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आज के परिवेश में भारतीय संस्कृति को अपनाना है रामराज्य
Updated Sat, 15 Sep 2018 01:20 AM IST
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बक्शा। मौजूदा दौर में पाश्चात्य संस्कृति से दूर भारतीय संस्कृति को अपनाना ही रामराज्य है। रामराज्य की पहली बुनियाद ही पारिवारिक प्रेम एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाए रखना है। यह बात पं.वशिष्ठ नारायण उपाध्याय ने शुक्रवार को बक्शा विकास खंड के लेदुका बाजार में स्थित राम जानकी मंदिर के प्रांगण में चल रहे सात दिवसीय श्री रामकथा मानस प्रवचन के दौरान कही।
लंका विजय के बाद श्रीराम कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि पुष्पक विमान से उतरते ही प्रभु राम माता कैकेई को न देख विचलित हो उठे। सबसे पहले कैकेयी के ही महल जा पहुंचे। राजा दशरथ ब्रह्ममुहूर्त में उठते ही गुरु को प्रणाम करते थे। उन्होंने कहा कि आज एक भाई दूसरे भाई से मुकदमा जीतते ही गाँव में मिठाई बंटवाता है। वहीं अयोध्या में छोटे भाइयों को खेल में जीत जाने के लिए प्रभु राम खुद हार जाते थे। प्रभु के राज्यभिषेक के समय अयोध्यावासी प्रभु राम के मुकुट निहारते हैं तो भरत राम के चरणों को निहारते हैं। रामराज्य भरत जैसे भाई की छत्रछाया में ही संभव हुआ। कथा समापन के बाद प्रसाद वितरण हुआ। संचालन दयाशंकर दूबे ने किया। इस मौके पर भागवत भूषण प्रेमप्रकाश मिश्र, आयोजक राजनाथ सेठ, विजय यादव, सन्तोष, इंद्रसेन यादव, पवन कुमार मोदनवाल, हरिसेवक यादव आदि मौजूद रहे।
लंका विजय के बाद श्रीराम कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि पुष्पक विमान से उतरते ही प्रभु राम माता कैकेई को न देख विचलित हो उठे। सबसे पहले कैकेयी के ही महल जा पहुंचे। राजा दशरथ ब्रह्ममुहूर्त में उठते ही गुरु को प्रणाम करते थे। उन्होंने कहा कि आज एक भाई दूसरे भाई से मुकदमा जीतते ही गाँव में मिठाई बंटवाता है। वहीं अयोध्या में छोटे भाइयों को खेल में जीत जाने के लिए प्रभु राम खुद हार जाते थे। प्रभु के राज्यभिषेक के समय अयोध्यावासी प्रभु राम के मुकुट निहारते हैं तो भरत राम के चरणों को निहारते हैं। रामराज्य भरत जैसे भाई की छत्रछाया में ही संभव हुआ। कथा समापन के बाद प्रसाद वितरण हुआ। संचालन दयाशंकर दूबे ने किया। इस मौके पर भागवत भूषण प्रेमप्रकाश मिश्र, आयोजक राजनाथ सेठ, विजय यादव, सन्तोष, इंद्रसेन यादव, पवन कुमार मोदनवाल, हरिसेवक यादव आदि मौजूद रहे।
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