीनियर हैं, जो इस समय लखनऊ में ही तैनात हैं। पिता के तबादले के कारण के मां माधुरी के साथ आकाश को भी उनके साथ जाना पड़ता था। आकाश ने हाईस्कूल की पढ़ाई सुल्तानपुर से किया। जहां उन्हें 94.4 प्रतिशत अंक मिले जबकि कानपुर के एक स्कूल से इंटरमीडिएट किया। जहां उन्हें 97.8 प्रतिशत अंक हासिल हुआ था। इसके बाद आकाश ने आईआईटी खड़गपुर से बीटेक किया। वहां उन्हें सिल्वर मेडल भी मिला था। पढ़ाई पूरी करने के बाद आकाश फ्लिप कार्ट कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर के पदपर बेंगलुरु में काम करने लगे। साथ ही यूपीएससी की परीक्षा में दो बार परीक्षाबैठे, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। तब वह 17 लाख रुपये के सालाना पैकेज की इस नौकरी को छोड़ कर लखनऊ स्थित अपने घर आ गए। आकाश बताते हैं कि घंटे-घंटे बैठकर पढ़ाई करने में विश्वास नहीं रखते हैं। वह जितना मन करता था उतना ही पढ़ाई करते थे। इतना ही नहीं, उन्होंने इसके लिए किसी प्रकार की कोचिंग भी नहीं किया था। इंटरनेट पर आनलाइन अपनी पढ़ाई करते थे और पांचवें प्रयास में 128वीं रैंक पाई। वह अपनी सफलता का श्रेय पिता अरविंद सिंह और मां माधुरी देवी के साथ-साथ पूरे परिवार को देते हैं, जिन्होंने हर बार उनका साथ दिया।
चांदी कारीगर की बेटी ने 379वीं रैंक
सुजानगंज। बालवरगंज निवासी व चांदी के कारीगर राधेश्याम सोनी की बेटी शालू सोनी ने यूपीएससी में 379वीं रैंक हासिल किया है। इसकी खबर लगते ही क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ पड़ी।
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25 वर्षीय शालू सोनी दिल्ली में रहकर बिना कोचिंग किए यूपीएससी की तैयारी कर रही थी। प्रैक्टिस पर भरोसा करने वाली शालू बतातीं हैं कि कक्षा छह से इंटर मीडिएट तक की पढ़ाई मडियाहूं स्थित नवोदय विद्यालय से हुई। इस दौरान शालू ने हाईस्कूल में 92 प्रतिशत और इंटरमीडिएट में 91 प्रतिशत अंक से साथ पास हुई। इसके बाद वह कंप्यूटर साइंस से एनआईटी जम्मू कश्मीर से इंजीनियरिंग में गोल्ड मेडलिस्ट रही। फिर इसके बाद गेट क्वालिफाई की। दो वर्ष से वह दिल्ली के मुखर्जी नगर से रहकर तैयारी कर रही थी। शालू ने बताया कि उसने तीसरे प्रयास में यूपीएससी की परीक्षा में सफलता हासिल की है। अपने अपनी सफलता का श्रेय पिता राधेश्याम और मां उषा देवी को देती है। साथ ही कहती हैं कि खुद पर भरोसा रखते हुए यदि सही दिशा में और सही तरीके से पढ़ाई की जाय तो सफलता अवश्य मिलती है।
पांचवीं प्रयास में प्रभाकर को मिला 650वीं रैंक
जलालपुर। जलालपुर क्षेत्र के कुसाव गांव निवासी प्रभाकर सिंह ने पांचवीं बार में यूपीएससी में 650 वीं रैंक हासिल किया है। वे इस समय एआरटीओ गाजियाबाद के पद पर तैनात भी हैं।
30 वर्षीय प्रभाकर सिंह के पिता संतोष सिंह पेशे से किसान हैं, जबकि मां पुष्पा सिंह गृहिणी हैं। प्रभाकर सिंह ने हाइस्कूल की पढ़ाई चंद्रिका सिंह इंटर कालेज भाउपुर से किया है। वे 51 प्रतिशत अंकों के साथ इस परीक्षा में पास हुए थे। इंटरमीडिएट की पढ़ाई प्रेम बहादुर सिंह इंटर कालेज खालिसपुर वाराणसी से किया और 66 प्रतिशत अंक से पास हुए। बयालसी डिग्री कालेज जलालपुर से उन्होंने स्नातक किया। जहां 53 प्रतिशत अंक से पास होने के बाद प्राचीन इतिहास से एमए करने के लिए बीएचयू में दाखिला लिए। इसके बाद नेट, फिर जेआरएफ किए और 2015 में सीआरपीएफ में असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर नौकरी पाए। 2016 में नायब तहसीलदार, 2017 में एआरटीओ, 2018 में असिस्टेंट लेबर कमिश्नर और साल 2010 में एसडीएम बने। वह इस समय गाजियाबाद में तैनात हैं। वह बताते हैं कि वह पहले दिल्ली में कोचिंग किए थे। लेकिन, यह सफलता वह गांव में रहकर बिना कोचिंग किए हासिल किए हैं
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28 वर्षीय आकाश सिंह के पिता अरविंद कुमार सिंह जल निगम में इंजीनियर हैं, जो इस समय लखनऊ में ही तैनात हैं। पिता के तबादले के कारण के मां माधुरी के साथ आकाश को भी उनके साथ जाना पड़ता था। आकाश ने हाईस्कूल की पढ़ाई सुल्तानपुर से किया। जहां उन्हें 94.4 प्रतिशत अंक मिले जबकि कानपुर के एक स्कूल से इंटरमीडिएट किया। जहां उन्हें 97.8 प्रतिशत अंक हासिल हुआ था। इसके बाद आकाश ने आईआईटी खड़गपुर से बीटेक किया। वहां उन्हें सिल्वर मेडल भी मिला था। पढ़ाई पूरी करने के बाद आकाश फ्लिप कार्ट कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर के पदपर बेंगलुरु में काम करने लगे। साथ ही यूपीएससी की परीक्षा में दो बार परीक्षाबैठे, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। तब वह 17 लाख रुपये के सालाना पैकेज की इस नौकरी को छोड़ कर लखनऊ स्थित अपने घर आ गए। आकाश बताते हैं कि घंटे-घंटे बैठकर पढ़ाई करने में विश्वास नहीं रखते हैं। वह जितना मन करता था उतना ही पढ़ाई करते थे। इतना ही नहीं, उन्होंने इसके लिए किसी प्रकार की कोचिंग भी नहीं किया था। इंटरनेट पर आनलाइन अपनी पढ़ाई करते थे और पांचवें प्रयास में 128वीं रैंक पाई। वह अपनी सफलता का श्रेय पिता अरविंद सिंह और मां माधुरी देवी के साथ-साथ पूरे परिवार को देते हैं, जिन्होंने हर बार उनका साथ दिया।
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चांदी कारीगर की बेटी ने 379वीं रैंक
सुजानगंज। बालवरगंज निवासी व चांदी के कारीगर राधेश्याम सोनी की बेटी शालू सोनी ने यूपीएससी में 379वीं रैंक हासिल किया है। इसकी खबर लगते ही क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ पड़ी।
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25 वर्षीय शालू सोनी दिल्ली में रहकर बिना कोचिंग किए यूपीएससी की तैयारी कर रही थी। प्रैक्टिस पर भरोसा करने वाली शालू बतातीं हैं कि कक्षा छह से इंटर मीडिएट तक की पढ़ाई मडियाहूं स्थित नवोदय विद्यालय से हुई। इस दौरान शालू ने हाईस्कूल में 92 प्रतिशत और इंटरमीडिएट में 91 प्रतिशत अंक से साथ पास हुई। इसके बाद वह कंप्यूटर साइंस से एनआईटी जम्मू कश्मीर से इंजीनियरिंग में गोल्ड मेडलिस्ट रही। फिर इसके बाद गेट क्वालिफाई की। दो वर्ष से वह दिल्ली के मुखर्जी नगर से रहकर तैयारी कर रही थी। शालू ने बताया कि उसने तीसरे प्रयास में यूपीएससी की परीक्षा में सफलता हासिल की है। अपने अपनी सफलता का श्रेय पिता राधेश्याम और मां उषा देवी को देती है। साथ ही कहती हैं कि खुद पर भरोसा रखते हुए यदि सही दिशा में और सही तरीके से पढ़ाई की जाय तो सफलता अवश्य मिलती है।
पांचवीं प्रयास में प्रभाकर को मिला 650वीं रैंक
जलालपुर। जलालपुर क्षेत्र के कुसाव गांव निवासी प्रभाकर सिंह ने पांचवीं बार में यूपीएससी में 650 वीं रैंक हासिल किया है। वे इस समय एआरटीओ गाजियाबाद के पद पर तैनात भी हैं।
30 वर्षीय प्रभाकर सिंह के पिता संतोष सिंह पेशे से किसान हैं, जबकि मां पुष्पा सिंह गृहिणी हैं। प्रभाकर सिंह ने हाइस्कूल की पढ़ाई चंद्रिका सिंह इंटर कालेज भाउपुर से किया है। वे 51 प्रतिशत अंकों के साथ इस परीक्षा में पास हुए थे। इंटरमीडिएट की पढ़ाई प्रेम बहादुर सिंह इंटर कालेज खालिसपुर वाराणसी से किया और 66 प्रतिशत अंक से पास हुए। बयालसी डिग्री कालेज जलालपुर से उन्होंने स्नातक किया। जहां 53 प्रतिशत अंक से पास होने के बाद प्राचीन इतिहास से एमए करने के लिए बीएचयू में दाखिला लिए। इसके बाद नेट, फिर जेआरएफ किए और 2015 में सीआरपीएफ में असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर नौकरी पाए। 2016 में नायब तहसीलदार, 2017 में एआरटीओ, 2018 में असिस्टेंट लेबर कमिश्नर और साल 2010 में एसडीएम बने। वह इस समय गाजियाबाद में तैनात हैं। वह बताते हैं कि वह पहले दिल्ली में कोचिंग किए थे। लेकिन, यह सफलता वह गांव में रहकर बिना कोचिंग किए हासिल किए हैं