{"_id":"5dffbdf58ebc3e87f34d7efe","slug":"a-little-angel-came-to-my-house-on-the-chariot-of-moonlight-orai-news-knp533841532","type":"story","status":"publish","title_hn":"मेरे घर आई इक नन्हीं परी, चांदनी के रथ.....","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मेरे घर आई इक नन्हीं परी, चांदनी के रथ.....
विज्ञापन
बच्ची का माथा चूमती स्मिता
- फोटो : ORAI
उरई (जालौन)। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारे के साथ हाथों में तख्ती बैनर लेकर तो बहुत लोग दिख जाते हैं। पर असल जिंदगी में इस नारे को अमल में लाने वाले कम ही दिखते हैं। शहर के राजमार्ग स्थित लाइफ लाइन अस्पताल में रविवार को कुछ ऐसा नजारा तब दिखा, जब एक मजदूर की पत्नी ने अपनी पांचवीं बेटी को जन्म दिया तो उनके आगे बेटी की परवरिश किसी चुनौती से कम नहीं थी, तभी न जाने कहां से जानकारी पाकर रेलवेकर्मी पति और उनकी शिक्षिका पत्नी अस्पताल पहुंचे और उन्होंने झट से मजदूर दंपति के बोझ को अपने सीने से लगाने का फैसला कर लिया।
शिक्षिका ने बच्ची को गोद लेने की इच्छा जताई तो मजदूर दंपति भी सहमत हो गया। शिक्षिका का कहना है कि उनके लिए यह बेटी किसी परी से कम नहीं है। शादी के 11 साल के बाद भी कोई संतान नहीं है। कई लोगों ने अपने बेटे, बेटी गोद देना चाहा, पर ठान रखा था कि किसी जरूरतमंद की बच्ची को गोद लेकर न सिर्फ उस बच्ची का जीवन संवारेंगे बल्कि अपने घर को भी खुशियों से भरेंगे। शहर के मोहल्ला रामनगर निवासी रेलवेकर्मी गोपाल कृष्ण की पत्नी स्मिता डकोर ब्लाक में शिक्षिका हैं।
दोनों की शादी 2008 में हुई थी, पर कोई संतान नहीं है। गोपाल भी अपने पिता की इकलौती संतान हैं। रविवार को गोपाल को पता चला कि लाइफ लाइन अस्पताल में गरीब मजदूर परिवार की महिला को पांचवीं बच्ची हुई है और वह परवरिश करने में असमर्थ है। गोपाल पत्नी संग अस्पताल पहुंचे और तीन दिन पहले पैदा हुई बच्ची को गले से लगाकर अपनाने की बात कही। अस्पताल के प्रबंधक वीर प्रताप सिंह ने भी पुलिस को मामले की जानकारी देकर बच्ची के गोद लेने की कार्रवाई शुरू कराई।
विज्ञापन
स्मिता ने बताया कि वो न सिर्फ बेटी गोद लेना चाहती थी, बल्कि ऐसे परिवार की ही बेटी चाहती थी, जो परवरिश करने में समर्थ न हो। सोचा आखिर वे स्वयं एक शिक्षिका हैं, फिर बेटी भी गोद लेनी है तो क्यों न ऐसी बेटी को गोद लिया जिससे वाकई बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा सार्थक हो सके। स्मिता व कृष्ण गोपाल का कहना है कि बड़े होकर अपनी नन्हीं परी क्या बनेगी यह तो नहीं कह सकते, लेकिन इतना जरूर कहेंगे कि पढ़ाई हो या खेल का मैदान जिस किसी में बेटी की रुचि होगी, उसमें उसे अव्वल करने में हम पति पत्नी कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
बिटिया कुछ बन जाए और क्या चाहिए
सीने पर पत्थर रखकर अपने कलेजे का टुकड़ा स्मिता की गोद में थमाने वाली मजदूर की पत्नी की आंखें भी आंसुओं से नम थीं। भरे गले से उसकी जुबां से सिर्फ इतना ही निकला कि अच्छे घर में जा रही है, कुछ बन जाए और हम क्या चाहेंगे। बेटी तो होती ही पराया धन है।
तिरुपति में कराएंगे श्रीजी का मुंडन संस्कार
बच्ची को पाकर चहक रहे गोपाल और स्मिता ने बताया कि एक बच्चे के लिए कहां कहां नहीं भटके, अब मनचाही मुराद पूरी है। बेटी का नाम श्रीजी रखते हुए कहा कि मन्नत मानी थी सो अब इस बच्ची का मुंडन संस्कार कराने वे दोनों तिरुपति बालाजी जरूर जाएंगे।
विज्ञापन
शिक्षिका ने बच्ची को गोद लेने की इच्छा जताई तो मजदूर दंपति भी सहमत हो गया। शिक्षिका का कहना है कि उनके लिए यह बेटी किसी परी से कम नहीं है। शादी के 11 साल के बाद भी कोई संतान नहीं है। कई लोगों ने अपने बेटे, बेटी गोद देना चाहा, पर ठान रखा था कि किसी जरूरतमंद की बच्ची को गोद लेकर न सिर्फ उस बच्ची का जीवन संवारेंगे बल्कि अपने घर को भी खुशियों से भरेंगे। शहर के मोहल्ला रामनगर निवासी रेलवेकर्मी गोपाल कृष्ण की पत्नी स्मिता डकोर ब्लाक में शिक्षिका हैं।
विज्ञापन
दोनों की शादी 2008 में हुई थी, पर कोई संतान नहीं है। गोपाल भी अपने पिता की इकलौती संतान हैं। रविवार को गोपाल को पता चला कि लाइफ लाइन अस्पताल में गरीब मजदूर परिवार की महिला को पांचवीं बच्ची हुई है और वह परवरिश करने में असमर्थ है। गोपाल पत्नी संग अस्पताल पहुंचे और तीन दिन पहले पैदा हुई बच्ची को गले से लगाकर अपनाने की बात कही। अस्पताल के प्रबंधक वीर प्रताप सिंह ने भी पुलिस को मामले की जानकारी देकर बच्ची के गोद लेने की कार्रवाई शुरू कराई।
विज्ञापन
स्मिता ने बताया कि वो न सिर्फ बेटी गोद लेना चाहती थी, बल्कि ऐसे परिवार की ही बेटी चाहती थी, जो परवरिश करने में समर्थ न हो। सोचा आखिर वे स्वयं एक शिक्षिका हैं, फिर बेटी भी गोद लेनी है तो क्यों न ऐसी बेटी को गोद लिया जिससे वाकई बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा सार्थक हो सके। स्मिता व कृष्ण गोपाल का कहना है कि बड़े होकर अपनी नन्हीं परी क्या बनेगी यह तो नहीं कह सकते, लेकिन इतना जरूर कहेंगे कि पढ़ाई हो या खेल का मैदान जिस किसी में बेटी की रुचि होगी, उसमें उसे अव्वल करने में हम पति पत्नी कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
बिटिया कुछ बन जाए और क्या चाहिए
सीने पर पत्थर रखकर अपने कलेजे का टुकड़ा स्मिता की गोद में थमाने वाली मजदूर की पत्नी की आंखें भी आंसुओं से नम थीं। भरे गले से उसकी जुबां से सिर्फ इतना ही निकला कि अच्छे घर में जा रही है, कुछ बन जाए और हम क्या चाहेंगे। बेटी तो होती ही पराया धन है।
तिरुपति में कराएंगे श्रीजी का मुंडन संस्कार
बच्ची को पाकर चहक रहे गोपाल और स्मिता ने बताया कि एक बच्चे के लिए कहां कहां नहीं भटके, अब मनचाही मुराद पूरी है। बेटी का नाम श्रीजी रखते हुए कहा कि मन्नत मानी थी सो अब इस बच्ची का मुंडन संस्कार कराने वे दोनों तिरुपति बालाजी जरूर जाएंगे।