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हाथरस : काका हाथरसी के पुत्र व संगीतकार डॉ.लक्ष्मीनारायण गर्ग का निधन
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
देश-विदेशों तक हास्य का डंका बजाने वाले काका हाथरसी के पुत्र संगीतकार डॉ. लक्ष्मीनारायण गर्ग का बीमारी के चलते निधन हो गया। उन्होंने संगीत में करीब ढाई सौ किताबें लिखी हैं। इसके अलावा फिल्म जमुना किनारे में निर्माता निर्देशक के साथ बॉलीवुड में खासी पहचान बनाई। उनके निधन से यहां शोक की लहर दौड़ गई।
हास्य व्यंग्य के आका कवि काका हाथरसी के पुत्र डॉ. लक्ष्मीनारायण गर्ग का शुक्रवार को निधन हो गया। वह पिछले कई दिन से बीमार चल रहे थे। उनके निधन की जानकारी मिलते ही यहां लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। डॉ. गर्ग ने संगीत और साहित्य के क्षेत्र काफी अहम योगदान दिया।
मिले थे कई पुरस्कार
वर्ष 2012 में केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली की ओर से डॉ. गर्ग को टैगोर रत्न सम्मान मिला था। आकाशवाणी केंद्र दिल्ली के आर्काइव विभाग ने डॉ. गर्ग की करीब छह घंटे की भेंट वार्ता रिकॉर्ड की थी। इसे पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित किया गया। वर्ष 2008 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भरतनाट्यम पर पुस्तक लिखने पर पुरस्कृत किया। वे संगीत नाटक अकादमी, सुर शृंगार संसद मुंबई, ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) और रेडियो सीलोन (श्रीलंका) के परामर्शदाता भी रहे थे। संगीत रत्न व कथक नृत्य जैसी पुस्तकों के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें सम्मानित किया। म्यूजिक मिरर (अंग्रेजी मासिक पत्रिका) और हास्य रसम (वार्षिक पत्रिका) का संपादन भी उन्होंने किया। संगीत पर 150 से अधिक पुस्तकों का लेखन, अनुवाद और संपादन किया था।
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फिल्म जमुना किनारे से बृजभाषा का लहराया परचम
1962 में डॉ. गर्ग मुंबई चले गए। वहां फिल्म-संगीत और शास्त्रीय-संगीत में भरपूर अवसर मिले। वह 1966 से 1968 तक ऑल इंडिया रेडियो मुंबई के ऑडिशन बोर्ड के सदस्य रहे। 1984 में उन्होंने फिल्म जमुना किनारे बनाई। इसके संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। इस फिल्म के माध्यम से बृजभाषा, बृज संस्कृति व लोक संस्कृति को लोगों तक पहुुंचाया।
रविशंकर के घर जाया करते थे संगीत सीखने
डॉ. गर्ग बताते थे कि उन्होंने पांच वर्ष की आयु से ही संगीत को सीखना शुरू कर दिया। हाथरस के प्रसिद्ध तबला वादक पंडित लोकमान व पंडित हरिप्रसाद शर्मा से तबला वादन सीखा। इसके बाद जयपुर के पंडित शशिमोहन भट्ट ने उन्हें सितार-वादन में परिपूर्ण किया। हिंदी में पीएचडी डॉ. गर्ग सितार वाद्य यंत्र बजाते थे। उन्होंने वर्ष 1954 में पंडित रविशंकर से संगीत सीखा। वह दिल्ली में बंगाली मार्केंट और पटौदी हाउस स्थित पंडित रविशंकर के घर संगीत सीखने जाया करते थे। डॉ. गर्ग बताते हैं कि वर्ष 1962 में वह मुंबई चले गए। वहां पंडित रविशंकर की पत्नी अन्नपूर्णा देवी से उन्होंने संगीत और सितार सीखा।
आचार्य बालकृष्ण ने पुस्तक में निभाई भूमिका
डॉ. लक्ष्मीनारायण गर्ग की किताब ‘संगीत द्वारा रोग चिकित्सा’ में ध्वनि, स्वर और राग से तमाम बीमारियों के इलाज के बारे में बताया गया था। 285 शीर्षकों की यह पुस्तक उनकी नायाब कृति थी। यूजिक थेरेपी, पिंडा उत्पत्ति, ध्वनि की उत्पत्ति, संगीत चिकित्सकीय प्रभाव, राग चिकित्सा, रोगों में स्वरों का प्रयोग, रोग चिकित्सा में संगीत का प्रभाव आदि की विस्तृत जानकारी इस पुस्तक में दी। पतंजलि योगपीठ के अध्यक्ष स्वामी बालकृष्ण ने इस पुस्तक की भूमिका लिखी थी।
डॉ. गर्ग की चर्चित पुस्तकें
डॉ. गर्ग की वैसे हर पुस्तक की अपनी खासियत है। उन्होंने वर्ष 1954 में अपनी पहली किताब ‘आवाज सुरीली कैसे करें’ लिखी थी। यह एक नायाब किताब थी, जिसमें आवाज को आकर्षक बनाने के आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक और प्राकृतिक तरीके बताए गए। वर्ष 1970 में आई उनकी किताब कथक नृत्य भी काफी चर्चित रही। वर्ष 2015 में आई उनकी भरतनाट्यम नामक पुस्तक ने खूब ख्याति बटोरी। भरतनाट्यम और संगीत शब्दकोष के लिए उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से सम्मानित किया गया। इतना ही नहीं वर्ष वर्ष 1934 में काका हाथरसी ने संगीत मासिक पत्रिका शुरू की थी। 20 साल बाद वर्ष 1955 से डॉ. गर्ग इसकी बागडोर संभाली। तब से वह इस प्रत्रिका को प्रकाशित कर रहे थे। वर्ष 2007 में पत्रिका के 75 वर्ष पूर्ण होने पर पार्श्व गायिका लता मंगेशकर, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया, संगीत निर्देशक प्यारेलाल, प्रख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर, कई राज्यों के राज्यपाल समेत 50 से अधिक नामचीन लोगों ने पत्र लिखकर उन्हें बधाई दी थी।
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देश-विदेशों तक हास्य का डंका बजाने वाले काका हाथरसी के पुत्र संगीतकार डॉ. लक्ष्मीनारायण गर्ग का बीमारी के चलते निधन हो गया। उन्होंने संगीत में करीब ढाई सौ किताबें लिखी हैं। इसके अलावा फिल्म जमुना किनारे में निर्माता निर्देशक के साथ बॉलीवुड में खासी पहचान बनाई। उनके निधन से यहां शोक की लहर दौड़ गई।
हास्य व्यंग्य के आका कवि काका हाथरसी के पुत्र डॉ. लक्ष्मीनारायण गर्ग का शुक्रवार को निधन हो गया। वह पिछले कई दिन से बीमार चल रहे थे। उनके निधन की जानकारी मिलते ही यहां लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। डॉ. गर्ग ने संगीत और साहित्य के क्षेत्र काफी अहम योगदान दिया।
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मिले थे कई पुरस्कार
वर्ष 2012 में केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली की ओर से डॉ. गर्ग को टैगोर रत्न सम्मान मिला था। आकाशवाणी केंद्र दिल्ली के आर्काइव विभाग ने डॉ. गर्ग की करीब छह घंटे की भेंट वार्ता रिकॉर्ड की थी। इसे पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित किया गया। वर्ष 2008 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भरतनाट्यम पर पुस्तक लिखने पर पुरस्कृत किया। वे संगीत नाटक अकादमी, सुर शृंगार संसद मुंबई, ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) और रेडियो सीलोन (श्रीलंका) के परामर्शदाता भी रहे थे। संगीत रत्न व कथक नृत्य जैसी पुस्तकों के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें सम्मानित किया। म्यूजिक मिरर (अंग्रेजी मासिक पत्रिका) और हास्य रसम (वार्षिक पत्रिका) का संपादन भी उन्होंने किया। संगीत पर 150 से अधिक पुस्तकों का लेखन, अनुवाद और संपादन किया था।
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फिल्म जमुना किनारे से बृजभाषा का लहराया परचम
1962 में डॉ. गर्ग मुंबई चले गए। वहां फिल्म-संगीत और शास्त्रीय-संगीत में भरपूर अवसर मिले। वह 1966 से 1968 तक ऑल इंडिया रेडियो मुंबई के ऑडिशन बोर्ड के सदस्य रहे। 1984 में उन्होंने फिल्म जमुना किनारे बनाई। इसके संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। इस फिल्म के माध्यम से बृजभाषा, बृज संस्कृति व लोक संस्कृति को लोगों तक पहुुंचाया।
रविशंकर के घर जाया करते थे संगीत सीखने
डॉ. गर्ग बताते थे कि उन्होंने पांच वर्ष की आयु से ही संगीत को सीखना शुरू कर दिया। हाथरस के प्रसिद्ध तबला वादक पंडित लोकमान व पंडित हरिप्रसाद शर्मा से तबला वादन सीखा। इसके बाद जयपुर के पंडित शशिमोहन भट्ट ने उन्हें सितार-वादन में परिपूर्ण किया। हिंदी में पीएचडी डॉ. गर्ग सितार वाद्य यंत्र बजाते थे। उन्होंने वर्ष 1954 में पंडित रविशंकर से संगीत सीखा। वह दिल्ली में बंगाली मार्केंट और पटौदी हाउस स्थित पंडित रविशंकर के घर संगीत सीखने जाया करते थे। डॉ. गर्ग बताते हैं कि वर्ष 1962 में वह मुंबई चले गए। वहां पंडित रविशंकर की पत्नी अन्नपूर्णा देवी से उन्होंने संगीत और सितार सीखा।
आचार्य बालकृष्ण ने पुस्तक में निभाई भूमिका
डॉ. लक्ष्मीनारायण गर्ग की किताब ‘संगीत द्वारा रोग चिकित्सा’ में ध्वनि, स्वर और राग से तमाम बीमारियों के इलाज के बारे में बताया गया था। 285 शीर्षकों की यह पुस्तक उनकी नायाब कृति थी। यूजिक थेरेपी, पिंडा उत्पत्ति, ध्वनि की उत्पत्ति, संगीत चिकित्सकीय प्रभाव, राग चिकित्सा, रोगों में स्वरों का प्रयोग, रोग चिकित्सा में संगीत का प्रभाव आदि की विस्तृत जानकारी इस पुस्तक में दी। पतंजलि योगपीठ के अध्यक्ष स्वामी बालकृष्ण ने इस पुस्तक की भूमिका लिखी थी।
डॉ. गर्ग की चर्चित पुस्तकें
डॉ. गर्ग की वैसे हर पुस्तक की अपनी खासियत है। उन्होंने वर्ष 1954 में अपनी पहली किताब ‘आवाज सुरीली कैसे करें’ लिखी थी। यह एक नायाब किताब थी, जिसमें आवाज को आकर्षक बनाने के आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक और प्राकृतिक तरीके बताए गए। वर्ष 1970 में आई उनकी किताब कथक नृत्य भी काफी चर्चित रही। वर्ष 2015 में आई उनकी भरतनाट्यम नामक पुस्तक ने खूब ख्याति बटोरी। भरतनाट्यम और संगीत शब्दकोष के लिए उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से सम्मानित किया गया। इतना ही नहीं वर्ष वर्ष 1934 में काका हाथरसी ने संगीत मासिक पत्रिका शुरू की थी। 20 साल बाद वर्ष 1955 से डॉ. गर्ग इसकी बागडोर संभाली। तब से वह इस प्रत्रिका को प्रकाशित कर रहे थे। वर्ष 2007 में पत्रिका के 75 वर्ष पूर्ण होने पर पार्श्व गायिका लता मंगेशकर, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया, संगीत निर्देशक प्यारेलाल, प्रख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर, कई राज्यों के राज्यपाल समेत 50 से अधिक नामचीन लोगों ने पत्र लिखकर उन्हें बधाई दी थी।