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हाथरस : 162 साल बाद भी सहपऊ वालों की तरक्की की आस अधूरी
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मुकेश बाबू शर्मा
सहपऊ। सहपऊ को नगर पंचायत का दर्जा मिले हुए 162 साल हो चुके हैं। इतनी पुरानी नगर पंचायत होने के बावजूद यहां सुविधा के नाम पर कुछ नहीं है। धीरे-धीरे पुराने धंधे भी चौपट हो गए। यहां के व्यवसायी क्षेत्र के आसपास होने वाली पैंठ (हाट) में कारोबार कर जीवन यापन कर रहे हैं। उद्योग-धंधे चौपट होने से यहां के कारोबारी और उद्यमी दूसरे शहरों में पलायन कर गए।
अंग्रेजों के जमाने में यहां नील की खेती और उसको तैयार करने का काम होता था, लेकिन समय के साथ यह धंधा पूरी तरह बंद हो गया। इसके बाद यहां बूरा बनाने का काम होने लगा। यहां का बूरा इतना प्रसिद्ध था कि दूसरे शहरों के लोग भी यहां से बूरा खरीदकर ले जाते थे, लेकिन अधिक मेहनत एवं मशीनी करण होने से यह धंधा भी अब बंद होने के कगार पर है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी नगर अभी तक पिछड़ा हुआ है। वर्ष 1970 में यहां दो इंटर कॉलेज थे और आज भी वहीं दो इंटर कॉलेज हैं। लड़कियों की शिक्षा के लिए कोई अलग से व्यवस्था नहीं है। 12 वीं कक्षा के बाद विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए दूसरे शहरों में जाना पड़ता है।
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लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा की व्यवस्था नहीं होने से अधिकांश लड़कियों को 12वीं के बाद घर बैठना पड़ता है। चिकित्सा सुविधाओं के लिहाज से भी यह क्षेत्र पिछड़ा है। यहां सीएचसी तो है, लेकिन उसमें भी चिकित्सा की ऐसी कोई सुविधा नहीं है, जिससे यहां गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों का इलाज हो सके। इस कारण बीमार लोगों को इलाज के लिए आगरा और अलीगढ़ भागना पड़ता है।
आवागमन के लिए नगर के बाहर एक किमी दूर पर एटा-मथुरा मार्ग है। इस मार्ग पर निजी बसों का आवागमन होता है। कस्बा की ओर आने वाले प्रत्येक मार्ग की स्थिति बहुत खराब है। कुछ रास्ते तो इतने जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं कि उन पर पैदल चलना मुश्किल है। नगर पंचायत की सीमा सीमित होने के कारण उन मार्गों पर कभी जिला पंचायत की ओर से तो कभी विधायक अथवा सांसद निधि से काम कराया जाता है, इसलिए उनके बनने का नंबर 10-15 साल बाद कभी-कभार ही आता है।
आवागमन की सुविधा नहीं होने के कारण भी यहां के धंधों पर काफी असर पड़ा। इससे बाहर का व्यापारी यहां अपनी पूंजी लगाने से कतराते हैं। नगर पंचायत को पं. दीनदयाल उपाध्याय आदर्श नगर पंचायत का दर्जा मिलने के बाद भी यहां पर विकास ज्यों का त्यों रुका हुआ है। योजना के तहत धर्मशाला चौराहा से कस्बा तक चौड़ीकरण करने का कार्य शुरू हो गया था, लेकिन लगता है कि वह भी राजनीति की भेंट चढ़ जाएगा। नगर से कोई व्यक्ति विधायक अथवा सांसद नहीं बना है। क्षेत्र के पिछड़ेपन का एक कारण यह भी माना जाता है। संवाद
नगरवासियों का दर्द
नगर पंचायत पहले भी वहीं थी, आज भी वहीं है। बाहर के व्यापारी यहां आकर अपनी पूंजी बर्बाद नहीं करना चाहते। आवागमन के साधनों की सबसे अधिक समस्या है। जिसके पास कोई निजी वाहन नहीं है, वह तो रात के समय यहां नहीं आ सकता।
- प्रमोद वार्ष्णेय, दवा व्यवसायी
यहां के पुराने उद्योग-धंधे चौपट हो गए हैं। नयों के लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता है। यदि कोई काम किया जाए तो उसका भरोसा नहीं है कि की उसकी लागत निकलेगी अथवा नहीं। आसपास के लोग बाहर से अधिक खरीदारी करने नहीं आते। ज्यादातर लोग सादाबाद चले जाते हैं।
-राम कुमार गुप्ता, व्यवसायी
12वीं के बाद यहां कोई डिग्री कॉलेज अथवा तकनीकी विद्यालय नहीं है। इस कारण हम जैसी अन्य बहनें आगे पढ़ने से वंचित हो जाती हैं। 12वीं की पढ़ाई के बाद में बाहर पढ़ने जाती हूं। वहां मुझे काफी देर तक खड़े होकर वाहन का इंतजार करना पड़ता है।
-उर्वशी वार्ष्णेय, छात्रा
यहां महिलाओं की शिक्षा एवं अन्य प्रकार की सुविधाएं नहीं है। यदि कोई महिला व्यापार करना भी चाहे तो आवागमन जैसी सुविधा नहीं होने के कारण वह अपने कदम पीछे खींच लेती है। यदि रोडवेज बस की सेवा शुरू हो जाए तो समय की बचत के साथ वह सुरक्षित घर पहुंच सकेंगी।
- अलका गुप्ता
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सहपऊ। सहपऊ को नगर पंचायत का दर्जा मिले हुए 162 साल हो चुके हैं। इतनी पुरानी नगर पंचायत होने के बावजूद यहां सुविधा के नाम पर कुछ नहीं है। धीरे-धीरे पुराने धंधे भी चौपट हो गए। यहां के व्यवसायी क्षेत्र के आसपास होने वाली पैंठ (हाट) में कारोबार कर जीवन यापन कर रहे हैं। उद्योग-धंधे चौपट होने से यहां के कारोबारी और उद्यमी दूसरे शहरों में पलायन कर गए।
अंग्रेजों के जमाने में यहां नील की खेती और उसको तैयार करने का काम होता था, लेकिन समय के साथ यह धंधा पूरी तरह बंद हो गया। इसके बाद यहां बूरा बनाने का काम होने लगा। यहां का बूरा इतना प्रसिद्ध था कि दूसरे शहरों के लोग भी यहां से बूरा खरीदकर ले जाते थे, लेकिन अधिक मेहनत एवं मशीनी करण होने से यह धंधा भी अब बंद होने के कगार पर है।
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शिक्षा के क्षेत्र में भी नगर अभी तक पिछड़ा हुआ है। वर्ष 1970 में यहां दो इंटर कॉलेज थे और आज भी वहीं दो इंटर कॉलेज हैं। लड़कियों की शिक्षा के लिए कोई अलग से व्यवस्था नहीं है। 12 वीं कक्षा के बाद विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए दूसरे शहरों में जाना पड़ता है।
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लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा की व्यवस्था नहीं होने से अधिकांश लड़कियों को 12वीं के बाद घर बैठना पड़ता है। चिकित्सा सुविधाओं के लिहाज से भी यह क्षेत्र पिछड़ा है। यहां सीएचसी तो है, लेकिन उसमें भी चिकित्सा की ऐसी कोई सुविधा नहीं है, जिससे यहां गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों का इलाज हो सके। इस कारण बीमार लोगों को इलाज के लिए आगरा और अलीगढ़ भागना पड़ता है।
आवागमन के लिए नगर के बाहर एक किमी दूर पर एटा-मथुरा मार्ग है। इस मार्ग पर निजी बसों का आवागमन होता है। कस्बा की ओर आने वाले प्रत्येक मार्ग की स्थिति बहुत खराब है। कुछ रास्ते तो इतने जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं कि उन पर पैदल चलना मुश्किल है। नगर पंचायत की सीमा सीमित होने के कारण उन मार्गों पर कभी जिला पंचायत की ओर से तो कभी विधायक अथवा सांसद निधि से काम कराया जाता है, इसलिए उनके बनने का नंबर 10-15 साल बाद कभी-कभार ही आता है।
आवागमन की सुविधा नहीं होने के कारण भी यहां के धंधों पर काफी असर पड़ा। इससे बाहर का व्यापारी यहां अपनी पूंजी लगाने से कतराते हैं। नगर पंचायत को पं. दीनदयाल उपाध्याय आदर्श नगर पंचायत का दर्जा मिलने के बाद भी यहां पर विकास ज्यों का त्यों रुका हुआ है। योजना के तहत धर्मशाला चौराहा से कस्बा तक चौड़ीकरण करने का कार्य शुरू हो गया था, लेकिन लगता है कि वह भी राजनीति की भेंट चढ़ जाएगा। नगर से कोई व्यक्ति विधायक अथवा सांसद नहीं बना है। क्षेत्र के पिछड़ेपन का एक कारण यह भी माना जाता है। संवाद
नगरवासियों का दर्द
नगर पंचायत पहले भी वहीं थी, आज भी वहीं है। बाहर के व्यापारी यहां आकर अपनी पूंजी बर्बाद नहीं करना चाहते। आवागमन के साधनों की सबसे अधिक समस्या है। जिसके पास कोई निजी वाहन नहीं है, वह तो रात के समय यहां नहीं आ सकता।
- प्रमोद वार्ष्णेय, दवा व्यवसायी
यहां के पुराने उद्योग-धंधे चौपट हो गए हैं। नयों के लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता है। यदि कोई काम किया जाए तो उसका भरोसा नहीं है कि की उसकी लागत निकलेगी अथवा नहीं। आसपास के लोग बाहर से अधिक खरीदारी करने नहीं आते। ज्यादातर लोग सादाबाद चले जाते हैं।
-राम कुमार गुप्ता, व्यवसायी
12वीं के बाद यहां कोई डिग्री कॉलेज अथवा तकनीकी विद्यालय नहीं है। इस कारण हम जैसी अन्य बहनें आगे पढ़ने से वंचित हो जाती हैं। 12वीं की पढ़ाई के बाद में बाहर पढ़ने जाती हूं। वहां मुझे काफी देर तक खड़े होकर वाहन का इंतजार करना पड़ता है।
-उर्वशी वार्ष्णेय, छात्रा
यहां महिलाओं की शिक्षा एवं अन्य प्रकार की सुविधाएं नहीं है। यदि कोई महिला व्यापार करना भी चाहे तो आवागमन जैसी सुविधा नहीं होने के कारण वह अपने कदम पीछे खींच लेती है। यदि रोडवेज बस की सेवा शुरू हो जाए तो समय की बचत के साथ वह सुरक्षित घर पहुंच सकेंगी।
- अलका गुप्ता