One District-One Dish: हाथरस की रबड़ी को मिलेगी अलग पहचान, सीएम योगी की घोषणा से कारोबारियों में उत्साह
हाथरस की रबड़ी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी बहुत पसंद थी, वे इसके मुरीद थे और कई बार यहां आकर इसका स्वाद ले चुके थे, खासकर हास्य सम्राट काका हाथरसी के आमंत्रण पर वे 1994 में हाथरस आए थे और यहां की रबड़ी का आनंद लिया था, इस बात का जिक्र उन्होंने मंच से भी किया था।
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जनपद हाथरस की प्रसिद्ध रबड़ी अब देश ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने की दिशा में अग्रसर है। मुख्यमंत्री द्वारा 'एक जनपद-एक व्यंजन योजना के अंतर्गत हाथरस की रबड़ी को शामिल किए जाने की घोषणा के बाद जिले के रबड़ी कारोबारियों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। इस योजना के तहत रबड़ी उद्योग को प्रोत्साहन, ब्रांडिंग और विपणन में सहयोग मिलने की उम्मीद है।
हाथरस की रबड़ी अपने विशिष्ट स्वाद, शुद्धता और पारंपरिक निर्माण विधि के लिए जानी जाती है। जनपद के शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी बड़ी संख्या में परिवार इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। यहां तैयार होने वाली रबड़ी की आपूर्ति न केवल स्थानीय बाजारों में ही नहीं बल्कि दिल्ली और आसपास के महानगरों तक की जाती है, जहां इसकी अच्छी मांग है। योजना के लागू होने से रबड़ी कारोबार से जुड़े कारीगरों और छोटे व्यापारियों को आर्थिक मजबूती मिलने की संभावना जताई जा रही है। इसके साथ ही उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखने और मानकीकरण के उद्देश्य से जनपद में गुणवत्ता जांच प्रयोगशाला स्थापित किए जाने पर भी विचार किया जा रहा है। इससे रबड़ी की शुद्धता और स्वाद को प्रमाणित किया जा सकेगा।
पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात सुविधा दिला सकती है पहचान
कारोबारियों का कहना है कि यदि सरकारी स्तर पर इस कारोबार को सही प्रकार से बढ़ावा मिले, जिसमें पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, तो हाथरस की रबड़ी अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच सकती है। हालांकि रबड़ी की मियाद अधिकतम 24 घंटे होती है, लेकिन अगर सुविधाएं दी जाएं तो इसके समय को बढ़ाया जा सकता है, इससे न केवल जिले की पहचान बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
300 से 360 रुपये के हैं दाम
जनपद में रबड़ी के दाम 300 रुपये प्रति किलो से लेकर 360 रुपये प्रति किलो तक हैं। शहरी क्षेत्र में रबड़ी करीब 360 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है। जबकि देहातों से दिल्ली आदि जाने वाली रबड़ी के थोक दाम गुणवत्ता के हिसाब से 300 से 350 रुपये किलो तक हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री को भी पंसद थी हाथरस की रबड़ी
हाथरस की रबड़ी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी बहुत पसंद थी, वे इसके मुरीद थे और कई बार यहां आकर इसका स्वाद ले चुके थे, खासकर हास्य सम्राट काका हाथरसी के आमंत्रण पर वे 1994 में हाथरस आए थे और यहां की रबड़ी का आनंद लिया था, इस बात का जिक्र उन्होंने मंच से भी किया था। एक कवि के रूप में भी अटलजी यहां कई मंचों पर आए। वर्ष 1994 में काका हाथरसी पुरस्कार समारोह में भी वह मुख्य अतिथि के रूप में आए थे। इस कार्यक्रम में उन्होंने डॉ. राकेश शरद व भगवत शरण शर्मा को काका हाथरसी पुरस्कार से सम्मानित किया था। इस दौरान पूर्व पालिकाध्यक्ष रमेशचंद्र आर्य के आवास पर रुके। भोजन में उन्हें हाथरस की रबड़ी पसंद आई थी। इससे पहले भी अटल जी यहां अक्सर आते रहते थे।

हमारे यहां करीब 50 साल से रबड़ी व खोवा का काम हो रहा है। हम लोग दिल्ली तक माल भिजवाते हैं, लेकिन यह काम काफी जटिल है। अगर सरकार इसे प्रोत्साहन देगी तो हमारा व हमारे जनपद का नाम और अधिक विख्यात होगा।-रविकांत गुप्ता, बाबा शादी लाल रबड़ी वाले, मेंडू।
हमरी रबड़ी व खोवा शहर की रबड़ी व खोवा से काफी अलग है, क्योंकि हम अपने माल के लिए दूध खुद ही कढ़वाते है, यानि हमारे लोग खुद अपने सामने आसपास के गांव से दूध लाते हैं, ताकि उसमें मिलावट न हो। मुख्यमंत्री की पहल से शुद्धता को भी बढ़ावा मिलेगा।-विनोद गुप्ता, लाला मुन्नी लाल रबड़ी वाले।