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नए साहित्य को पाठ्यक्रम में मिले और जगह: डॉ. संदीप
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उरई। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ एवं संस्कृत विभाग की ओर से डीवी कॉलेज में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। डॉ. संदीप ने नए साहित्य को पाठ्यक्रम में और जगह दिए जाने की बात कही।
मुख्य वक्ता प्रोफेसर बलभद्र त्रिपाठी ने कहा कि प्राचीनकाल से लेकर आज तक लगातार नए संस्कृत साहित्य को लिखा जा रहा है। आधुनिक दृष्टि से, आधुनिक विधाओं की रचनाओं से संस्कृत का साहित्य समृद्ध हो रहा है। महाकाव्य, खंडकाव्य, कथा, कहानी, संस्कृत ग़ज़ल, गीतिका, उपन्यास, संस्कृत लोकगीत, मुक्तक, नाटक, एकांकी आदि सभी विधाओं में संस्कृत में काव्य लिखे जा रहे हैं। डॉ संदीप द्विवेदी ने कहा कि आधुनिक संस्कृत साहित्य को पाठ्यक्रम में और भी स्थान मिलना चाहिए ताकि सबको नए साहित्य से परिचय कराया जा सके। संस्कृत साहित्य को केवल प्राचीन कहना ठीक नहीं है संस्कृत साहित्य विश्व साहित्य के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है।
प्राचार्य प्रो. राजेश चंद्र पांडेय ने संस्कृत ने हमारी साहित्य की परंपरा को समृद्ध बनाया। डॉ. रत्नेश त्रिवेदी, प्रो. टीआर निरंजन, डॉ. शिव संपत द्विवेदी, श्यामसुंदर शर्मा, डॉ. अलकारानी पुरवार, डॉ. गौरव यादव ने भी विचार रखे। संचालन संगोष्ठी के सचिव संस्कृत विभाग के प्रभारी डॉ. सर्वेश कुमार शांडिल्य ने किया। इस दौरान डॉ. नीरज द्विवेदी, डॉ. नमोनारायण, डॉ. शैलजा गुप्ता, डॉ, माधुरी रावत, डॉ. राजेश पालीवाल, डॉ. अतुल प्रकाश बुधौलिया, डॉ. श्री प्रकाश पांडेय, डॉ, विजेंद्र कुमार, डॉ. शीलू सेंगर, डॉ. श्रवण त्रिपाठी आदि रहे।
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मुख्य वक्ता प्रोफेसर बलभद्र त्रिपाठी ने कहा कि प्राचीनकाल से लेकर आज तक लगातार नए संस्कृत साहित्य को लिखा जा रहा है। आधुनिक दृष्टि से, आधुनिक विधाओं की रचनाओं से संस्कृत का साहित्य समृद्ध हो रहा है। महाकाव्य, खंडकाव्य, कथा, कहानी, संस्कृत ग़ज़ल, गीतिका, उपन्यास, संस्कृत लोकगीत, मुक्तक, नाटक, एकांकी आदि सभी विधाओं में संस्कृत में काव्य लिखे जा रहे हैं। डॉ संदीप द्विवेदी ने कहा कि आधुनिक संस्कृत साहित्य को पाठ्यक्रम में और भी स्थान मिलना चाहिए ताकि सबको नए साहित्य से परिचय कराया जा सके। संस्कृत साहित्य को केवल प्राचीन कहना ठीक नहीं है संस्कृत साहित्य विश्व साहित्य के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है।
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प्राचार्य प्रो. राजेश चंद्र पांडेय ने संस्कृत ने हमारी साहित्य की परंपरा को समृद्ध बनाया। डॉ. रत्नेश त्रिवेदी, प्रो. टीआर निरंजन, डॉ. शिव संपत द्विवेदी, श्यामसुंदर शर्मा, डॉ. अलकारानी पुरवार, डॉ. गौरव यादव ने भी विचार रखे। संचालन संगोष्ठी के सचिव संस्कृत विभाग के प्रभारी डॉ. सर्वेश कुमार शांडिल्य ने किया। इस दौरान डॉ. नीरज द्विवेदी, डॉ. नमोनारायण, डॉ. शैलजा गुप्ता, डॉ, माधुरी रावत, डॉ. राजेश पालीवाल, डॉ. अतुल प्रकाश बुधौलिया, डॉ. श्री प्रकाश पांडेय, डॉ, विजेंद्र कुमार, डॉ. शीलू सेंगर, डॉ. श्रवण त्रिपाठी आदि रहे।
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