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संघर्ष के साथ अपनों के सपनों से किया प्यार

Sat, 09 Feb 2019 12:10 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sat, 09 Feb 2019 12:10 AM IST
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संघर्ष के साथ अपनों के सपनों से किया प्यार
उरई। किसी को चाहना और उसे पाने का काम तो कोई भी कर सकता है लेकिन खुली आंखों से देखे गए सपनों को पूरा करना हर एक के बस की बात नहीं है। कुछ ऐसे लोग हम सबके बीच भी हैं, जिन्होंने अपनों के सपनों को पूरा करने के लिए खुद की भी इच्छाओं की परवाह नहीं की, किसी ने अपने बच्चों को तो किसी ने अपने माता पिता के सपने को पूरा करने के लिए संघर्षों की ऐसी कहानी गढ़ी, जिसे सुनकर कोई भी कह सकता है कि इंसान यदि अपनों के सपनों से प्यार करे तो उसे पूरा करने में कोई भी समस्या बाधा नहीं बन सकती है। इसलिए यह कहने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि हमारी देशी संस्कृति में रचे बसे अपनों के सपनों से भी प्यार करने वाले लोग मौजूद है और उनके सामने विदेशी वैलेंटाइन कहीं टिक भी नहीं पाता है। बस जरूरत है तो उस एहसास की जिसे हम विदेशी वैलेंटाइन के लिए महसूस करते हैं, यही एहसास यदि हम अपनों के सपनों के लिए पैदा कर ले तो घर, समाज ही नहीं देश में खुशहाली आ सकती है।
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बेटे को लेफ्टिनेंट बनाने की थी धुन सवार
उरई के तुलसी नगर निवासी एलआईसी एजेंट हरि बाबू शुक्ला ने अपने बेटे राहुल के सपने को अपने अरमानों से अधिक प्यार किया। हरि के मुताबिक बेटा सेना में जाना चाहता था और उनकी भी इच्छा भी थी कि परिवार से कोई सेना में जाकर देश की सेवा करें। फिर क्या था, पत्नी राखी ने कंधा मिलाकर साथ दिया और बेटे ने भी किताबों को ही अपना साथी बना लिया।
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फिर हम पति पत्नी ने अपनी सभी खुशियों को बेटे के सपनों पर न्यौछावर करना शुरू कर दिया। अच्छी तरह याद है कि अटैची उठाकर दिन भर बाइक में किक मारते जूते तक फट जाते थे, लेकिन नई खरीदने के बजाए उसे ही ठीक कराकर काम चलाते थे। पत्नी ने भी दो तीन साल तक कोई नई साड़ी नहीं खरीदी। आखिर में हमारी तपस्या रंग लाई और 2018 में राहुल ने सेना में लेफ्टिनेंट से ज्वाइनिंग की। आज राहुल सिक्किम में तैनात है, लेकिन हम माता पिता का सिर गर्व से ऊंचा है और हम अपनी उन सभी दिक्कतों को भूल भी गए।
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कैसेट की दुकान से रिसोर्ट तक का सफर
छोटे से मौखरी गांव में रहने वाले सुरेंद्र सिंह के पिता रघुवीर सिंह साधारण किसान रहे हैं। कभी फुटपाथ पर बैठकर कैसेट की छोटी सी दुकान करने वाले सुरेंद्र के बारे में कम ही लोगों ने सोचा था कि एक दिन उनके पास अपना एक रिसोर्ट, एक गेस्ट भी हाउस होगा। सुरेंद्र का कहना है कि वे घर के सबसे छोटे थे, पापा मम्मी दोनों चाहते थे वह कुछ बन जाए और परिवार की तकलीफें कम हो, बाईपास के पास स्थित खेत से इतनी पैदावार भी नहीं थी कि परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरती।

जैसे तैसे पढ़ाई की, फिर वकालत भी की लेकिन कोई लाइन नहीं मिली तो सन 2000 में गोपालगंज में छोटी से कैसेट की दुकान खोल ली। मुफलिसी के ही दौर में 2003 में संध्या से शादी हुई। माता पिता के सपनों को पूरा करने में पत्नी का भी साथ मिला। इसके बाद राजनीति में भाग्य अजमाया, जिला पंचायत का उपचुनाव 2014 में जीता। फिर अगला चुनाव पत्नी ने जीता और आज जब हाईवे के किनारे अपना रिसोर्ट और एक गेस्ट हाउस बना तो वाकई याद आता है कि पापा, मम्मी कहते थे बड़ा होकर नाम करेगा।

बेटे को डीएम बनाकर ही लिया दम
कालपी के आलमपुर निवासी जयकिशन यादव और उनकी पत्नी सरला यादव के बेटे मानवेंद्र (वर्तमान में असम के धेमाजी जिले के डीएम हैं) के लिए भले ही किसी ने कुछ न सोचा हो लेकिन मानवेंद्र का सपना था कि एक दिन जीवन में वह मुकाम हासिल करना हैै, जहां पहुंचने के बाद लोग उनके माता पिता को देखे तो कहे कि वह देखों मानवेंद्र माता पिता जा रहे हैं। बस बेटे मानवेंद्र के इस सपने को साकार करने के लिए दोनों पति पत्नी ने कमर भी कस ली। एक छोटी सी प्राइवेट नौकरी के सहारे तीन बड़ी बेटियों की शादी करना और फिर बेटे मानवेंद्र को कुछ बनाना आसान नहीं था, फिर भी जयकिशन ने एक दिन में दो दो नौकरियां रात दिन की और मानवेंद्र को पढ़ाया।


साथ ही साथ जब जहां कोई रिश्ता मिला तो बेटियों के भी हाथ पीले करते गए। फिर 2012 में वह वक्त भी आया जब मानवेंद्र ने आईएएस की परीक्षा पास की, आज जयकिशन दुनिया में नहीं है, लेकिन उनकी पत्नी सरला जब भी उनके संघर्ष की बात की जाती है तो उनकी आंखे आंसुओं से डबडबा जाती हैं। सरला का कहना है कि पांचों बच्चों को भरपेट खिलाकर हम पति पत्नी अक्सर भूखे भी सो जाया करते थे, लेकिन बच्चों के सपनों को अपनी आंखों से देखते थे और जागते ही उन्हें पूरा करने के लिए फिर से दूने उत्साह के साथ जुट जाते थे। जिस दिन मानवेंद्र आईएएस बना उस दिन हम पति पत्नी को लगा कि हमने अपनी संतान और उसके सपनों को उनकी मंजिल तक पहुंचाकर ही दम लिया और जीत के भाव हमारे चेहरों पर थे। यह बात और है कि साल 2016 में मानवेंद्र के पिता का निधन हो गया लेकिन मानू के सम्मान को देख लगता है कि हमारा जीवन सार्थक हो गया।
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