नोटबंदी का एक साल, बेरंग गुलाल, बेस्वाद दाल

अमर उजाला ब्यूरो हाथरस।  Updated Tue, 07 Nov 2017 11:52 PM IST
One year of banquoep, colorless gulal, tasteless dal
नोट - फोटो : self
नोटबंदी के बाद पटरी से उतरे हाथरस के प्रमुख उद्योग-धंधों में से कुछ तो अब पटरी पर लौट आए हैं, जबकि कुछ अभी तक इसकी मार झेल रहे हैं। बात चाहे रंग-गुलाल की हो, हींग, मेटल या फिर दाल उद्योग की। शुरुआत में नोटबंदी के चलते इन उद्योगों में पूंजी का प्रवाह रुका तो इनके उत्पादन पर भी इसका असर देखने को मिला।
शुरुआती छह महीनों तक तो इन उद्योग-धंधों में उत्पादन में 60 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई थी, लेकिन उसके बाद के छह महीनों में कुछ उद्योगों की स्थिति तेजी से सामान्य हुई है, जबकि दाल और मेटल जैसे उद्योग आज भी नोटबंदी की मार से नहीं उबर पाए हैं। रही-सही कसर जीएसटी ने पूरी कर दी है। नोटबंदी से उपजी करेंसी की किल्लत ने इन उद्योगों के लिए माल की आवाजाही अभी तक बाधित कर रखी है। उद्यमियों को उत्पादन के लिए जरूरत के हिसाब से माल जुटा पाना मुश्किल हो रहा है। ऑनलाइन पेमेंट के साधन इनके लिए पूरी तरह मददगार साबित नहीं हो रहे।


नफा-नुकसान पर व्यापारियों की मिली जुली राय 

एक हजार और 500 के पुराने नोटों की बंदी को आज एक साल हो गया है। नोटबंदी ने जिले के कारोबार की गाड़ी की रफ्तार पर ऐसा ब्रेक लगाया था, जिससे आज तक यह उबर नहीं सका है। हालांकि कुछ कारोबारियों की मानें तो अब हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं। नोटबंदी से उपजी समस्याएं उतनी असरदार नहीं रहीं, जितनी शुरुआत के दो-तीन महीनों तक रही थीं, जबकि कुछ कारोबारियों की राय में नोटबंदी ने उन्हें जबर्दस्त चोट पहुंचाई है। कारोबार 40 से 50 फीसदी तक कम रह गया है। उत्पादन में भी जबर्दस्त गिरावट आई है और बाजार में माल की मांग भी पहले से 40 फीसदी तक कम हुई है। यहां तक कि दिवाली जैसे त्योहार पर भी बाजारों में उम्मीद से कम बिकवाली रही। लोगों ने केवल त्योहार की रस्म अदायगी के उद्देश्य से ही चीजों की खरीदारी की। 

छोटे कारोबारी कहते हैं कि नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी ने व्यापार का ढर्रा बिगाड़कर रख दिया है। त्योहार के लिए उन्होंने माल का जो स्टॉक किया था, उसे खपाना भी इस बार मुश्किल पड़ गया। लोग खरीदारी में हाथ सिकोड़ते नजर आए। कारोबारियों के सामने बड़े लेन-देन और ट्रांजेक्शन की समस्या अब भी खड़ी है। अभी तक  नकद लेन-देन सुचारु नहीं है, जबकि ऑनलाइन पेमेंट की व्यवस्थाएं भी पूरी तरह कारगर नहीं हैं। इसका सीधा असर माल की खरीद-फरोख्त पर पड़ रहा है और कारोबारी   जरूरत के हिसाब से माल नहीं मंगवा पा रहे।

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