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हाथरस : बसपा के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले से बना रामवीर का सियासी कैरियर
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पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय को तिलक लगातीं पूर्व सीएम मायावती (फाइल फोटो)।
- फोटो : HATHRAS
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय ने भाजपा से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया, लेकिन भाजपा की राजनीति उन्हें रास नहीं आई। बसपा का सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला रामवीर उपाध्याय की राजनीति पर फिट बैठा। उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल और बसपा के परंपरागत वोटरों के दम पर जिले की ऐसी सीटों को भी बसपा की झोली में डाल दिया, जिनसे बसपा का कभी खाता भी नहीं खुला था। हालांकि बसपा और रामवीर जब अलग-अलग हुए तो जिले में न बसपा को फायदा हुआ और न रामवीर को। दोनो को नुकसान झेलना पड़ा।
बसपा में रहते हुए रामवीर उपाध्याय पार्टी सुप्रीमो मायावती के बेहद खास थे और संगठन से लेकर सरकार तक में उनकी तूती बोलती थी। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय के राजनीतिक सफर की चर्चा करें तो मुरसान ब्लॉक के गांव बामौली निवासी रामवीर उपाध्याय मेरठ में वकालत करते थे, लेकिन वर्ष 1990 में वह हाथरस में आ गए और यहां आकर राजनीति करने लगे। उन्होंने भाजपा से ही अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की। भाजपा की सदस्यता भी ग्रहण की और वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से टिकट की दावेदारी की, लेकिन जब भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो उन्होंने निर्दलीय किस्मत आजमाई। उस समय यह चुनाव उन्होंने कुर्सी चुनाव चिन्ह पर लड़ा।
क्षेत्र के ब्राह्मण मतदाताओं ंने उनका काफी समर्थन किया और उन्होंने 20 हजार से ज्यादा वोट पाकर इस चुनाव में उन्होंने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई। हालांकि इस चुनाव में जीत भाजपा के राजवीर सिंह पहलवान को मिली। तब तक बसपा का प्रदेश में दमदारी से उदय हो चुका था और बसपा को क्षेत्र में ऐसे चेहरे की तलाश थी, जोकि उसके सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर फिट बैठे।
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ऐसे में रामवीर उपाध्याय को बसपा ने हाथरस सीट से अपना उम्मीदवार बनाया। रामवीर उपाध्याय ने वर्ष 1996 में हाथरस सीट से चुनाव जीता। बसपा-भाजपा गठबंधन की सरकार में रामवीर पहली बार में कैबिनेट मंत्री बने। इसके बाद रामवीर को राजनीति में सफलता मिलती चली गई। इसके बाद वर्ष 2002, वर्ष 2007 में उन्होंने उन्होंने हाथरस सीट से विधायकी का चुनाव जीता। वह प्रदेश की बसपा सरकार में ऊर्जा, परिवहन, चिकित्सा शिक्षा जैसे विभागों के मंत्री भी रहे। वर्ष 2012 में जब हाथरस सीट सुरक्षित हुई तो उन्होंने अपनी सीट बदली और सिकंदराराऊ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। तब उन्होंने भाजपा के यशपाल सिंह चौहान को चुनाव हराया।
इसके अगले चुनाव में उन्होंने अपनी राजनीतिक भूमि सादाबाद बनाया। वर्ष 2017 में वह सादाबाद से चुनाव लड़े और उन्होंने रालोद के डॉ.अनिल चौधरी को परास्त किया। राजनीति के इस माहिर खिलाड़ी ने वर्ष 1996 से लेकर वर्ष 2017 तक लगातार पांच बार विधायकी का चुनाव जीता। हालांकि इस दौरान उनकी पार्टी एक ही रही। बसपा का सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला रामवीर उपाध्याय की राजनीति पर फिट बैठा। इसके बाद जनवरी 2022 में वह विधिवत रूप से भाजपा में शामिल हुए। भाजपा ने बीमार रहने के बाद भी उन्हें सादाबाद विस सीट से टिकट दिया, लेकिन इस बार रामवीर नहीं जीत सके और रामवीर का विजयरथ रालोद के प्रदीप उर्फ गुड्डू चौधरी ने रोक दिया। संवाद
पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय का राजनीति सफर एक नजर में
-वर्ष 1990 में हाथरस की राजनीति में प्रवेश और भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर टिकट की दावेदारी।
-वर्ष 1993 के चुनाव में भाजपा से टिकट न मिलने पर निर्दलीय लड़ा चुनाव और दमदार उपस्थिति दर्ज कराई।
-वर्ष 1996 में हाथरस विस सीट से बसपा से चुनाव लड़े और भाजपा के राजवीर सिंह पहलवान को चुनाव हराकर पहली बार विधायक बने और प्रदेश में कबीना मंत्री बने।
-वर्ष 2002 में दूसरी बार बसपा के टिकट पर हाथरस विस सीट से चुनाव लड़े और रालोद के उम्मीदवार देवस्वरूप शर्मा को चुनाव हराया।
-वर्ष 2007 में तीसरी बार हाथरस विस सीट से बसपा से विधायकी का चुनाव लड़े और रालोद के देवेंद्र अग्रवाल को चुनाव हराया।
-वर्ष 2012 में हाथरस सीट सुरक्षित होने के बाद रामवीर उपाध्याय बसपा के टिकट पर ही सिकंदराराऊ सीट से लड़े चुनाव। इस सीट से भी जीते और भाजपा के यशपाल सिंह चौहान को किया परास्त।
-वर्ष 2017 में फिर बसपा के टिकट पर सादाबाद सीट से लड़े चुनाव और इस बार रालोद के डॉ.अनिल चौधरी को हराया।
-वर्ष 2022 में भाजपा के टिकट पर सादाबाद से लड़े चुनाव और इस बार रालोद के प्रदीप उर्फ गुड्डू चौधरी से हो गए परास्त।
लोकसभा चुनाव में नहीं मिली सफलता
हाथरस। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय लगातार पांच चुनाव जीतकर विधानसभा तो पहुंचे, लेकिन लोकसभा चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली। वर्ष 1999 में उन्होंने बसपा के टिकट पर जलेसर लोकसभा सीट से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा, लेकिन इस सीट पर उन्हें सफलता नहीं मिली। वहां सपा के एसपी सिंह बघेल चुनाव जीते। संवाद
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पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय ने भाजपा से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया, लेकिन भाजपा की राजनीति उन्हें रास नहीं आई। बसपा का सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला रामवीर उपाध्याय की राजनीति पर फिट बैठा। उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल और बसपा के परंपरागत वोटरों के दम पर जिले की ऐसी सीटों को भी बसपा की झोली में डाल दिया, जिनसे बसपा का कभी खाता भी नहीं खुला था। हालांकि बसपा और रामवीर जब अलग-अलग हुए तो जिले में न बसपा को फायदा हुआ और न रामवीर को। दोनो को नुकसान झेलना पड़ा।
बसपा में रहते हुए रामवीर उपाध्याय पार्टी सुप्रीमो मायावती के बेहद खास थे और संगठन से लेकर सरकार तक में उनकी तूती बोलती थी। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय के राजनीतिक सफर की चर्चा करें तो मुरसान ब्लॉक के गांव बामौली निवासी रामवीर उपाध्याय मेरठ में वकालत करते थे, लेकिन वर्ष 1990 में वह हाथरस में आ गए और यहां आकर राजनीति करने लगे। उन्होंने भाजपा से ही अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की। भाजपा की सदस्यता भी ग्रहण की और वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से टिकट की दावेदारी की, लेकिन जब भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो उन्होंने निर्दलीय किस्मत आजमाई। उस समय यह चुनाव उन्होंने कुर्सी चुनाव चिन्ह पर लड़ा।
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क्षेत्र के ब्राह्मण मतदाताओं ंने उनका काफी समर्थन किया और उन्होंने 20 हजार से ज्यादा वोट पाकर इस चुनाव में उन्होंने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई। हालांकि इस चुनाव में जीत भाजपा के राजवीर सिंह पहलवान को मिली। तब तक बसपा का प्रदेश में दमदारी से उदय हो चुका था और बसपा को क्षेत्र में ऐसे चेहरे की तलाश थी, जोकि उसके सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर फिट बैठे।
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ऐसे में रामवीर उपाध्याय को बसपा ने हाथरस सीट से अपना उम्मीदवार बनाया। रामवीर उपाध्याय ने वर्ष 1996 में हाथरस सीट से चुनाव जीता। बसपा-भाजपा गठबंधन की सरकार में रामवीर पहली बार में कैबिनेट मंत्री बने। इसके बाद रामवीर को राजनीति में सफलता मिलती चली गई। इसके बाद वर्ष 2002, वर्ष 2007 में उन्होंने उन्होंने हाथरस सीट से विधायकी का चुनाव जीता। वह प्रदेश की बसपा सरकार में ऊर्जा, परिवहन, चिकित्सा शिक्षा जैसे विभागों के मंत्री भी रहे। वर्ष 2012 में जब हाथरस सीट सुरक्षित हुई तो उन्होंने अपनी सीट बदली और सिकंदराराऊ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। तब उन्होंने भाजपा के यशपाल सिंह चौहान को चुनाव हराया।
इसके अगले चुनाव में उन्होंने अपनी राजनीतिक भूमि सादाबाद बनाया। वर्ष 2017 में वह सादाबाद से चुनाव लड़े और उन्होंने रालोद के डॉ.अनिल चौधरी को परास्त किया। राजनीति के इस माहिर खिलाड़ी ने वर्ष 1996 से लेकर वर्ष 2017 तक लगातार पांच बार विधायकी का चुनाव जीता। हालांकि इस दौरान उनकी पार्टी एक ही रही। बसपा का सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला रामवीर उपाध्याय की राजनीति पर फिट बैठा। इसके बाद जनवरी 2022 में वह विधिवत रूप से भाजपा में शामिल हुए। भाजपा ने बीमार रहने के बाद भी उन्हें सादाबाद विस सीट से टिकट दिया, लेकिन इस बार रामवीर नहीं जीत सके और रामवीर का विजयरथ रालोद के प्रदीप उर्फ गुड्डू चौधरी ने रोक दिया। संवाद
पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय का राजनीति सफर एक नजर में
-वर्ष 1990 में हाथरस की राजनीति में प्रवेश और भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर टिकट की दावेदारी।
-वर्ष 1993 के चुनाव में भाजपा से टिकट न मिलने पर निर्दलीय लड़ा चुनाव और दमदार उपस्थिति दर्ज कराई।
-वर्ष 1996 में हाथरस विस सीट से बसपा से चुनाव लड़े और भाजपा के राजवीर सिंह पहलवान को चुनाव हराकर पहली बार विधायक बने और प्रदेश में कबीना मंत्री बने।
-वर्ष 2002 में दूसरी बार बसपा के टिकट पर हाथरस विस सीट से चुनाव लड़े और रालोद के उम्मीदवार देवस्वरूप शर्मा को चुनाव हराया।
-वर्ष 2007 में तीसरी बार हाथरस विस सीट से बसपा से विधायकी का चुनाव लड़े और रालोद के देवेंद्र अग्रवाल को चुनाव हराया।
-वर्ष 2012 में हाथरस सीट सुरक्षित होने के बाद रामवीर उपाध्याय बसपा के टिकट पर ही सिकंदराराऊ सीट से लड़े चुनाव। इस सीट से भी जीते और भाजपा के यशपाल सिंह चौहान को किया परास्त।
-वर्ष 2017 में फिर बसपा के टिकट पर सादाबाद सीट से लड़े चुनाव और इस बार रालोद के डॉ.अनिल चौधरी को हराया।
-वर्ष 2022 में भाजपा के टिकट पर सादाबाद से लड़े चुनाव और इस बार रालोद के प्रदीप उर्फ गुड्डू चौधरी से हो गए परास्त।
लोकसभा चुनाव में नहीं मिली सफलता
हाथरस। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय लगातार पांच चुनाव जीतकर विधानसभा तो पहुंचे, लेकिन लोकसभा चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली। वर्ष 1999 में उन्होंने बसपा के टिकट पर जलेसर लोकसभा सीट से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा, लेकिन इस सीट पर उन्हें सफलता नहीं मिली। वहां सपा के एसपी सिंह बघेल चुनाव जीते। संवाद