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बीस हजार सालाना से अधिक लेने वाले स्कूलों की फंस सकती है गर्दन

Wed, 04 Apr 2018 11:53 PM IST
Updated Wed, 04 Apr 2018 11:53 PM IST
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बीस हजार सालाना से अधिक लेने वाले स्कूलों की फंस सकती है गर्दन

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शुल्क निर्धारण अध्यादेश के बाद निजी विद्यालयों में बीस हजार से अधिक सालाना फीस नहीं वसूल जा सकती है। इससे निजी स्कूल संचालकों की बेचैनी बढ़ गई है लेकिन अभिभावकों ने इसका स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे मनमाने तरीके से शुल्क वसूली पर रोक लगेगी।
जिले में सीबीएसई बोर्ड के 56 विद्यालय है। जिसमें तकरीबन 80 हजार छात्र-छात्रा अध्यनरत हैं। उनसे प्रवेश शुल्क के लिए आठ से 10 हजार रुपये वसूल किए जाते हैं। वाहन शुल्क के 24 हजार, मासिक शिक्षण शुल्क के लिए 36 हजार और परीक्षा शुल्क के रूप में हजार रुपये लिए जाते हैं। मनमाने तरीके से विद्यालय किताबें भी खरीदवाते हैं, जिस पर पांच से छह हजार रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। अब छात्रा का पंजीकरण शुल्क, परीक्षा शुल्क और संयुक्त वार्षिक शुल्क को मूल फीस और वैकल्पिक शुल्क में बस किराया, बोर्डिंग, मेस का खर्च शामिल होगा। किताबें और यूनिफार्म तय दुकानों से खरीदने की बाध्यता समाप्त हो जाएगी।
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अभिभावकों ने किया सरकार के कदम का स्वागत
जौनपुर। ओलंदगंज निवासी प्रदीप कुमार जायसवाल का कहना है कि विद्यालय संचालक दस फीसदी शुल्क हर साल बढ़ा लेते हैं। जिसके कारण अपनी सैलरी से अधिक खर्च फीस और पढ़ाई पर करना पड़ रहा है। पढ़ाई का बोझ बढ़ने के कारण घर का बजट बिगड जाता है। निजी स्कूलों की फीस और महंगी किताबों पर अंकुश लगना चाहिए। तारापुर कालोनी निवासी किरण सिन्हा का कहना है कि सरकार ने स्ववित्तपोषित विद्यवालयों के लिए जो अध्यादेश जारी किया है वह उचित और सरहानीय है। उसका कड़ाई से अनुपालन होना चाहिए। बीस हजार से अधिक सालाना फीस लेने वाले स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाङिए। यदि सरकार सख्ती बरतेगी को अभिभावकों को राहत मिलेगी। हुसेनाबाद निवासी रीती तिवारी स्कूलों की मनमानी पर जिला प्रशासन को एक्शन लेना चाहिए। जिले में कई ऐसे स्कूल हैं। जिनकी फीस 60 से 70 हजार सालाना के करीब है। इसमें बच्चे का नामांकन, मासिक शुक्ल, टाई, बेल्ट, ड्रेस किताब आदि शामिल है। फीस और किताबों के दाम पर अंकुश लगाने की जरूरत है। कोतवाली के निकट निवासी कृष्ण कुमार का कहना है कि निजी विद्यालयों के लिए जो नियम बनाए हैं उसमें से अधिकांश का पालन तो पहले से कराया जाना चा हिए था। किताबों को बोझ के नीचे बच्चों को बचपन दब गया है। जितना वजन बच्चे का नहीं है उससे अधिक वजन की किताबें उसके कंधे पर होती है। किताबों का बोझ कम करने के लिए सरकार को पहल करनी चाहिए।
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