कारोबार: हाथरस में नहीं बनी प्रयोगशाला, कैसे पता चले- खरी है हींग
लगभग तीन साल पहले शासन ने यहां प्रयोगशाला स्थापित करने की स्वीकृति भी प्रदान कर दी, लेकिन तब से इसकी प्रक्रिया फाइलों में ही अटकी हुई है। हालात ये हैं कि वर्तमान में सिर्फ अनुभव व खुशबू के आधार पर हींग की गुणवत्ता का आकलन किया जा रहा है।
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हींग उद्योग की वजह से हाथरस की देश भर में पहचान है, लेकिन इस उद्योग को आगे बढ़ाने की योजनाएं सुस्त रफ्तार से चल रही हैं। तीन साल पहले स्वीकृति मिलने के बावजूद जिले में हींग की गुणवत्ता की जांच के लिए प्रयोगशाला स्थापित नहीं हो सकी है।
अफगानिस्तान, ताजिकिस्तान और ईरान सहित कई देशों में पैदा होने वाली कच्ची हींग की 80 फीसदी खपत भारत में होती है। देश में खपने वाली 50 फीसदी से अधिक हींग हाथरस में खाने योग्य बनाई जाती है, लेकिन इसकी गुणवत्ता का परीक्षण कराए जाने के लिए प्रयोगशाला अभी तक स्थापित नहीं की जा सकी है, जबकि एक जिला-एक उत्पाद (ओडीओपी) में हींग को शामिल किए हुए करीब सात साल बीत चुके हैं।
जिले में हींग तैयार करने छोटी-बड़ी करीब 110 इकाइयां हैं। देश के आम लोगों के साथ ही दवा के कई कारखानों तक हाथरस से ही हींग पहुंचती है। मात्र 20 बड़ी यूनिट के साथ लगभग 90 छोटी इकाइयां और फर्में पूरे देश के साथ विदेश में भी हींग की आपूर्ति करती हैं, लेकिन जिले में हींग की गुणवत्ता की जांच के लिए अभी तक प्रयोगशाला की स्थापना नहीं की जा सकी है।
लगभग तीन साल पहले शासन ने यहां प्रयोगशाला स्थापित करने की स्वीकृति भी प्रदान कर दी, लेकिन तब से इसकी प्रक्रिया फाइलों में ही अटकी हुई है। हालात ये हैं कि वर्तमान में सिर्फ अनुभव व खुशबू के आधार पर हींग की गुणवत्ता का आकलन किया जा रहा है। फुटकर में हींग की खरीद करने वालों को हींग के प्रकार, उसके फायदे और पहचान के बारे में कोई जानकारी नहीं है। स्थानीय स्तर पर अगर प्रयोगशाला बन जाए तो कारोबारियों के साथ ग्राहकों को भी सहूलियत होगी।
हींग की गुणवत्ता की जांच के लिए अभी तक हाथरस में परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना नहीं हो सकी है, जबकि स्वीकृति मिलने के बाद हींग कारोबारियों ने अपने हिस्से की राशि के चेक भी दे दिए थे। जमीन के चयन की भी बात थी, लेकिन अब पता नहीं कि योजना कहां लंबित है।-मनोज अग्रवाल, पूर्व सचिव, हींग एसोसिएशन, हाथरस।
जिले में हींग परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना के लिए सभी कारोबारी पूरा सहयोग करने के लिए तैयार हैं। कुल दो करोड़ रुपये से इसकी स्थापना होनी थी। कारोबारी अपने हिस्से का 20 लाख रुपया तत्काल खर्च करने को तैयार हैं। प्रयोगशाला भविष्य की आवश्यकता को देखते हुए बननी चाहिए।-पंकज अग्रवाल, जिलाध्यक्ष, हींग एसोसिएशन, हाथरस।
पैदावार करने वाले देश व शहरों के नाम पर हींग के नाम
जिले में विदेशों से आने वाली हींग के नाम उन शहरों के नाम पर रखे गए हैं, जहां उसकी पैदावार होती है। जैसे अफगानिस्तान के मपार क्षेत्र की हींग को मपारी, पीनक की हींग को पीनकसीर, उज्बेकिस्तान की हींग को उज्बैकी, ताजिकिस्तान की हींग को तेजाकी व ईरान की हींग को हड्डा हींग नाम दिया गया है। इसके अलावा हीरा, हींगड़ा, किरमिस, चरास, नई जमीन, गलमीन, सियावड़ी व सीएच आदि कई प्रकार की हींग हाथरस आती है।
इस तरह होती है हींग की पहचान
- हड्डा हींग : पाचन तंत्र तेज करती है, खुशबू नहीं होती।
- तेजाकी हींग : अच्छी खुशबू देने वाली हींग। मियाद पांच साल से अधिक।
- उज्बैकी हींग : मीठी खुशबू देने वाली हींग। मियाद दो साल से अधिक।
- पीनकसीर हीग : बहुत अधिक तेज खुशबू वाली हींग। मियाद 10 साल से अधिक।
हींग उद्योग पर एक नजर
- 2018 जनवरी में ओडीओपी में शामिल हुआ हींग उद्योग।
- 2019 से लगातार की जा रही परीक्षण प्रयोगशाला की मांग।
- 2023 में शासन की ओर से दी गई प्रयोगशाला की स्थापना की स्वीकृति।
- 90 फीसदी कुल लागत का खर्चा शासन उठाएगा।
- 10 फीसदी खर्चा उद्यमियों को वहन करना होगा।
- 20 से अधिक हींग के बड़े कारखाने हैं जिले में।
- 90 से अधिक सूक्ष्म, मध्यम उद्यम व व्यापारिक फर्में हैं जनपद में स्थापित।