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Jalaun News: कम पानी में अधिक उपज का लाभ ले रहे रगौली के किसान
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सुधीर राणा
उरई। डकोर विकासखंड के रगौली गांव में सेंट्रल पीवेट ड्रिप इरिगेशन सिस्टम स्थापित है। यह प्रणाली 75 एकड़ क्षेत्र के 26 किसानों को लाभान्वित कर रही है। इससे कम पानी में अधिक उपज प्राप्त करने में किसानों को मदद मिलेगी। इस प्रणाली से खेतों में सिंचाई के लिए पानी की कमी नहीं होगी।
सूखा प्रभावित बुंदेलखंड में जालौन जिले का यह सेंट्रल पीवेट ड्रिप इरिगेशन सिस्टम पूरी तरह सफल साबित हो रहा है। करीब 81 लाख रुपये की लागत से इसे स्थापित कराया गया है। जिलाधिकारी राजेश कुमार पांडेय ने बताया कि इस प्रणाली का उद्देश्य कम जल संसाधनों में अधिक क्षेत्रफल की सिंचाई करना है। रगौली में स्थापित यह प्रणाली भारत की पहली पीवेट ड्रिप इरिगेशन यूनिट है, जो किसानों के खेतों पर उनके ही सहयोग से संचालित की जा रही है। यह सिस्टम एक बार में लगभग 75 एकड़ भूमि की सिंचाई करने में सक्षम है और इसमें जलस्रोत के रूप में सात लाख क्यूबिक मीटर क्षमता वाला तालाब तैयार किया गया है। बताया कि यह प्रणाली पारंपरिक सिंचाई विधियों की तुलना में लगभग 55 प्रतिशत जल की बचत करती है। इससे जलसंकट वाले क्षेत्रों में खेती को स्थिर और लाभकारी बनाया जा सकता है। साथ ही यह प्रणाली फसलों की गुणवत्ता बढ़ाने, बीज उत्पादन को सशक्त करने और किसानों की आमदनी में वृद्धि के लिए कारगर मानी जा रही है।
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उरई। डकोर विकासखंड के रगौली गांव में सेंट्रल पीवेट ड्रिप इरिगेशन सिस्टम स्थापित है। यह प्रणाली 75 एकड़ क्षेत्र के 26 किसानों को लाभान्वित कर रही है। इससे कम पानी में अधिक उपज प्राप्त करने में किसानों को मदद मिलेगी। इस प्रणाली से खेतों में सिंचाई के लिए पानी की कमी नहीं होगी।
सूखा प्रभावित बुंदेलखंड में जालौन जिले का यह सेंट्रल पीवेट ड्रिप इरिगेशन सिस्टम पूरी तरह सफल साबित हो रहा है। करीब 81 लाख रुपये की लागत से इसे स्थापित कराया गया है। जिलाधिकारी राजेश कुमार पांडेय ने बताया कि इस प्रणाली का उद्देश्य कम जल संसाधनों में अधिक क्षेत्रफल की सिंचाई करना है। रगौली में स्थापित यह प्रणाली भारत की पहली पीवेट ड्रिप इरिगेशन यूनिट है, जो किसानों के खेतों पर उनके ही सहयोग से संचालित की जा रही है। यह सिस्टम एक बार में लगभग 75 एकड़ भूमि की सिंचाई करने में सक्षम है और इसमें जलस्रोत के रूप में सात लाख क्यूबिक मीटर क्षमता वाला तालाब तैयार किया गया है। बताया कि यह प्रणाली पारंपरिक सिंचाई विधियों की तुलना में लगभग 55 प्रतिशत जल की बचत करती है। इससे जलसंकट वाले क्षेत्रों में खेती को स्थिर और लाभकारी बनाया जा सकता है। साथ ही यह प्रणाली फसलों की गुणवत्ता बढ़ाने, बीज उत्पादन को सशक्त करने और किसानों की आमदनी में वृद्धि के लिए कारगर मानी जा रही है।
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