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पलेवा के लिए नहर में पानी का इंतजार कर रहे किसान
Updated Wed, 05 Dec 2018 12:17 AM IST
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जौनपुर। गेहूं बुवाई का असली समय समाप्त होने को है लेकिन जिले के बहुत से किसान अभी बुवाई के लिए नहर में पानी आने का इंतजार कर रहे हैं। जिले में छोटी बड़ी कुल 343 नहरें हैं। सिंचाई के लिए तकरीबन 1.66 लाख हेक्टेयर भूमि नहर पर निर्भर है। बावजूद इसके अभी तक किसी भी नहर में पानी नहीं छोड़ा गया। नहरों में 15 दिसंबर के बाद पानी छोड़े जाने के आसार हैं। ऐसे में खेतों में बुवाई से पहले पलेवा के लिए पानी का इंतजार कर रहे किसान समय से बुवाई नहीं कर सकेंगे। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि दिसंबर के दूसरे सप्ताह के बाद बुवाई होने पर गेहूं का उत्पादन प्रभावित होगा।
करीब 50 लाख से अधिक आबादी वाले इस जिले में 3.54 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती होती है। इसमें रबी की फसलों की बुवाई 2.32 लाख 458 हेक्येयर में की जाती है। जिसमें 2.11 लाख हेक्टेयर में अकेले गेहूं की खेती की जाती है। 1.66 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई नहरों के सहारे होती है। लेकिन अभीतक नहरों में पानी न छोड़े जाने से किसान परेशान हैं। किसानों को इस बात की चिंता है कि बुवाई में देरी होने पर उत्पादन घट जाएगा। बदलापुर के किसान रामलखन यादव कहते हैं कि किसान रोज नहर को झांक कर मायूस लौट जा रहे हैं। गेहूं की बुवाई से पहले खेत में पलेवा लगाना जरूरी है। बुवाई से पहले खेत में पानी नहीं दिया गया तो फसल में अंकुरण नहीं होगा। खेत में पलेवा लगाने के एक सप्ताह से लेकर दस दिन बाद ही खेत जुताई के लिए तैयार होगा। ऐसे में नहर के सहारे सिंचाई करने वाले खेतों में गेहूं का उत्पादन प्रभावित होना तय है। सिंचाई विभाग के एक्सईएन आशीष कुशवाहा का कहना है कि शील्ट सफाई न होने के कारण नहरों में पानी नहीं छोड़ा जा सका। 15 दिसंबर तक पानी छोड़ा जाएगा।
प्रभावित होगा गेहूं का उत्पादन
जौनपुर। कृषि विज्ञान केंद्र के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डा. संदीप कुमार का कहना है कि गेहूं बुवाई का असली समय 15 नवंबर से लेकर दिसंबर के पहले सप्ताह तक माना जाता है। सात दिसंबर के बाद बोई गई फसल का उत्पादन घट जाता है। गेहूं की फसल के लिए कम तापमान सबसे अनुकूल होता है। जब फसल देर से बोई जाती है तो तामना बढने लगता है और गेहूं के पौधों का सही विकास नहीं हो पाता। पौधों की लंबाई घट जाती है और बालियां भी छोटी हो जाती हैं। 20 दिसंबर के बाद बोई गई फसल का उत्पादन 20 से 30 प्रतिशत कम हो जाती है। उनका कहना है कि अगर किसी कारण से गेहूं की बुवाई किसान समय से नहीं कर पाते तो उन्नत हलना प्रजाति का गेहूं बीज की बुवाई करनी चाहिए और बीज की मात्रा भी बढ़ा देनी चाहिए।
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करीब 50 लाख से अधिक आबादी वाले इस जिले में 3.54 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती होती है। इसमें रबी की फसलों की बुवाई 2.32 लाख 458 हेक्येयर में की जाती है। जिसमें 2.11 लाख हेक्टेयर में अकेले गेहूं की खेती की जाती है। 1.66 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई नहरों के सहारे होती है। लेकिन अभीतक नहरों में पानी न छोड़े जाने से किसान परेशान हैं। किसानों को इस बात की चिंता है कि बुवाई में देरी होने पर उत्पादन घट जाएगा। बदलापुर के किसान रामलखन यादव कहते हैं कि किसान रोज नहर को झांक कर मायूस लौट जा रहे हैं। गेहूं की बुवाई से पहले खेत में पलेवा लगाना जरूरी है। बुवाई से पहले खेत में पानी नहीं दिया गया तो फसल में अंकुरण नहीं होगा। खेत में पलेवा लगाने के एक सप्ताह से लेकर दस दिन बाद ही खेत जुताई के लिए तैयार होगा। ऐसे में नहर के सहारे सिंचाई करने वाले खेतों में गेहूं का उत्पादन प्रभावित होना तय है। सिंचाई विभाग के एक्सईएन आशीष कुशवाहा का कहना है कि शील्ट सफाई न होने के कारण नहरों में पानी नहीं छोड़ा जा सका। 15 दिसंबर तक पानी छोड़ा जाएगा।
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प्रभावित होगा गेहूं का उत्पादन
जौनपुर। कृषि विज्ञान केंद्र के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डा. संदीप कुमार का कहना है कि गेहूं बुवाई का असली समय 15 नवंबर से लेकर दिसंबर के पहले सप्ताह तक माना जाता है। सात दिसंबर के बाद बोई गई फसल का उत्पादन घट जाता है। गेहूं की फसल के लिए कम तापमान सबसे अनुकूल होता है। जब फसल देर से बोई जाती है तो तामना बढने लगता है और गेहूं के पौधों का सही विकास नहीं हो पाता। पौधों की लंबाई घट जाती है और बालियां भी छोटी हो जाती हैं। 20 दिसंबर के बाद बोई गई फसल का उत्पादन 20 से 30 प्रतिशत कम हो जाती है। उनका कहना है कि अगर किसी कारण से गेहूं की बुवाई किसान समय से नहीं कर पाते तो उन्नत हलना प्रजाति का गेहूं बीज की बुवाई करनी चाहिए और बीज की मात्रा भी बढ़ा देनी चाहिए।
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