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हाथरस : जिन बच्चों के लिए छोड़ा सुख सारा, उन्हीं ने छोड़ दिया बेसहारा
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
जिन बेटों के लिए जिन माता-पिता ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, उन्हीं बेटों ने इन्हें दुत्कार दिया। शहर के नगला भुस स्थित वृद्धाश्रम में रहने वाले इन बुजुर्गों की दर्द भरी दास्तां सुनकर कोई भी भावुक हो सकता है। इन बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन अपने कलेजे के टुकड़ों की परवरिश में लगा दिया। उन्हें पढ़ाया लिखाया और पैरों पर खड़ा किया, लेकिन अब बुढ़ापे में उसी औलाद ने उन्हें घर से निकाल दिया। यही वजह है कि वह वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर हैं। संवाद
बच्चों की खातिर नौकरी छोड़ी, फिर भी हो गए बेघर
वृद्धाश्रम में रहकर जीवन यापन कर रहे 84 वर्षीय मदनमोहन का एक बेटा पुलिस में है और दूसरा प्राइवेट नौकरी करता है। मदनमोहन कहते हैं कि उनका सबसे छोटा बेटा उन्हीं के पास रहता था। उसके निधन होने के बाद दोनों बड़े बेटों ने उन्हें सहारा नहीं दिया। मदनमोहन कहते हैं कि वह खुद सरकारी नौकरी में थे, लेकिन परिवार की खातिर उन्होंने सरकारी नौकरी तक छोड़ दी थी। अपना पूरा ध्यान परिवार पर लगाया। बेटों को इस काबिल बनाया कि वह अपने पैरों पर खड़े हो सकें। बेटे अपने पैरों पर खड़े हो गए, लेकिन किसी ने उनकी सुधि नहीं ली, इसलिए वह वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर हो गए।
जिन बेटों के लिए मेहनत की, उन्हीं ने छोड़ दिया
शहर की ही एक कॉलोनी के निवासी 70 वर्षीय विजय सिंह की भी यही दर्द भरी दास्तां है। विजय सिंह के दो बेटे हैं। दोनों की शादी हो चुकी है। विजय सिंह ने अपने बेटों की खातिर प्रिंटिंग प्रेस में काम किया। उनकी परवरिश के लिए और भी काम किए, लेकिन जब बुढ़ापे ने उन्हें घेर लिया तो इन्हीं बेटों ने उनसे मुंह मोड़ लिया। अब वह वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर हैं।
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शहर की एक कॉलोनी के निवासी 65 वर्षीय हाकिम सिंह भी वृद्धाश्रम में जीवन यापन कर रहे हैं। हाकिम सिंह का कहना है कि उन्होंने अपने बेटे की परवरिश के लिए मजदूरी की। ट्रक चालक की नौकरी की। और भी कई काम किए। बेटे को अपने पैरों पर खड़ा किया। बेटे को शराब की लत लग गई। हाकिम सिंह का कहना है कि बेटे ने उनके साथ मारपीट तक शुरू कर दी। ऐसे में आखिर वह क्या करते। उन्हें वृद्धा आश्रम में आकर शरण लेनी पड़ी।
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जिन बेटों के लिए जिन माता-पिता ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, उन्हीं बेटों ने इन्हें दुत्कार दिया। शहर के नगला भुस स्थित वृद्धाश्रम में रहने वाले इन बुजुर्गों की दर्द भरी दास्तां सुनकर कोई भी भावुक हो सकता है। इन बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन अपने कलेजे के टुकड़ों की परवरिश में लगा दिया। उन्हें पढ़ाया लिखाया और पैरों पर खड़ा किया, लेकिन अब बुढ़ापे में उसी औलाद ने उन्हें घर से निकाल दिया। यही वजह है कि वह वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर हैं। संवाद
बच्चों की खातिर नौकरी छोड़ी, फिर भी हो गए बेघर
वृद्धाश्रम में रहकर जीवन यापन कर रहे 84 वर्षीय मदनमोहन का एक बेटा पुलिस में है और दूसरा प्राइवेट नौकरी करता है। मदनमोहन कहते हैं कि उनका सबसे छोटा बेटा उन्हीं के पास रहता था। उसके निधन होने के बाद दोनों बड़े बेटों ने उन्हें सहारा नहीं दिया। मदनमोहन कहते हैं कि वह खुद सरकारी नौकरी में थे, लेकिन परिवार की खातिर उन्होंने सरकारी नौकरी तक छोड़ दी थी। अपना पूरा ध्यान परिवार पर लगाया। बेटों को इस काबिल बनाया कि वह अपने पैरों पर खड़े हो सकें। बेटे अपने पैरों पर खड़े हो गए, लेकिन किसी ने उनकी सुधि नहीं ली, इसलिए वह वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर हो गए।
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जिन बेटों के लिए मेहनत की, उन्हीं ने छोड़ दिया
शहर की ही एक कॉलोनी के निवासी 70 वर्षीय विजय सिंह की भी यही दर्द भरी दास्तां है। विजय सिंह के दो बेटे हैं। दोनों की शादी हो चुकी है। विजय सिंह ने अपने बेटों की खातिर प्रिंटिंग प्रेस में काम किया। उनकी परवरिश के लिए और भी काम किए, लेकिन जब बुढ़ापे ने उन्हें घेर लिया तो इन्हीं बेटों ने उनसे मुंह मोड़ लिया। अब वह वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर हैं।
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शहर की एक कॉलोनी के निवासी 65 वर्षीय हाकिम सिंह भी वृद्धाश्रम में जीवन यापन कर रहे हैं। हाकिम सिंह का कहना है कि उन्होंने अपने बेटे की परवरिश के लिए मजदूरी की। ट्रक चालक की नौकरी की। और भी कई काम किए। बेटे को अपने पैरों पर खड़ा किया। बेटे को शराब की लत लग गई। हाकिम सिंह का कहना है कि बेटे ने उनके साथ मारपीट तक शुरू कर दी। ऐसे में आखिर वह क्या करते। उन्हें वृद्धा आश्रम में आकर शरण लेनी पड़ी।