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हाथरस : चुनाव में मत प्रतिशत तय करेगा प्रत्याशियों की किस्मत
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गोविंद उपाध्याय, हाथरस।
विधानसभा चुनाव में जातिगत समीकरण, दल और प्रत्याशियों की छवि, क्षेत्रीय मुद्दों के साथ-साथ मतदान का प्रतिशत चुनाव में प्रत्याशियों की किस्मत तय करेगा। ऐसे में हर राजनीतिक दल की कोशिश है कि उसका परंपरागत वोटर वोट डालने जरूर डाले।
पहले कई विधानसभा चुनावों में कई बार बहुत मामूली अंतर से जीतकर कोई प्रत्याशी विधानसभा पहुंच गया तो कोई अपनी हार पर मंथन करता रह गया कि चूक कहां हुई। ऐसे में मुकाबले में शामिल हर प्रत्याशी चुनाव प्रचार के दौरान इसी बात को लेकर मतदाताओं को प्रेरित कर रहा है कि पहले मतदान और फिर जलपान।
यदि पिछले विधानसभा चुनाव को देखें तो जिले में प्रदेश के साथ-साथ भाजपा की बयार चली। ऐसे में जिले में तीन में से दो सीटें भाजपा के खाते में गईं। एक सीट बसपा के पाले में आईं। उससे पिछले वर्ष 2012 के चुनाव में भाजपा हाशिए पर रही थी और दो सीटें बसपा और एक सीट सपा के खाते में आई थी।
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यदि हर विधानसभा सीट के चुनाव इतिहास पर नजर डालें तो कई बार ऐसा हुआ है कि मतदान के प्रतिशत ने चुनाव परिणाम पर अहम भूमिका निभाई है। जिस पार्टी का परंपरागत वोट ज्यादा पड़ गया। वह प्रत्याशी विजयश्री हासिल कर गया। संवाद
कई बार महज चंद वोटों से हो गया उलटफेर
जिले में यदि चुनाव परिणाम देखें तो कई बार ऐसा हुआ है कि जीत-हार का अंतर एक या दो प्रतिशत रहा है और चंद वोटों से जीत-हार हुई है। इसमें अब तक सबसे कम जीत का अंतर 76 वोट रहा है। सादाबाद के वर्ष 2002 के चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल के प्रताप चौधरी ने महज 76 वोटों से चुनाव में डॉ. अनिल चौधरी को पराजित कर दिया था।
इसी सीट पर 1993 में जनता दल से विशंभर सिंह और सपा से भूप सिंह आमने-सामने लड़े तो विशंभर सिंह महज 427 वोटों से जीते। हाथरस विधानसभा चुनाव में इमरजेंसी के बाद वर्ष 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की लहर चल रही थी।
हाथरस सदर सीट पर जनता पार्टी से रामसरन सिंह और कांग्रेस से प्रेमचंद्र शर्मा के बीच कांटे की टक्कर थी। रामसरन सिंह महज महज 556 वोटों से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गए। वर्ष 1993 के चुनाव में हाथरस सदर सीट से भाजपा के राजवीर सिंह व बसपा के हिलाल अहमद कुरैशी के मध्य कांटे का मुकाबला हुआ।
राजवीर सिंह महज 748 वोटों से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गए। इस चुनाव में रामवीर उपाध्याय निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में तीसरे नंबर पर रहे। सिकंदराराऊ सीट पर वर्ष 2012 में बड़ा दिलचस्प मुकाबला हुआ। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय हाथरस सीट सुरक्षित हो जाने की वजह से सिकंदराराऊ से चुनावी मैदान में थे। बसपा से रामवीर उपाध्याय और सपा से यशपाल सिंह चौहान के मध्य कांटे की टक्कर हुई। रामवीर उपाध्याय 1063 वोटों से चुनाव जीत गए। संवाद
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विधानसभा चुनाव में जातिगत समीकरण, दल और प्रत्याशियों की छवि, क्षेत्रीय मुद्दों के साथ-साथ मतदान का प्रतिशत चुनाव में प्रत्याशियों की किस्मत तय करेगा। ऐसे में हर राजनीतिक दल की कोशिश है कि उसका परंपरागत वोटर वोट डालने जरूर डाले।
पहले कई विधानसभा चुनावों में कई बार बहुत मामूली अंतर से जीतकर कोई प्रत्याशी विधानसभा पहुंच गया तो कोई अपनी हार पर मंथन करता रह गया कि चूक कहां हुई। ऐसे में मुकाबले में शामिल हर प्रत्याशी चुनाव प्रचार के दौरान इसी बात को लेकर मतदाताओं को प्रेरित कर रहा है कि पहले मतदान और फिर जलपान।
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यदि पिछले विधानसभा चुनाव को देखें तो जिले में प्रदेश के साथ-साथ भाजपा की बयार चली। ऐसे में जिले में तीन में से दो सीटें भाजपा के खाते में गईं। एक सीट बसपा के पाले में आईं। उससे पिछले वर्ष 2012 के चुनाव में भाजपा हाशिए पर रही थी और दो सीटें बसपा और एक सीट सपा के खाते में आई थी।
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यदि हर विधानसभा सीट के चुनाव इतिहास पर नजर डालें तो कई बार ऐसा हुआ है कि मतदान के प्रतिशत ने चुनाव परिणाम पर अहम भूमिका निभाई है। जिस पार्टी का परंपरागत वोट ज्यादा पड़ गया। वह प्रत्याशी विजयश्री हासिल कर गया। संवाद
कई बार महज चंद वोटों से हो गया उलटफेर
जिले में यदि चुनाव परिणाम देखें तो कई बार ऐसा हुआ है कि जीत-हार का अंतर एक या दो प्रतिशत रहा है और चंद वोटों से जीत-हार हुई है। इसमें अब तक सबसे कम जीत का अंतर 76 वोट रहा है। सादाबाद के वर्ष 2002 के चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल के प्रताप चौधरी ने महज 76 वोटों से चुनाव में डॉ. अनिल चौधरी को पराजित कर दिया था।
इसी सीट पर 1993 में जनता दल से विशंभर सिंह और सपा से भूप सिंह आमने-सामने लड़े तो विशंभर सिंह महज 427 वोटों से जीते। हाथरस विधानसभा चुनाव में इमरजेंसी के बाद वर्ष 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की लहर चल रही थी।
हाथरस सदर सीट पर जनता पार्टी से रामसरन सिंह और कांग्रेस से प्रेमचंद्र शर्मा के बीच कांटे की टक्कर थी। रामसरन सिंह महज महज 556 वोटों से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गए। वर्ष 1993 के चुनाव में हाथरस सदर सीट से भाजपा के राजवीर सिंह व बसपा के हिलाल अहमद कुरैशी के मध्य कांटे का मुकाबला हुआ।
राजवीर सिंह महज 748 वोटों से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गए। इस चुनाव में रामवीर उपाध्याय निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में तीसरे नंबर पर रहे। सिकंदराराऊ सीट पर वर्ष 2012 में बड़ा दिलचस्प मुकाबला हुआ। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय हाथरस सीट सुरक्षित हो जाने की वजह से सिकंदराराऊ से चुनावी मैदान में थे। बसपा से रामवीर उपाध्याय और सपा से यशपाल सिंह चौहान के मध्य कांटे की टक्कर हुई। रामवीर उपाध्याय 1063 वोटों से चुनाव जीत गए। संवाद