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Jalaun News: तिरंगा उठाने पर जिन सपूतों ने खाई थी गोली, उनका स्मारक भी नहीं बचा पा रहे जिम्मेदार
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कदौरा। आजादी के बाद तिरंगा उठाने पर हैदराबाद के निजाम ने जिन वीर सपूतों पर गोली चलवा दी थी, आज उनके बचे स्मारक को भी जिम्मेदार नहीं संरक्षित कर पा रहे। हालत यह है कि स्मारक पूरी तरह से बदहाल हो चुका है। आसपास कंटीले बबूल के पेड़ और झाड़ियां उग आई हैं। यह स्मारक अब विकास की राह तक रहा है, लेकिन इसके बाद भी इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा।
कदौरा स्थित बावनी स्टेट में 25 सितंबर 1947 को जो हुआ, वह आज भी दूसरा जलियावाला बाग के नाम से इतिहास के पन्नों में दर्ज है। बावनी स्टेट की स्थापना 1784 में हैदराबाद के निजाम ने की थी। इस क्षेत्र पर निजाम की हुकूमत थी और देश की आजादी के बाद भी यहां तिरंगा फहराना प्रतिबंधित था। आजादी की खुशी के बीच यह क्षेत्र गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था। जब देश तिरंगे के रंग में रंगा तब बावनी स्टेट में तिरंगा फहराना बगावत समझा जाता था। 25 सितंबर 1947 को हरचंदपुर गांव के स्वतंत्रता सेनानियों ने तिरंगा यात्रा निकालने का साहसिक निर्णय लिया। जैसे ही यह खबर निजाम के अधिकारियों तक पहुंची, उन्होंने इसे रोकने के लिए कड़े कदम उठाए।
कोतवाल अहमद हुसैन ने अपने 24 सिपाहियों के साथ जुलूस को रोकने का प्रयास किया, लेकिन देशभक्त पीछे हटने को तैयार नहीं हुए तो पुलिस ने निजाम के कहने पर अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दीं। इस गोलीकांड में 11 स्वतंत्रता सेनानी शहीद हुए और 26 घायल हो गए। शहीद होने वालों में लल्लू सिंह बागी, कालिया पाल सजेहरा, जगन्नाथ यादव उदनपुर, मुन्ना भुर्जी उदनपुर, उजागर सविता जखेला, ठकुरी सिंह हरचंदपुर, राम यादव बड़ागांव, दीनदयाल पाल सजेहरा, बलवान सिंह इटौरा, बाबूराम शिवहरे हरचंदपुर, बिंदा अहिरवार जखेला नाम शामिल हैं।
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इन वीरों ने तिरंगे के सम्मान में अपने प्राणों की आहुति दी। इन्हीं की याद में हरचंदपुर गांव के पास स्मारक बनाया गया। ताकि, आने वाली पीढ़ी इनके बलिदान को याद करती रहे। समय बीता तो जिम्मेदारों ने आंखें मूंद लीं। आज यह स्मारक अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। हालत यह है कि आसपास बड़े-बड़े बबूल के पेड़ और झांड़ियां उग आई हैं। इससे स्मारक जर्जर होने की हालत में पहुंच गया है। लोगों का कहना है कि अगर इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में यह पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा और आने वाली पीढ़ी इन वीर सपूतों को भूल जाएगी।
जन दबाव और बावनी स्टेट का विलय
कदौरा। जब इस हत्याकांड की खबर पूरे देश में फैली तो जनता का आक्रोश उफान पर था। 24 अप्रैल 1948 को विंध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री लालाराम गौतम ने कदौरा पहुंचकर नवाब का चार्ज विश्वनाथ व्यास को सौंपा। 25 जनवरी 1950 को बावनी स्टेट का भारत संघ में पूर्ण विलय हुआ और निजाम की सत्ता का अंत हो गया।
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कदौरा स्थित बावनी स्टेट में 25 सितंबर 1947 को जो हुआ, वह आज भी दूसरा जलियावाला बाग के नाम से इतिहास के पन्नों में दर्ज है। बावनी स्टेट की स्थापना 1784 में हैदराबाद के निजाम ने की थी। इस क्षेत्र पर निजाम की हुकूमत थी और देश की आजादी के बाद भी यहां तिरंगा फहराना प्रतिबंधित था। आजादी की खुशी के बीच यह क्षेत्र गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था। जब देश तिरंगे के रंग में रंगा तब बावनी स्टेट में तिरंगा फहराना बगावत समझा जाता था। 25 सितंबर 1947 को हरचंदपुर गांव के स्वतंत्रता सेनानियों ने तिरंगा यात्रा निकालने का साहसिक निर्णय लिया। जैसे ही यह खबर निजाम के अधिकारियों तक पहुंची, उन्होंने इसे रोकने के लिए कड़े कदम उठाए।
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कोतवाल अहमद हुसैन ने अपने 24 सिपाहियों के साथ जुलूस को रोकने का प्रयास किया, लेकिन देशभक्त पीछे हटने को तैयार नहीं हुए तो पुलिस ने निजाम के कहने पर अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दीं। इस गोलीकांड में 11 स्वतंत्रता सेनानी शहीद हुए और 26 घायल हो गए। शहीद होने वालों में लल्लू सिंह बागी, कालिया पाल सजेहरा, जगन्नाथ यादव उदनपुर, मुन्ना भुर्जी उदनपुर, उजागर सविता जखेला, ठकुरी सिंह हरचंदपुर, राम यादव बड़ागांव, दीनदयाल पाल सजेहरा, बलवान सिंह इटौरा, बाबूराम शिवहरे हरचंदपुर, बिंदा अहिरवार जखेला नाम शामिल हैं।
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इन वीरों ने तिरंगे के सम्मान में अपने प्राणों की आहुति दी। इन्हीं की याद में हरचंदपुर गांव के पास स्मारक बनाया गया। ताकि, आने वाली पीढ़ी इनके बलिदान को याद करती रहे। समय बीता तो जिम्मेदारों ने आंखें मूंद लीं। आज यह स्मारक अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। हालत यह है कि आसपास बड़े-बड़े बबूल के पेड़ और झांड़ियां उग आई हैं। इससे स्मारक जर्जर होने की हालत में पहुंच गया है। लोगों का कहना है कि अगर इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में यह पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा और आने वाली पीढ़ी इन वीर सपूतों को भूल जाएगी।
जन दबाव और बावनी स्टेट का विलय
कदौरा। जब इस हत्याकांड की खबर पूरे देश में फैली तो जनता का आक्रोश उफान पर था। 24 अप्रैल 1948 को विंध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री लालाराम गौतम ने कदौरा पहुंचकर नवाब का चार्ज विश्वनाथ व्यास को सौंपा। 25 जनवरी 1950 को बावनी स्टेट का भारत संघ में पूर्ण विलय हुआ और निजाम की सत्ता का अंत हो गया।