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हाथरस : कारोबारी दुश्वारियां बरकरार, हींग की महक कैसे रखें बरकरार
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हाथरस : हाथरस की एक फैक्टरी में तैयार होती हींग। संवाद
- फोटो : HATHRAS
गौरव भारद्वाज
हाथरस। हाथरस की हींग की महक देश- विदेश में फैली है। यहां की रत्ती भर हींग खाने का जायका बदल देती है। अब लंबे समय से हींग उत्पादन का हाथरस बड़ा केंद्र है। यहां चार सौ रुपये से लेकर पंद्रह हजार रुपये प्रतिकिलो की कीमत की हींग बिकती है। सरकार ने हींग को एक जनपद एक उत्पाद (ओडीओपी) में शामिल कर रखा है।
कच्चे माल से आयात शुल्क भी हटा दिया गया है। इसके बाद भी यहां के हींग उद्यमी अभी कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। यहां के उद्यमी लंबे समय से हींग उत्पादन के लिए अलग से हींग नगरी बनाने, हींग की परीक्षण लैब, माल भेजने के लिए परिवहन साधनों को दुरुस्त करने की मांग कर रहे हैं। संवाद0
हाथरस का हींग उद्योग एक नजर में
एक शताब्दी से ज्यादा पुराना है हाथरस का हींग उद्योग।
वर्ष 2018 से एक जनपद एक उत्पाद में शामिल है यह उद्योग।
विदेश से आता है कच्चा माल और फिर यहां बनती है जायकेदार हींग।
करीब तीन हजार लोग जुड़े है शहर में इस कारोबार से।
साठ छोटी और बड़ी फैक्टरियां हैं हाथरस में हींग की।
करीब सत्तर करोड़ रुपये का होता है हींग का वार्षिक कारोबार।
विदेश से आता हे कच्चा माल
हींग बनाने के लिए कच्चा माल अफगानिस्तान, ईरान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान से आता है। इन मुल्कों में एसाफोइटीडा ( हींग का दूध) वहां पैदा होने वाले एक पौधे में पाया जाता है। हाथरस में यह कच्चा माल इन फैक्ट्रियों में दिल्ली मुंबई के कारोबारियों के माध्यम से आता है। कुछ उद्यमी इन देशों से सीधे मंगाते हैं। इसके बाद इसे नियत तापमान पर गर्म किया जाता है। इसमें मैदा, खाद्य तेल, खाने योग्य गोंद मिलाया जाता है। फिर धूप में सुखाकर हींग तैयार की जाती है। इस प्रक्रिया में करीब पंद्रह दिन समय लग जाता है। इसके बाद यहां के उद्यमी अपने इस उत्पाद को परीक्षण के लिए प्रयोगशाला भी कराते हैं। जिससे उन्हें अपने माल की गुणवत्ता पता चलती है।
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यहां 120 साल पुराना है हींग का उद्योग
पुराने कारोबारियों की मानें तो हाथरस का हींग उद्योग करीब 120 साल पुराना है। करीब 120 साल पहले एक अफगानी ने यहां आकर इसे कुटीर उद्योग के रूप में लगाया। हालांकि इस अफगानी का उद्योग तो नहीं चला लेकिन यहां के अन्य कारोबारियों उद्यमियों ने इसे अपना लिया। फिर हाथरस की हींग की खुशबू दूर तक महकने लगी।
ओडीओपी में शामिल होने के बाद यह उद्योग लगातार विकसित हो रहा है। कच्चे माल पर आयात शुल्क समाप्त कर दिया गया है। अब धीरे धीरे यह उद्योग और विकसित हो रहा है। इस उद्योग से काफी लोगों को रोजगार मिल रहा है। राम बिहारी अग्रवाल, हींग उद्यमी।
यहां के हींग उद्यमियों को अलग से औद्यौगिक क्षेत्र आंवटित किया जाए। जहां केवल हींग की फैक्ट्रियां ही स्थापित हों। अभी यहां परिवहन के साधन विकसित नहीं है। यहां ट्रांसपोर्ट नगर स्थापित हो। हींग के परीक्षण के लिए यहां सरकारी प्रयोगशाला स्थापित की जाए। पंकज अग्रवाल, हींग उद्यमी।
हींग को ओडीओपी में शामिल कर सरकार ने महत्वूपूर्ण कदम उठाया था। कच्चे माल पर आयात शुल्क भी हटा दिया गया था। यहां अब अलग से हींग नगरी स्थापित की जाए। वहां उद्यमियों को सारी सुविधाएं दी जाएं। यहां परीक्षण के लिए प्रयोगशाला भी स्थापित की जाए।
मनोज अग्रवाल, हींग उद्यमी।
हींग उद्योग को बढ़ावा देने के लिए ट्रांसपोर्ट सिस्टम दुरुस्त किया जाए। यहां ट्रांसपोर्ट नगर बनाया जाए। साथ ही प्रयोगशाला बनाई जाए। ताकि जिले में ही हींग की गुणवत्ता की जांच हो सके। हींग उद्यमियों को अलग से भूमि आवंटित की जाए।
अनिल शर्मा, हींग उद्यमी।
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हाथरस। हाथरस की हींग की महक देश- विदेश में फैली है। यहां की रत्ती भर हींग खाने का जायका बदल देती है। अब लंबे समय से हींग उत्पादन का हाथरस बड़ा केंद्र है। यहां चार सौ रुपये से लेकर पंद्रह हजार रुपये प्रतिकिलो की कीमत की हींग बिकती है। सरकार ने हींग को एक जनपद एक उत्पाद (ओडीओपी) में शामिल कर रखा है।
कच्चे माल से आयात शुल्क भी हटा दिया गया है। इसके बाद भी यहां के हींग उद्यमी अभी कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। यहां के उद्यमी लंबे समय से हींग उत्पादन के लिए अलग से हींग नगरी बनाने, हींग की परीक्षण लैब, माल भेजने के लिए परिवहन साधनों को दुरुस्त करने की मांग कर रहे हैं। संवाद0
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हाथरस का हींग उद्योग एक नजर में
एक शताब्दी से ज्यादा पुराना है हाथरस का हींग उद्योग।
वर्ष 2018 से एक जनपद एक उत्पाद में शामिल है यह उद्योग।
विदेश से आता है कच्चा माल और फिर यहां बनती है जायकेदार हींग।
करीब तीन हजार लोग जुड़े है शहर में इस कारोबार से।
साठ छोटी और बड़ी फैक्टरियां हैं हाथरस में हींग की।
करीब सत्तर करोड़ रुपये का होता है हींग का वार्षिक कारोबार।
विदेश से आता हे कच्चा माल
हींग बनाने के लिए कच्चा माल अफगानिस्तान, ईरान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान से आता है। इन मुल्कों में एसाफोइटीडा ( हींग का दूध) वहां पैदा होने वाले एक पौधे में पाया जाता है। हाथरस में यह कच्चा माल इन फैक्ट्रियों में दिल्ली मुंबई के कारोबारियों के माध्यम से आता है। कुछ उद्यमी इन देशों से सीधे मंगाते हैं। इसके बाद इसे नियत तापमान पर गर्म किया जाता है। इसमें मैदा, खाद्य तेल, खाने योग्य गोंद मिलाया जाता है। फिर धूप में सुखाकर हींग तैयार की जाती है। इस प्रक्रिया में करीब पंद्रह दिन समय लग जाता है। इसके बाद यहां के उद्यमी अपने इस उत्पाद को परीक्षण के लिए प्रयोगशाला भी कराते हैं। जिससे उन्हें अपने माल की गुणवत्ता पता चलती है।
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यहां 120 साल पुराना है हींग का उद्योग
पुराने कारोबारियों की मानें तो हाथरस का हींग उद्योग करीब 120 साल पुराना है। करीब 120 साल पहले एक अफगानी ने यहां आकर इसे कुटीर उद्योग के रूप में लगाया। हालांकि इस अफगानी का उद्योग तो नहीं चला लेकिन यहां के अन्य कारोबारियों उद्यमियों ने इसे अपना लिया। फिर हाथरस की हींग की खुशबू दूर तक महकने लगी।
ओडीओपी में शामिल होने के बाद यह उद्योग लगातार विकसित हो रहा है। कच्चे माल पर आयात शुल्क समाप्त कर दिया गया है। अब धीरे धीरे यह उद्योग और विकसित हो रहा है। इस उद्योग से काफी लोगों को रोजगार मिल रहा है। राम बिहारी अग्रवाल, हींग उद्यमी।
यहां के हींग उद्यमियों को अलग से औद्यौगिक क्षेत्र आंवटित किया जाए। जहां केवल हींग की फैक्ट्रियां ही स्थापित हों। अभी यहां परिवहन के साधन विकसित नहीं है। यहां ट्रांसपोर्ट नगर स्थापित हो। हींग के परीक्षण के लिए यहां सरकारी प्रयोगशाला स्थापित की जाए। पंकज अग्रवाल, हींग उद्यमी।
हींग को ओडीओपी में शामिल कर सरकार ने महत्वूपूर्ण कदम उठाया था। कच्चे माल पर आयात शुल्क भी हटा दिया गया था। यहां अब अलग से हींग नगरी स्थापित की जाए। वहां उद्यमियों को सारी सुविधाएं दी जाएं। यहां परीक्षण के लिए प्रयोगशाला भी स्थापित की जाए।
मनोज अग्रवाल, हींग उद्यमी।
हींग उद्योग को बढ़ावा देने के लिए ट्रांसपोर्ट सिस्टम दुरुस्त किया जाए। यहां ट्रांसपोर्ट नगर बनाया जाए। साथ ही प्रयोगशाला बनाई जाए। ताकि जिले में ही हींग की गुणवत्ता की जांच हो सके। हींग उद्यमियों को अलग से भूमि आवंटित की जाए।
अनिल शर्मा, हींग उद्यमी।