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हाथरस: चारे-पानी की कमी से दम तोड़ रहे गोवंश
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पराग डेयरी गोशाला में खड़े गोवंश। संवाद
- फोटो : SASNI
संवाद न्यूज एजेंसी, सासनी।
अस्थायी गोशालाओं में रखे गए गोवंश एक बार फिर चारे-पानी की कमी से दम तोड़ने के लिए मजबूर हैं। गोशालाओं में गोवंश की देखभाल और उनके लिए उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं पर भी सवाल उठ रहे हैं।
हालात ऐसे हैं कि गोशालाओं में रह रहे गोवंश हर आने-जाने वाले को इस आस में टकटकी लगाकर देखते हैं कि शायद वह उनके लिए चारा लेकर आए हैं। पराग डेयरी की अस्थायी गोशाला में शनिवार को आधा दर्जन से अधिक गोवंश मृत अवस्था में मिले, जबकि इतने ही सिसकते हुए नजर आए।
दरअसल, करीब तीन वर्ष पूर्व शासन द्वारा अस्थायी गोशालाओं की स्थापना की थी। इनमें लाचार गोवंश को कैद कर दिया गया था, लेकिन इन गोशालाओं में संसाधानों का अभाव गोवंश को खलने लगा था। अहम सवाल यह है कि शासन द्वारा अस्थायी गोशालाएं बनाने के बाद इनकी ओर झांककर भी नहीं देखा गया है।
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एक गोवंश के लिए मात्र 30 रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जबकि प्रशासन द्वारा की गई टैगिंग के आधार पर करीब 1,400 गोवंश वर्तमान में मौजूद हैं, लेकिन इनके लिए चारे-पानी का संकट है। बीमार और लाचार गोवंश के लिए दवाओं का संकट है। इस कारण गोवंश रोजाना सिसक-सिसककर दम तोड़ रहे हैं। मृत गोवंश के शवों को बिना पोस्टमार्टम के ही दफना दिया जाता है।
गोशाला परिसर में गोवंश को दफनाने के बाद टीले बनते जा रहे हैं। गोवंश के शवों को चील-कौव्वे नोच-नोचकर खा रहे हैं। अफसोस की बात तो यह है कि कई बार शासन के दूत एवं प्रदेश सरकार के मंत्री भी गोशाला का निरीक्षण कर चुके हैं और बार यहां की व्यवस्थाओं को देखकर अधिकारियों की पीठ थपथपाकर चले गए। हकीकत को उनके सामने आने ही नहीं दिया जाता। मवेशियों के चारे की लड़ावनी और पानी पीने की हौदी आज भी खाली पड़ी हैं।
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अस्थायी गोशालाओं में रखे गए गोवंश एक बार फिर चारे-पानी की कमी से दम तोड़ने के लिए मजबूर हैं। गोशालाओं में गोवंश की देखभाल और उनके लिए उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं पर भी सवाल उठ रहे हैं।
हालात ऐसे हैं कि गोशालाओं में रह रहे गोवंश हर आने-जाने वाले को इस आस में टकटकी लगाकर देखते हैं कि शायद वह उनके लिए चारा लेकर आए हैं। पराग डेयरी की अस्थायी गोशाला में शनिवार को आधा दर्जन से अधिक गोवंश मृत अवस्था में मिले, जबकि इतने ही सिसकते हुए नजर आए।
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दरअसल, करीब तीन वर्ष पूर्व शासन द्वारा अस्थायी गोशालाओं की स्थापना की थी। इनमें लाचार गोवंश को कैद कर दिया गया था, लेकिन इन गोशालाओं में संसाधानों का अभाव गोवंश को खलने लगा था। अहम सवाल यह है कि शासन द्वारा अस्थायी गोशालाएं बनाने के बाद इनकी ओर झांककर भी नहीं देखा गया है।
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एक गोवंश के लिए मात्र 30 रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जबकि प्रशासन द्वारा की गई टैगिंग के आधार पर करीब 1,400 गोवंश वर्तमान में मौजूद हैं, लेकिन इनके लिए चारे-पानी का संकट है। बीमार और लाचार गोवंश के लिए दवाओं का संकट है। इस कारण गोवंश रोजाना सिसक-सिसककर दम तोड़ रहे हैं। मृत गोवंश के शवों को बिना पोस्टमार्टम के ही दफना दिया जाता है।
गोशाला परिसर में गोवंश को दफनाने के बाद टीले बनते जा रहे हैं। गोवंश के शवों को चील-कौव्वे नोच-नोचकर खा रहे हैं। अफसोस की बात तो यह है कि कई बार शासन के दूत एवं प्रदेश सरकार के मंत्री भी गोशाला का निरीक्षण कर चुके हैं और बार यहां की व्यवस्थाओं को देखकर अधिकारियों की पीठ थपथपाकर चले गए। हकीकत को उनके सामने आने ही नहीं दिया जाता। मवेशियों के चारे की लड़ावनी और पानी पीने की हौदी आज भी खाली पड़ी हैं।