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हाथरस : रामवीर भी सादाबाद की सीट को नही डाल पाए भाजपा की झोली में
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हाथरस में मतगणना का लाइव प्रसारण देखते भाजपाई। संवाद
- फोटो : HATHRAS
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस।
तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा इस बार भी सादाबाद सीट पर जीत हासिल नहीं कर पाई। इस सीट को जीतने के लिए भाजपा ने सभी कोशिशें की। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय को अपने पाले में लाकर दांव लगाया, लेकिन यहां सपा-रालोद गठबंधन की रणनीति सफल रही और भाजपा को इस सीट पर फिर से पराजय देखनी पड़ी। वैसे रालोद को फिर से इस सीट पर जीत हासिल हुई है और पार्टी ने एक तरह से अपनी खोई हुई जमीन प्राप्त कर ली है।
उल्लेखनीय है कि सादाबाद सीट पर भाजपा की विशेष नजर थी। इसकी मुख्य वजह यह थी कि पिछली बार जब पूरे प्रदेश में भाजपा की सुनामी चली थी। तब भी भाजपा इस सीट को नहीं जीत पाई थी और इस सीट से भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी।
ऐसे में भाजपा ने इस सीट पर दमदार उम्मीदवार के रूप में पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय को अपने पाले में लिया। अस्वस्थ होने के बाद भी पार्टी ने उन्हें टिकट दिया। भाजपा के आला पदाधिकारियों ने घर जाकर उन्हें सदस्यता ग्रहण कराई और उन्हें प्रत्याशी घोषित किया।
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रामवीर के चुनाव लड़ने पर भाजपा को यह लग रहा था कि इस बार इस सीट पर उसे जीत हासिल हो जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। रालोद के मुखिया जयंत चौधरी ने भी इस सीट को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ दिया था। कई दिन तक यहां आकर जयंत ने पार्टी के प्रत्याशी प्रदीप उर्फ गुड्डू चौधरी के पक्ष में प्रचार किया। कई जनसभाएं कीं। रालोद का परंपरागत वोट एकमुश्त होकर गुड्डू को मिला और साथ ही सपा के गठबंधन का लाभ भी इस सीट पर उसे मिला।
ऐसे में रालोद प्रत्याशी गुड्डू चौधरी ने प्रदेश के कद्दावर नेता रामवीर उपाध्याय को कड़े मुकाबले में करीब छह हजार वोटों से हरा दिया। हालांकि इस सीट पर भाजपा ने पहले से बेहतर प्रदर्शन किया और दूसरा स्थान हासिल किया, लेकिन रामवीर उपाध्याय भी भाजपा को जीत नहीं दिला पाए। पिछले चुनाव में यहां रालोद और बसपा का मुकाबला हुआ था और तब बसपा से चुनाव लड़े रामवीर ने रालोद के डॉ.अनिल चौधरी को परास्त कर दिया था।
रामवीर का खराब स्वास्थ्य बना हार का कारण
सूत्रों की मानें तो रामवीर की पराजय में उनका खराब स्वास्थ्य भी आड़े आया। रामवीर कई माह से बीमार चल रहे हैं। इस बीमारी के चलते वह पर्चा भरने भी नहीं आए थे और पूरे चुनाव प्रचार के दौरान केवल एक बार ही कार में बैठकर प्रचार करके चले गए थे। लोगों का कहना है कि राजनीति के माहिर खिलाड़ी रामवीर अगर स्वस्थ होते तो वह अपनी सीट निकाल ले जाते। संवाद
गुड्डू ने रोक दिया रामवीर का विजय रथ
रामवीर पिछले पांच चुनाव बसपा की सोशल इंजीनियरिंग के सहारे जीत रहे थे। उन्हें चुनाव जिताने में बसपा की भी अहम भूमिका होती थी, लेकिन इस बार उन्होंने खेमा बदल लिया था। लगातार पांच चुनाव जीत चुके रामवीर इस बार भाजपा से लड़े, लेकिन यह चुनाव नहीं जीत पाए और अब वह छठवीं बार विधानसभा में नहीं पहुंच पाएंगे।
हालांकि रामवीर ने वर्ष 1993 में जब पहला चुनाव लड़ा था तो वह हारे थे। उसके बाद वह जलेसर लोकसभा से भी चुनाव हारे थे। हालांकि वर्ष 1996 से लेकर वर्ष 2017 तक लगातार विधायक बने और जब-जब बसपा की सरकारें बनीं, तब-तब वह मंत्री भी बने।
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तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा इस बार भी सादाबाद सीट पर जीत हासिल नहीं कर पाई। इस सीट को जीतने के लिए भाजपा ने सभी कोशिशें की। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय को अपने पाले में लाकर दांव लगाया, लेकिन यहां सपा-रालोद गठबंधन की रणनीति सफल रही और भाजपा को इस सीट पर फिर से पराजय देखनी पड़ी। वैसे रालोद को फिर से इस सीट पर जीत हासिल हुई है और पार्टी ने एक तरह से अपनी खोई हुई जमीन प्राप्त कर ली है।
उल्लेखनीय है कि सादाबाद सीट पर भाजपा की विशेष नजर थी। इसकी मुख्य वजह यह थी कि पिछली बार जब पूरे प्रदेश में भाजपा की सुनामी चली थी। तब भी भाजपा इस सीट को नहीं जीत पाई थी और इस सीट से भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी।
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ऐसे में भाजपा ने इस सीट पर दमदार उम्मीदवार के रूप में पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय को अपने पाले में लिया। अस्वस्थ होने के बाद भी पार्टी ने उन्हें टिकट दिया। भाजपा के आला पदाधिकारियों ने घर जाकर उन्हें सदस्यता ग्रहण कराई और उन्हें प्रत्याशी घोषित किया।
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रामवीर के चुनाव लड़ने पर भाजपा को यह लग रहा था कि इस बार इस सीट पर उसे जीत हासिल हो जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। रालोद के मुखिया जयंत चौधरी ने भी इस सीट को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ दिया था। कई दिन तक यहां आकर जयंत ने पार्टी के प्रत्याशी प्रदीप उर्फ गुड्डू चौधरी के पक्ष में प्रचार किया। कई जनसभाएं कीं। रालोद का परंपरागत वोट एकमुश्त होकर गुड्डू को मिला और साथ ही सपा के गठबंधन का लाभ भी इस सीट पर उसे मिला।
ऐसे में रालोद प्रत्याशी गुड्डू चौधरी ने प्रदेश के कद्दावर नेता रामवीर उपाध्याय को कड़े मुकाबले में करीब छह हजार वोटों से हरा दिया। हालांकि इस सीट पर भाजपा ने पहले से बेहतर प्रदर्शन किया और दूसरा स्थान हासिल किया, लेकिन रामवीर उपाध्याय भी भाजपा को जीत नहीं दिला पाए। पिछले चुनाव में यहां रालोद और बसपा का मुकाबला हुआ था और तब बसपा से चुनाव लड़े रामवीर ने रालोद के डॉ.अनिल चौधरी को परास्त कर दिया था।
रामवीर का खराब स्वास्थ्य बना हार का कारण
सूत्रों की मानें तो रामवीर की पराजय में उनका खराब स्वास्थ्य भी आड़े आया। रामवीर कई माह से बीमार चल रहे हैं। इस बीमारी के चलते वह पर्चा भरने भी नहीं आए थे और पूरे चुनाव प्रचार के दौरान केवल एक बार ही कार में बैठकर प्रचार करके चले गए थे। लोगों का कहना है कि राजनीति के माहिर खिलाड़ी रामवीर अगर स्वस्थ होते तो वह अपनी सीट निकाल ले जाते। संवाद
गुड्डू ने रोक दिया रामवीर का विजय रथ
रामवीर पिछले पांच चुनाव बसपा की सोशल इंजीनियरिंग के सहारे जीत रहे थे। उन्हें चुनाव जिताने में बसपा की भी अहम भूमिका होती थी, लेकिन इस बार उन्होंने खेमा बदल लिया था। लगातार पांच चुनाव जीत चुके रामवीर इस बार भाजपा से लड़े, लेकिन यह चुनाव नहीं जीत पाए और अब वह छठवीं बार विधानसभा में नहीं पहुंच पाएंगे।
हालांकि रामवीर ने वर्ष 1993 में जब पहला चुनाव लड़ा था तो वह हारे थे। उसके बाद वह जलेसर लोकसभा से भी चुनाव हारे थे। हालांकि वर्ष 1996 से लेकर वर्ष 2017 तक लगातार विधायक बने और जब-जब बसपा की सरकारें बनीं, तब-तब वह मंत्री भी बने।