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हाथरस : आज से शुरू होंगे पितृपक्ष, होगा श्राद्ध तर्पण
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बल्लभजी महाराज। संवाद
- फोटो : HATHRAS
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
पितृ पक्ष हर वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से आरंभ होते हैं और अमावस्या तिथि तक रहते हैं। पितृ पक्ष शास्त्रों के अनुसार पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करने का समय है।
पुराणों में उल्लेख मिलता है कि यमराज भी इन-दिनों पितरों की आत्मा को मुक्त कर देते हैं, ताकि वह अपने परिजनों के बीच 15 दिनों तक रहकर श्राद्ध का अन्न, जल ग्रहण कर तृप्त हो सकें। इस बार सोमवार से पितृपक्ष की शुरुआत हो रही है, जो कि छह अक्तूबर तक चलेंगे।
भाद्र पूर्णिमा का श्राद्ध सोमवार को है। पूर्णिमा तिथि को ऋषि तर्पण तिथि भी कहा जाता है। पितृ पक्ष का महत्व हिंदू धर्म में खास होता है। मृत्यु के बाद भी हिंदू धर्म में पूर्वजों का समय-समय पर स्मरण किया जाता है और श्राद्ध पक्ष उन्हीं के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करने और उनके निमित्त दान करने का पर्व है।
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श्राद्ध में न करें ये काम
पितृपक्ष के दिनों में शुभ कार्य नहीं करने चाहिए। इस दौरान कोई वाहन व नया सामान न खरीदें। मांसाहार का सेवन बिल्कुल न करें। श्राद्ध कर्म के दौरान आप जनेऊ पहनते हैं तो पिंडदान के दौरान उसे बाएं की जगह दाएं कंधे पर रखें। श्राद्ध कर्मकांड करने वाले व्यक्ति को अपने नाखून नहीं काटने चाहिए।
इसके अलावा दाढ़ी और बाल नहीं कटवाने चाहिए। पूर्वजों को खुश करने के लिए सोने, चांदी, तांबे और पीतल के बर्तनों का उपयोग करें। श्राद्ध कर्म के लिए काले तिल का उपयोग करना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में गाय, कौआ, कुत्ता, चींटी और ब्राहमणों को भोजन कराना चाहिए। विधि-विधान से श्राद्ध करने पर पितृऋण से मुक्ति मिलती है।
ये हैं आज श्राद्ध तर्पण की तिथियां
प्रतिपदा का श्राद्ध 21 सितंबर, द्वितीय का श्राद्ध 22 को, तृतीया का श्राद्ध 23 को, चतुर्थी का श्राद्ध 24 को, पंचमी का श्राद्ध 25 व 26 सितंबर को होगा। षष्ठी का श्राद्ध 27 को, सप्तमी का 28 को, अष्टमी का श्राद्ध 29 को, नवमी का श्राद्ध 30 को, एकादशी का श्राद्ध दो अक्तूबर, द्वादशी का श्राद्ध तीन अक्तूबर, त्रियोदशी का श्राद्ध चार अक्तूबर, चतुर्दशी का श्राद्ध पांच अक्तूबर को तर्पण होगा। अमावस्या का श्राद्ध छह अक्तूबर को होगा।
- शास्त्रों के अनुसार बड़े पुत्र व सबसे छोटे पुत्र को श्राद्ध करने का अधिकार है। इसके अलावा विशेष परिस्थितियों में किसी पुत्र को श्राद्ध करने का अधिकार है। श्राद्ध के दौरान कुश की घास से बनी अंगूठी पहनें। पिंडदान के एक भाग के रूप में जौ के आटे, तिल और चावल से बने गोलाकार पिंड भेंट करें। जो तिथि दोपहर को 12 बजे होती है, उस तिथि का श्राद्ध उसी दिन किया जाता है। इस बार श्राद्ध पूरे 16 दिन रहेंगे।
- बल्लभ जी महाराज, धर्माचार्य
- पितृपक्ष के दौरान सभी पूर्वज परिजनों को अशीर्वाद देने पृथ्वी पर आते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए तर्पण के लिए श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है। जो लोग पूर्वजों का पिंडदान नहीं करते, उन्हें पितृऋण व पितृदोष सहना पड़ता है। प्रतिपदा का श्राद्ध मंगलवार को होगा। पूर्णिमा का श्राद्ध द्वादशी तीन अक्तूबर को होगा मान्य होगा। - सुरेंद्रनाथ चतुर्वेदी, धर्माचार्य
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पितृ पक्ष हर वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से आरंभ होते हैं और अमावस्या तिथि तक रहते हैं। पितृ पक्ष शास्त्रों के अनुसार पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करने का समय है।
पुराणों में उल्लेख मिलता है कि यमराज भी इन-दिनों पितरों की आत्मा को मुक्त कर देते हैं, ताकि वह अपने परिजनों के बीच 15 दिनों तक रहकर श्राद्ध का अन्न, जल ग्रहण कर तृप्त हो सकें। इस बार सोमवार से पितृपक्ष की शुरुआत हो रही है, जो कि छह अक्तूबर तक चलेंगे।
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भाद्र पूर्णिमा का श्राद्ध सोमवार को है। पूर्णिमा तिथि को ऋषि तर्पण तिथि भी कहा जाता है। पितृ पक्ष का महत्व हिंदू धर्म में खास होता है। मृत्यु के बाद भी हिंदू धर्म में पूर्वजों का समय-समय पर स्मरण किया जाता है और श्राद्ध पक्ष उन्हीं के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करने और उनके निमित्त दान करने का पर्व है।
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श्राद्ध में न करें ये काम
पितृपक्ष के दिनों में शुभ कार्य नहीं करने चाहिए। इस दौरान कोई वाहन व नया सामान न खरीदें। मांसाहार का सेवन बिल्कुल न करें। श्राद्ध कर्म के दौरान आप जनेऊ पहनते हैं तो पिंडदान के दौरान उसे बाएं की जगह दाएं कंधे पर रखें। श्राद्ध कर्मकांड करने वाले व्यक्ति को अपने नाखून नहीं काटने चाहिए।
इसके अलावा दाढ़ी और बाल नहीं कटवाने चाहिए। पूर्वजों को खुश करने के लिए सोने, चांदी, तांबे और पीतल के बर्तनों का उपयोग करें। श्राद्ध कर्म के लिए काले तिल का उपयोग करना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में गाय, कौआ, कुत्ता, चींटी और ब्राहमणों को भोजन कराना चाहिए। विधि-विधान से श्राद्ध करने पर पितृऋण से मुक्ति मिलती है।
ये हैं आज श्राद्ध तर्पण की तिथियां
प्रतिपदा का श्राद्ध 21 सितंबर, द्वितीय का श्राद्ध 22 को, तृतीया का श्राद्ध 23 को, चतुर्थी का श्राद्ध 24 को, पंचमी का श्राद्ध 25 व 26 सितंबर को होगा। षष्ठी का श्राद्ध 27 को, सप्तमी का 28 को, अष्टमी का श्राद्ध 29 को, नवमी का श्राद्ध 30 को, एकादशी का श्राद्ध दो अक्तूबर, द्वादशी का श्राद्ध तीन अक्तूबर, त्रियोदशी का श्राद्ध चार अक्तूबर, चतुर्दशी का श्राद्ध पांच अक्तूबर को तर्पण होगा। अमावस्या का श्राद्ध छह अक्तूबर को होगा।
- शास्त्रों के अनुसार बड़े पुत्र व सबसे छोटे पुत्र को श्राद्ध करने का अधिकार है। इसके अलावा विशेष परिस्थितियों में किसी पुत्र को श्राद्ध करने का अधिकार है। श्राद्ध के दौरान कुश की घास से बनी अंगूठी पहनें। पिंडदान के एक भाग के रूप में जौ के आटे, तिल और चावल से बने गोलाकार पिंड भेंट करें। जो तिथि दोपहर को 12 बजे होती है, उस तिथि का श्राद्ध उसी दिन किया जाता है। इस बार श्राद्ध पूरे 16 दिन रहेंगे।
- बल्लभ जी महाराज, धर्माचार्य
- पितृपक्ष के दौरान सभी पूर्वज परिजनों को अशीर्वाद देने पृथ्वी पर आते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए तर्पण के लिए श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है। जो लोग पूर्वजों का पिंडदान नहीं करते, उन्हें पितृऋण व पितृदोष सहना पड़ता है। प्रतिपदा का श्राद्ध मंगलवार को होगा। पूर्णिमा का श्राद्ध द्वादशी तीन अक्तूबर को होगा मान्य होगा। - सुरेंद्रनाथ चतुर्वेदी, धर्माचार्य