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लॉकडाउन ने बिगाड़े दूध के रेट, पशुपालक परेशान

Tue, 29 Sep 2020 12:03 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Tue, 29 Sep 2020 12:03 AM IST
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lokadaun ne bigaade doodh ke ret, pashupaalak pareshaan
आटा के पिपरांया गांव में बंधे पशुपालकों के मवेशी। - फोटो : ORAI
आटा(जालौन)। कोरोना महामारी में दूध की बिक्री करने वाले खासे परेशान हैं। लॉकडाउन से दूध की खपत कम होने से पशु पालकों का दूध औने-पौने दामों में बिक रहा है। दूध कंपनियां भी कम दाम पर खरीद कर रही हैं। इससे पशुपालकों को मवेशियों के लिए दाने और चारे का इंतजाम करना मुश्किल हो रहा है।
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आटा इलाके में कदौरा ब्लॉक के कुछ गांवों में बड़े पैमाने पर दूध उत्पादन होता है। पशु पालक दूध बेचकर परिवार का भरण पोषण करते हैं। बच्चों की पढ़ाई लिखाई के साथ दूसरे जरूरी कामों का खर्च भी दूध बिक्री से पूरा होता है। कोरोना काल में दूध के धंधे में ग्रहण लग गया है। पशु पालकों ने बताया कि महंगे दामों में पशु खरीदकर दूध का व्यवसाय शुरू किया था। इससे घर का खर्च चल जाता था। लॉकडाउन के चलते दूध के काम में घाटा हो रहा है। हालत यह है कि दूधिया व डेरी संचालक अपनी मर्जी से पशुपालकों से कम दामों मे दूध की खरीदकर शहर में ऊंचे दामों में बेच रहे हैं। पशु पालक घाटे में हैं। वहीं दूधिया और डेयरी संचालक मुनाफा कमा रहे हैं।
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पशु पालकों ने बयां किया दर्द
पिपरायां के रामवीर ने बताया कि लॉकडाउन के पहले गांव में दूध की बिक्री 35 से 40 रुपये तक होती थी। अनलॉक में दूध के दाम नहीं बढ़े। शहर तक दूध ले जाने वाले दूधिया 30 से 35 रुपये में दूध खरीद रहे हैं। इससे मवेशियों के चारा, दाने का भी खर्च नहीं निकल रहा है। पशु पालकों को कुछ नहीं बच रहा है। इससे पशुपालक खासे परेशान हैं।
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पांडेपुर निवासी पप्पू यादव ने बताया कि दूध बेचकर घर का भरण पोषण कर रहे हैं। बच्चों को पढ़ा लिखा रहे हैं। दूध के उचित रेट न मिलने से मवेशियों को खिलाने में दिक्कत आ रही है। घर के खर्चे को मोहताज हो जाते हैं। गांव में दूध डेयरी संचालक को मजबूरी में कम दामों पर दूध देकर अपने घर का भरण पोषण करते हैं।

अकोढ़ी निवासी सोनू ने बताया कि लॉकडाउन में गिरे दूध के दाम ऊपर नहीं चढ़ रहे हैं। इससे खासी परेशानी हो रही है। दूधिया रेट बढ़ाने के लिए तैयार नहीं हैं। इससे दिक्कत हो रही है। वह कहते हैं कि सही रेट न मिलने से घर में ही मजबूरी में दूध से घी बना रहे हैं। इससे कि घाटे को पूरा किया जा सके। समस्या का निराकरण जरूरी है।
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