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Jalaun News: 51 साल से रावण-मेघनाद के पुतलों में जान डाल रहे वहीद, तीन पीढ़ियां निभा रहीं परंपरा
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फोटो- 02 कोंच में मेघनाद व जटायु का पुतला बनाते वहीद व उनके परिजन। संवाद
कोंच। कला की कोई सीमा नहीं होती, वह लोगों को जोड़ने का काम करती है। इसकी मिसाल कोंच की ऐतिहासिक रामलीला में देखने को मिलती है, जहां आजाद नगर निवासी वहीद पिछले 51 साल से रावण और मेघनाद के विशाल पुतले तैयार कर रहे हैं। करीब 40 फीट ऊंचे इन पुतलों को बनाने में उनका पूरा परिवार तो जुटता ही है, रिश्तेदार भी हाथ बंटाते हैं जिनमें बेटे, नाती और दामाद आदि शामिल हैं। खास बात यह है कि 25 दिन में रावण, मेघनाद, जटायु और मारीच के पुतलों के साथ साथ रामलीला में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्री भी इनके द्वारा तैयार कर की जाती है।
कोंच की ऐतिहासिक रामलीला अपने अनूठे मैदानी आयोजनों के लिए जानी जाती है। यहां दशहरा मेले में रावण और मेघनाद के पुतलों को मैदान में दौड़ा कर युद्ध का सजीव चित्रण किया जाता है। इस अनूठे दृश्य को देखने के लिए कोंच ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से भी हजारों लोग पहुंचते हैं। मेले का आकर्षण ऐसा है कि लोग अपने नाते-रिश्तेदारों को भी इसे दिखाने के लिए बुलाते हैं। इस आयोजन को खास बनाने में वहीद और उनके परिवार की मेहनत की अहम भूमिका है।
उस्ताद से सीखी कला, 51 साल से संभाल रहे जिम्मेदारी
वहीद बताते हैं कि पहले उनके उस्ताद नूर मोहम्मद रामलीला के लिए पुतले तैयार करते थे। बाद में उन्होंने यह जिम्मेदारी संभाली और पिछले 51 साल से लगातार इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। वह रावण और मेघनाद के पुतलों के अलावा जटायु, मारीच, धनुष-बाण और गदा सहित रामलीला में इस्तेमाल होने वाली दूसरी सामग्री भी बनाते हैं।
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परिवार की तीन पीढ़ियां जुटती हैं काम में
पुतले तैयार करना अकेले किसी एक व्यक्ति का काम नहीं, बल्कि पूरे परिवार की मेहनत का परिणाम है। वहीद के बेटे, नाती और दामाद सहित नाते-रिश्तेदार भी उनके साथ जुटते हैं। सभी मिलकर करीब 25 दिन में रामलीला के लिए जरूरी पुतले और अन्य सामग्री तैयार करते हैं। पांच दशक से अधिक समय से चली आ रही यह मेहनत कोंच की ऐतिहासिक रामलीला की परंपरा को जीवंत बनाए रखने में योगदान दे रही है।
पुतले इतने मजबूत बनाए जाते हैं कि एक से डेढ़ घंटे दौड़ सकें
कोंच के दशहरे में रावण-मेघनाद के पुतलों को खड़ा करके नहीं दहन किया जाता है, बल्कि बाकायदा गाड़ियों पर कस कर उन्हें मैदान में दौड़ाया जाता है और राम-लक्ष्मण के साथ उनके युद्घ का सजीव चित्रण प्रस्तुत करने की मंशा आयोजन के प्रादुर्भावकालीन आयोजकों की रही होगी। इसीलिए पुतले तैयार करने में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि वे काफी मजबूत हों और उनमें कम से कम एक से डेढ घंटे तक दौड़ पाने की क्षमता हो।
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कोंच की ऐतिहासिक रामलीला अपने अनूठे मैदानी आयोजनों के लिए जानी जाती है। यहां दशहरा मेले में रावण और मेघनाद के पुतलों को मैदान में दौड़ा कर युद्ध का सजीव चित्रण किया जाता है। इस अनूठे दृश्य को देखने के लिए कोंच ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से भी हजारों लोग पहुंचते हैं। मेले का आकर्षण ऐसा है कि लोग अपने नाते-रिश्तेदारों को भी इसे दिखाने के लिए बुलाते हैं। इस आयोजन को खास बनाने में वहीद और उनके परिवार की मेहनत की अहम भूमिका है।
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उस्ताद से सीखी कला, 51 साल से संभाल रहे जिम्मेदारी
वहीद बताते हैं कि पहले उनके उस्ताद नूर मोहम्मद रामलीला के लिए पुतले तैयार करते थे। बाद में उन्होंने यह जिम्मेदारी संभाली और पिछले 51 साल से लगातार इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। वह रावण और मेघनाद के पुतलों के अलावा जटायु, मारीच, धनुष-बाण और गदा सहित रामलीला में इस्तेमाल होने वाली दूसरी सामग्री भी बनाते हैं।
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परिवार की तीन पीढ़ियां जुटती हैं काम में
पुतले तैयार करना अकेले किसी एक व्यक्ति का काम नहीं, बल्कि पूरे परिवार की मेहनत का परिणाम है। वहीद के बेटे, नाती और दामाद सहित नाते-रिश्तेदार भी उनके साथ जुटते हैं। सभी मिलकर करीब 25 दिन में रामलीला के लिए जरूरी पुतले और अन्य सामग्री तैयार करते हैं। पांच दशक से अधिक समय से चली आ रही यह मेहनत कोंच की ऐतिहासिक रामलीला की परंपरा को जीवंत बनाए रखने में योगदान दे रही है।
पुतले इतने मजबूत बनाए जाते हैं कि एक से डेढ़ घंटे दौड़ सकें
कोंच के दशहरे में रावण-मेघनाद के पुतलों को खड़ा करके नहीं दहन किया जाता है, बल्कि बाकायदा गाड़ियों पर कस कर उन्हें मैदान में दौड़ाया जाता है और राम-लक्ष्मण के साथ उनके युद्घ का सजीव चित्रण प्रस्तुत करने की मंशा आयोजन के प्रादुर्भावकालीन आयोजकों की रही होगी। इसीलिए पुतले तैयार करने में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि वे काफी मजबूत हों और उनमें कम से कम एक से डेढ घंटे तक दौड़ पाने की क्षमता हो।

फोटो- 02 कोंच में मेघनाद व जटायु का पुतला बनाते वहीद व उनके परिजन। संवाद

फोटो- 02 कोंच में मेघनाद व जटायु का पुतला बनाते वहीद व उनके परिजन। संवाद