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चैत्र नवरात्र के पहले दिन गूंजे मैया के जयकारे

Fri, 08 Apr 2016 11:11 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, उरई
अमर उजाला ब्यूरो, उरई Updated Fri, 08 Apr 2016 11:11 PM IST
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On the first day of Chaitra Navratri Gunje Maiya Jaykare
हुल्की माता मंदिर में देवी मां के दर्शन को लगी भीड़। - फोटो : अमर उजाला
नवरात्र के पहले दिन शुक्रवार को शहर के सभी देवी मंदिर माता के जयकारों से गूंज उठे। तड़के से ही भक्तों की भीड़ मंदिरों में पहुंचने लगी और पूजा अर्चना कर मन्नतें मांगी गईं।  पहले दिन श्रद्धालुओं ने देवी के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की घरों में स्थापन कर पूजन-अर्चन किया। सुबह से ही मंदिरों में जुटी भारी भीड़ को देखते हुए पुलिस केे अतिरिक्त इंतजाम करने पड़े।
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देर शाम भक्तों के घरों में ज्वारे बोए। कई घरों में कलश स्थापना भी की गई। नवरात्र के पहले दिन देवी शैलपुत्री की पूजा की गई। शास्त्रों के अनुसार माता पार्वती पर्वत पुत्री होने के कारण शैलपुत्री के नाम से प्रसिद्ध हुईं। मां का वास पर्वत पर है और इस कारण वह प्रकृति की अधिष्ठात्री हैं। पहले दिन नगर के हुल्की माता मंदिर, बड़ी माता मंदिर, संकटा माता मंदिर, शीतला
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माता मंदिर में भक्त जुटे। मंदिर को गुरुवार देर रात ही फूलों व बिजली की झालरों से सजाया गया था। माता का श्रृंगार देखते ही बना। सभी मंदिरों में झांकी भी सजाई गई। सुबह 5 बजे से श्रद्धालुओं ने मंदिरों में पहुंचकर देवी मां का जलाभिषेक किया। अधिकांश श्रद्धालुओं ने व्रत रखा और दुर्गा मां की प्रथम शक्ति मां शैलपुत्री की आराधना की। श्रद्धालु महिलाओं ने देवी मां को
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पोशाक चढ़ाई व पूजन किया। शाम को महिलाओं ने मंदिरों में जाकर दीपक जलाया व माता रानी की आरती भी की। स्थानीय हुल्की माता मंदिर में भजन संध्या का आयोजन किया गया। भजन संध्या में श्रद्धालु महिलाओं ने देवी गीत अचरी गाईं। बताते चलें कि चैत्र नवरात्र की अपना ही महत्व है। इस दिन से हिंदू नववर्ष का भी शुभारंभ होता है। इसे वर्ष प्रतिपदा के

नाम से जाना जाता है। शुक्रवार से शुरू हुए नव दुर्गा उत्सव में तमाम श्रद्धालु पूरे नौ दिन देवी की स्थापना करने के बाद प्रतिदिन सप्तशती पाठ कर विधिवत पूजन करते हैं। अष्टमी और नवमी के दिन व्रत का पारायण कन्या भोज और हवन के साथ किया जाता है। शहर में कई जगह शुक्रवार को देवी भागवत का भी शुभारंभ हुआ।

देवी उपासना में डूबा नगर
जालौन। नवरात्र के प्रथम दिन देवी शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की गई। चैत्र नवरात्र के प्रथम दिन मंदिरों व घरों में देवी स्थापना घट स्थापित कर की गई। सुबह जैसे ही मंदिरों की घंटी की आवाज सुनाई दी, वैसे ही पूरा नगर माता के जयकारों से गूंजने लगा। नौ दिनों तक चलने वाले पर्व के प्रथम दिन शैल पुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार

देवी सती के पिता दक्ष प्रजापति द्वारा सती के सामने ही उनके पति शंकरजी का अपमान किया गया था। इससे नाराज सती यज्ञ में कूद कर भस्म हो गईं। इसके बाद सती राजा हिमांचल


के यहां देवी पार्वती के रूप में जन्मीं। शैल का अर्थ पर्वत होता है। राजा हिमांचल शैलराज थे, इसलिए देवी पार्वती को शैलपुत्री के नाम से भी जाना जाता है। प्रथम दिन नगर में छोटी माता, बड़ीमाता, लखिया मंदिर, शक्ति पीठ कामाख्या मंदिर पर सुबह चार बजे से देर रात्र तक देवी भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी रही। 
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